हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
४८ • • हित चौरासी
सुहावनी माला भी धारण नहीं रह पाती। अर्थात् ये सभी वाह्य लक्षण ज्ञान से
शून्य हुए अन्तरङ्ग भावना में लीन हैं। ऐसे गूढ़ाश्चर्य रूप उज्ज्वल रसाश्रित
रसिक गण वेदोक्त कर्मकाण्ड का अनुष्ठान करें या न करें, माला चन्दन आदि
विषय समूहों का भोग करें या न करें; इससे उनको न कोई हानि है और न लाभ
ही। अहो ! राधाकान्त के भाव में पारङ्गत मति ऐसे रसिक क्या कभी अल्पज्ञ
बहिर्मुख अथवा अन्य सकाम पुरुषों में से किसी के साथ मिल भी सकते हैं ?
जिनके लिये विषय चर्चा कोटि-कोटि नरक जैसी वीभत्स, श्रुति कथा व्यर्थश्रम,
मोक्ष भयप्रद और परेश भजनोन्मद शुकादि उपेक्षणीय है। जो केवल श्रीराधिका
पद रस में निमग्न हैं। कैसी राधिका? किशोरावस्था के अद्भुत माधुरी प्रवाह से
जिनकी अङ्ग-प्रत्यङ्ग छबि सर्वाग्रगण्य हो रही है जो प्रेमोल्लास प्रवाह के कारण
सर्व श्रेष्ठता को प्राप्त हैं-ऐसी राधिका का जो महा पुरुष तद्गत चित्त से
निरन्तर ध्यान करते हैं; उन्होंने कर्मों को नहीं छोड़ा वरं कर्मों ने ही उन्हें छोड़
दिया है और वे परम श्रेष्ठ भगवद्धर्म की ममता से भी मुक्त होकर सर्वाश्चर्य पूर्ण
रसमयी परम गति को प्राप्त हो चुके हैं। ऐसे महानतम् पुरुषों के लिये बारम्बार
नमस्कार है।⁹
इन रसिकों की परम उपरामता की झाँकी कीजिये-
रहो दास्यं तस्या; किमपि वृषभानोर्व्रजवरी-
यसः पुत्र्याः पूर्ण प्रणय रस मूर्त्तेर्यदि लभे।
तदा नः किं धर्मैः किमु सुर गणैः किं च विधिना
किमीशेन श्याम प्रिय मिलन यत्नैरपि च किम्।।
-श्रीराधा सुधा निधि ११५
अर्थात् "यदि व्रज वरीयान् वृषभानुराय की पूर्ण प्रेम रस मूर्त्ति पुत्री का
हमें एकान्त दास्य लाभ हो जाय तो फिर हमें धर्म से, देवता गणों से, ब्रह्मा और
शङ्कर से, अरे ! श्याम सुन्दर के प्रिय मिलन यत्न से भी क्या प्रयोजन है ?"
इसी प्रकार उपरामता के साथ निष्ठा का भी दर्शन करें-
किं वा नस्तैः सुशास्त्रैः किमथ तदुदितैर्वर्त्मभिः सद्गृहीतै-
र्यत्रास्ति प्रेम मूर्त्तेर्नहि महिम सुधा नापि भावस्त दीयः।
हित चौरासी • • ४६
किंवा वैकुण्ठ लक्ष्म्याप्यहह परमया यत्र मे नास्ति राधा,
किन्त्वाशाप्यस्तु वृन्दावन भुवि मधुरा कोटि जन्मान्तरेऽपि ।।
-श्रीराधा सुधा निधि, २१६
अर्थात् "जिनमें प्रेम मूर्त्ति श्रीराधा की महिमा सुधा किंवा उनके भाव का
वर्णन नहीं है उन शास्त्र समूहों से अथवा उन शास्त्र विहित साधुजन गृहीत
मार्ग समूहों से भी हमको क्या प्रयोजन है ! अहा ! जहाँ हमारी श्रीराधा नहीं हैं
उस वैकुण्ठ शोभा श्री से भी हमको क्या ? किन्तु कोटि जन्मान्तरों में भी
वृन्दावन भूमि के प्रति हमारी मधुर आशा बनी रहे, यही वाञ्छा है।"
अस्तु; इस प्रकार श्रीहिताचार्य्य के सिद्धान्तानुसार सखियों एवं रसिक
अनन्यों का स्वरूप भाव सब उपासकों से विलक्षण दृष्टिगत होता है। उक्त
कथित "श्रीहरिवंश के इष्ट तत्व' और "उपासना भाव" सखी के योग से जिस
