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सर्वकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

पृष्ठ 127, कुल 302 में से

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पृष्ठ 127

-७६ ] राजाको तारतम्यसे ही काम लेनेकी आवश्यकता १०७
क्योंकि सेवक और आभरण योग्य स्थानमें ( जहांके वहां ) लगा दिये जाते
हैं, जैसे मुकुट पैरमें और पाजेब शिर पर नहीं पहिनी जाती है ॥ ७१ ॥
अपि च,—
कनकभूषणसंग्रहणोचितो
यदि मणित्रपुणि प्रणिधीयते ।
न च विरौति न चापि स शोभते
भवति योजयितुर्वचनीयता ॥ ७२ ॥
और भी सुवर्णके आभूषणमें जड़नेके योग्य मणि, जो सीसा आदि धातुके
आभूषणमें जड़ दिया जाय तो, वह मणि न तो झनकारता है और न शोभाही
देता है किन्तु जड़ियेकी बुराई होती है ॥ ७२ ॥
अन्यच्च,—
मुकुटे रोपितः काचश्चरणाभरणे मणिः ।
न हि दोषो मणेरस्ति किंतु साधोरविज्ञता ॥ ७३ ॥
और दूसरे—जो मुकुटमें कांच जड़ दिया जाय, और चरणके आभूषणमें मणि
जड़ दिया जाय तो कुछ मणिकी निन्दा नहीं है पर जड़ियेकी मूर्खता समझी
जाती है ॥ ७३ ॥
पश्य,—
बुद्धिमाननुरक्तोऽयमयं शूर इतो भयम् ।
इति भृत्यविचारज्ञो भृत्यैरापूर्यते नृपः ॥ ७४ ॥
देखो—यह बुद्धिमान् है, यह राजभक्त है, यह शूर है, इससे भय है, इस प्रकार
सेवकोंके विचारको जानने वाला राजा सेवकोंसे भरा पूरा रहता है ॥ ७४ ॥
तथा हि,—
अश्वः शस्त्रं शास्त्रं वीणा वाणी नरश्च नारी च ।
पुरुषविशेषं प्राप्य हि भवन्ति योग्या अयोग्याश्च ॥ ७५ ॥
और भी कहा है—घोड़ा, शस्त्र, शास्त्र, वीणा, वाणी, मनुष्य और स्त्री ये
गुणीके अथवा गुणहीनके पास पहुंचते ही ( उसके संसर्गसे ) योग्य और अयोग्य
बन जाते हैं ॥ ७५ ॥
अन्यच्च,—
किं भक्तेनासमर्थेन किं शक्तेनापकारिणा ? ।
भक्तं शक्तं च मां राजन्नावज्ञातुं त्वमर्हसि ॥ ७६ ॥