हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
पृष्ठ 167, कुल 302 में से
संदर्भ में पढ़ें-१६४ ] राजाके परिवार और चन्दनवृक्षका साम्य १४७-
और दूसरे-दुष्टोंके विषयमें सैकड़ों उपकार नष्ट हो जाते हैं, मूर्खोंके सामने
सैकड़ों अच्छे २ उपदेश नष्ट हो जाते हैं, हितके वचनको नहीं मानने वालेके
सामने सैकड़ों वचन नष्ट हो जाते हैं, और महामूर्खके सामने सैकड़ों बुद्धियाँ
नष्ट हो जाती हैं ॥ १६१ ॥
किं च,—
चन्दनतरुषु भुजंगा जलेषु कमलानि तत्र च ग्राहाः ।
गुणघातिनश्च भोगे खला न च सुखान्यविघ्नानि ॥ १६२ ॥
और चन्दनके वृक्षों पर सर्प, जलमें कमल और उसीमें मगर आदि होते हैं,
और राजादि अथवा विषयके भोगमें गुणके नाश करने वाले दुर्जन लोग होते हैं;
इसीलिये सुख विघ्नरहित नहीं है ॥ १६२ ॥
अन्यच्च,—
मूलं भुजंगैः कुसुमानि भृङ्गैः
शाखाः प्लवङ्गैः शिखराणि भल्लैः ।
नास्त्येव तच्चन्दनपादपस्य
यन्नाश्रितं दुष्टतरैश्च हिंस्रैः ॥ १६३ ॥
और दूसरे-जड़ सर्पोंसे, पुष्प भँवरोंसे, डालियाँ बन्दरोंसे और चोटी बर्छीके
समान पत्तोंसे, इस प्रकार चन्दनके वृक्षका ऐसा कोईसा भाग नहीं है जो दुष्ट
जंतुओंसे न घिरा हो ॥ १६३ ॥
अयं तावत्स्वामी वाचि मधुरो विषहृदयो ज्ञातः ।
मुझे यह स्वामी वाणीमें मीठा और पेटका कपटी समझ पड़ा ।
यतः,—
दूरादुच्छ्रितपाणिराद्र्रनयनः प्रोत्सारितार्धासनो
गाढालिङ्गनतत्परः प्रियकथाप्रश्नेषु दत्तादरः ।
अन्तर्भूतविषो बहिर्मधुमयश्चातीव मायापटुः
को नामायमपूर्वनाटकविधिर्यः शिक्षितो दुर्जनैः ? ॥१६४॥
क्योंकि—दूरसे ऊँचे हाथ उठाना, प्रीतिसे रसीले नेत्र करना, आधा आसन
बैठनेके लिये देना, अच्छे प्रकारसे मिलना, प्रिय कथाके पूछनेमें आदर करना,
भीतर विषयुक्त अर्थात् कपटयुक्त और बाहरसे मीठी २ बातें करना यह जिसमें