विहार की सिद्धि सम्पन्नता होती है उसकी ओर इङ्गित किया जाता है।
३-नित्य विहार का स्वरूप-
श्रुति, पुराण एवं इतिहासादि में श्रीकृष्ण की जिन शृङ्गार-लीलाओं का
वर्णन है, वह श्रीहिताचार्य्य पाद का नित्य विहार न होकर ब्रज विहार है या और
कुछ है, क्योंकि जैसे उनकी आराध्या श्रुति अगोचर हैं उसी प्रकार उनसे
सम्पन्न होने वाला विहार अपने आप श्रुति -अगोचर सिद्ध हो जाता है। आचार्य्य
पाद अवतार तत्व कृत विहार को काल-सापेक्ष मानते हैं नित्य नहीं। वे नित्य
विहार एवं ब्रज विहार का अन्तर एक पद में बड़ी कुशलता से दिखाते हैं-
रहौ कोऊ काहू मनहिं दियैं।
मेरे प्राननाथ श्रीस्यामा सपथ करौं तिन छियैं॥
जे अवतार कदंब भजत हैं धरि दृढ़ व्रत जु हियैं।
तेऊ उमगि तजत मर्जादा बन विहार रस पियैं॥
खोयें रतन फिरत जे घर घर कौन काज ऐसें जियैं।
(जै श्री) हित हरिवंश अनत सचु नाहीं बिनु या रजहिं लियैं।।
- स्फुट वाणी पद, २०
५० • • हित चौरासी
आप अपने उपास्य इस नित्य विहार को इसी भूतल स्थित वृन्दावन में
संतत है ऐसा मानते हैं-
जै श्री हित हरिवंश विपिन भूतल पर संतत अविचल जोरी।
–हित चौरासी पद ७०
और (जै श्री) हित हरिवंश करौ दिन दोऊ अचल विहार।
–हित चौरासी पद ५७
यह नित्य विहार, गोपी एवं गोपीकान्त के स्वकीया परकीया, मिलन एवं
विरह से परे स्व पर भेद रहित शुद्ध प्रेम रति है। श्रीहित महाप्रभु के मत से
स्वकीया, परकीया और मिलन एवं विरह प्रत्येक अलग-अलग अपनी अपनी
जगह में अपूर्ण हैं। स्वकीया में मिलन है किन्तु विरह जन्य प्रेम वेदना नहीं।
परकीया में विरह है किन्तु नित्य मिलन की सुखानुभूति नहीं। इसे आपने चकई
और सारस के वार्त्तालाप के प्रसङ्ग से इस प्रकार समझाया है-
चकई प्रान जु घट रहें पिय विछुरंत निकज्ज।
सर अंतर अरु काल निसि तरफ तेज घन गज्ज।।
तरफ तेज घन गज्ज लज्ज तुहि वदन न आवै।
जल विहून करि नैन भोर किहिं भाइ बतावै।।
(जै श्री) हित हरिवंश विचारि बाद अस कौन जु बकई।
सारस यह संदेह प्रान घट रहें जु चकई।।
– स्फुट वाणी पद ५;
भाव यह कि सारस के विचार से चकई का विरह जन्य प्रेम अपूर्ण है जो
विरह में भी प्रियतम के बिना जीवित रह पाती है किन्तु सारस के विरहानुभूति
रहित प्रेम को चकई तुच्छ मानती है; देखिये-
सारस सर विछुरंत कौ जो पलु सहै सरीर।
अगिन अनंग जु तिय भखै तौ जानै पर पीर।।
तौ जानै पर पीर धीर धरि सकहि वज्र तन।
मरत सारसहिं फूट पुनि न पर्यौ जु लहत मन।।
अन्त में आचार्यपाद अपना मत देते हैं कि प्रेम विरह के बिना सभी प्रकार
के प्रेम चाहे वह मिलन में हों या विरह में, विडम्बना ही हैं।
हित चौरासी • • ५१
जै श्री हित हरिवंश विचारि प्रेम विरहा विनु वा रस।
निकट कंत नित रहत मरम कहा जानै सारस॥
–स्फुट वाणी पद ६
प्रश्न हो सकता है कि यह ‘प्रेम विरहा’ क्या है ? इसका संक्षिप्त उत्तर
इतना ही है कि जहाँ नित्य–मिलन में तीव्र प्रेमोत्कण्ठा के रूप में विरह है वह
सूक्ष्म प्रेम–गति ही ‘प्रेम–विरहा’ है। यह प्रेम विरहा नित्य विहार रस का प्राण
है। प्रेम विरह का स्वरूपाङ्कन करते हुए आचार्य्यपाद ने लिखा है–
