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सर्वकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

पृष्ठ 126, कुल 302 में से

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पृष्ठ 126

१०६ हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः ६७-
यतः,-
कदर्थितस्यापि च धैर्यवृत्ते-
र्बुद्धेर्विनाशो न हि शङ्कनीयः ।
अधःकृतस्यापि तनूनपातो
नाधः शिखा याति कदाचिदेव ॥ ६७ ॥
क्योंकि—अनादरभी किये गये धैर्यवानकी बुद्धिके नाशकी शंका नहीं करनी
चाहिये; जैसे नीचेकी ओर की गईभी अग्निकी ज्वाला कभीभी नीचे नहीं जाती
है, अर्थात् हमेशा ऊंचीही रहती है ॥ ६७ ॥
देव ! तत्सर्वथा विशेषज्ञेन स्वामिना भवितव्यम् ।
हे महाराज ! इसलिये सदा स्वामीको विवेकी होना चाहिये,
यतः,-
मणिर्लुठति पादेषु काचः शिरसि धार्यते ।
यथैवास्ते तथैवास्तां काचः काचो मणिर्मणिः ॥ ६८ ॥
क्योंकि—मणि चरणोंमें ठुकराता है और कांच शिर पर धारण किया जाता
है सो जैसा है वैसा भलेही रहे. कांच कांचही है और मणि मणिही है ॥ ६८ ॥
अन्यच्च,—
निर्विशेषो यदा राजा समं सर्वेषु वर्तते ।
तदोद्यमसमर्थानामुत्साहः परिहीयते ॥ ६९ ॥
और दूसरे—जब राजा सब (लायक और नालायक) के विषयमें समान वर्ताव
करता है तब बड़े बड़े कार्यके करनेवाले (पुरुषों)का उत्साह नष्ट हो जाता
है ॥ ६९ ॥
किं च,—
त्रिविधाः पुरुषा राजन्नुत्तमाधममध्यमाः ।
नियोजयेत्तथैवैतांस्त्रिविधेष्वेव कर्मसु ॥ ७० ॥
और हे राजा ! उत्तम, मध्यम और अधम तीन प्रकारके मनुष्य हैं; उसी
प्रकार इन तीन प्रकारके पुरुषोंको तीन प्रकारके ही काममें नियुक्त कर देना
चाहिये ॥ ७० ॥
यतः,—
स्थान एव नियोज्यन्ते भृत्याश्चाभरणानि च ।
न हि चडामणिः पादे नूपुरं शिरसा कृतम् ॥ ७१ ॥