हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
पृष्ठ 161, कुल 302 में से
संदर्भ में पढ़ें-१४९ ] टिटहरीका जोडा और घमंडी समुद्रकी कहानी १४१
यतः,—
सकृद्दुष्टं तु यो मित्रं पुनः संधातुमिच्छति ।
स मृत्युमेव गृह्णाति गर्भमश्वतरी यथा' ॥ १४८ ॥
क्योंकि,—जो मनुष्य एक बार दुष्टपना किये हुए मित्रके साथ फिर मेल
करना चाहता है वह मृत्युको ऐसे बुलाता है जैसे अश्वतरी गर्भको' ॥ १४८ ॥
सिंहो ब्रूते—'ज्ञायतां तावत्किमस्माकमसौ कर्तुं समर्थः ?'
दमनक आह—'देव !
सिंह बोला-‘पहले यह तो समझलो कि वह हमारा क्या कर सकता है ?’
दमनकने कहा-‘महाराज !
अङ्गाङ्गिभावमज्ञात्वा कथं सामर्थ्यनिर्णयः ? ।
पश्य टिट्टिभमात्रेण समुद्रो व्याकुलीकृतः' ॥ १४९ ॥
शरीरको और शरीरधारीके कामको विना जाने कैसे सामर्थ्यका निर्णय हो
सकता है ? देखो, केवल एक टिटहरीने समुद्रको व्याकुल कर दिया' ॥ १४९ ॥
सिंहः पृच्छति—'कथमेतत् ?' । दमनकः कथयति—
सिंह पूछने लगा-‘यह कथा कैसे है ?’ दमनक कहने लगा ।—
कथा १०
[ टिटहरीका जोडा और समुद्रकी कहानी १० ]
'दक्षिणसमुद्रतीरे टिट्टिभदंपती निवसतः । तत्र चासन्नप्रसवा
टिट्टिभी भर्तारमाह—'नाथ ! प्रसवयोग्यस्थानं निभृतमनुसंधीय-
ताम् ।' टिट्टिभोऽवदत्—भार्ये ! नन्विदमेव स्थानं प्रसूतियोग्यम् ।'
सा ब्रूते—‘समुद्रवेलया व्याप्यते स्थानमेतत् ।' टिट्टिभोऽवदत्—
‘किमंहं निर्बलः समुद्रेण निग्रहीतव्यः ?' । टिट्टिभी विहस्याह—
‘स्वामिन् ! त्वया समुद्रेण च महदन्तरम् ।
‘दक्षिण समुद्रके तीर पर टिटहरीका जोड़ा रहता था । और वहाँ पूरे गर्भ
वाली टिटहरीने अपने पतिसे कहा-‘स्वामी ! प्रसवके अर्थात् अंडे धरनेके योग्य
एकांत स्थान ढूंढ़ना चाहिये ।' टिटहरा बोला—‘प्रिये ! सचमुच यही स्थान
अंडे धरनेके लिये अच्छा है ।' वह कहने लगी-‘इस स्थानमें समुद्रकी तरंग
१ अश्वतरी एक प्रकारकी खच्चर गधी होती है. उसका बच्चा पेट फाड़ कर निकलता
है और वह मर जाती है.