कहा कहौं इन नैननिं की बात।
ये अलि प्रिया वदन अंबुज रस अटके अनत न जात॥
जब जब रुकत पलक संपुट लट अति आतुर अकुलात।
लंपट लव निमेष अंतर ते अलप कलप सत सात॥
श्रुति पर कंज, दृगंजन, कुच विच मृग मद ह्वै न समात।
जै श्री हित हरिवंश नाभि सर जलचर जाँचत साँवल गात॥
–हित चौरासी, पद ६०
इस प्रकार युगल किशोर के नित्य मिलन में स्थूल विरह की कल्पना तो
नहीं है किन्तु मिलन में भी प्रेम की क्षीणता न होकर नित्य नूतन स्वाद, चाह
चटपटी रूप सूक्ष्म विरह पूर्ण रूप से है। प्रेमासव पूर्ण रूप माधुरी का पान
करके दोनों किशोर किशोरी नित्य अतृप्त–विरही हैं–
देखत आप में रूप न कबहुँ समात हैं।
दोउ इक रस रीति न प्रेम समात हैं॥
पलु पलु में रुचि बढ़ै सखी मुसिकात हैं।
मुख सौं मुख रहे जोरि तऊ ललचात हैं॥
– रहस्य लता
इस रूप लालच रूप विरह का कोई ओर छोर है? इसमें कितनी प्यास
है–
अरुझे मन सुरझत नहिं कैहूँ । जेहि अँग ढरत होत सुख तैहूँ॥
एकै रुचि दुहुँ में सखि बाढ़ी । परि गई प्रेम ग्रंथि अति गाढ़ी॥
५२ • • हित चौरासी
देखत देखत कल नहिं माई । तिनकौं प्रेम कह्यौ नहिं जाई॥
ऐसे रसिक किसोर विहारी। उज्ज्वल प्रेम विहार अहारी॥
अति आसक्त परस्पर प्यारे। एक सुझाव दुहुँनि मन हारे॥
–नेह मंजरी
इसी प्रकार और भी–
निरखि माधुरी सहज की नैन न मानत हार।
बढ़ी तहाँ रुचि की नदी धीरज कूल बिदार॥
छिन छिन औरैं और छबि पल पल में गति और।
नागर सागर रूप के परम रसिक सिर मौर॥
कबहुँ लाड़िली होत पिय लाल प्रिया है जात।
नहिं जानत यह प्रेम रस निसि दिन कितहिं विहात॥
सुरँग चूनरी एक में रँग भीनें सुकुमार।
लपटे ऐसी भाँति सौं नहिं समात बिच हार॥
नैन कटोरी रूप की भरी प्रेम मद मोद।
अद्भुत रुचि पीवत बढ़ी आनँद रँग दुहुँ कोद॥
अंगनि की छवि माधुरी निरखत हूँ न अघाहिं।
नैन भँवर भूले फिरैं रूप कमल वन माँहिं॥
जद्यपि पिय देखत रहै मन की सोच न जाइ।
कैसेहूँ इक बार ये देखें नैन अघाइ॥
अति आसक्त सनेह बस मोहन रूप निधान।
तजि स्यानप राख्यो न कछु अपने तन मन प्राँन॥
छिन छिन माँहिं अचेत है पल पल माँहि सचेत।
नहिं जानत या रंग में गये कलप जुग केत ॥
नख सिख लौं दोउ अरुझि रहे नेकहुँ सुरझत नाँहिं।
ज्यौं ज्यौं रुचि बाढ़ै अधिक त्यौं त्यौं अति अरुझाँहिं॥
–रंग विहार
नित्य विहार के केवल चार अंग हैं, जिसमें से नित्य नव किशोरी श्रीराधा
एवं नित्य नव किशोर रसिक शेखर प्रियतम श्रीकृष्ण के स्वरूप का बहुत कुछ
हित चौरासी • • ५३
परिचयात्मक वर्णन हो चुका है और सखियों के स्वरूप पर भी "उपासना भाव"
इस शीर्षक से प्रकाश डाला जा चुका है तथापि सखियों के सुख एवं अधिकार
का नित्य विहार में क्या स्वरूप है? यह जानना इस प्रसङ्ग में आवश्यक है।
इसका स्पष्टीकरण श्रीध्रुवदास जी इस प्रकार करते हैं-
लाल लाड़िली प्रेम ते सरस सखिनु कौ प्रेम।
अटकी हैं निजु प्रेम रस तिनहिं न परसत नेम॥
अर्थात् "लाड़िली लाल के प्रेम से भी सरस प्रेम है सखियों का; क्योंकि
वे स्वाभाविक एक रस अविच्छिन्न प्रेम में अटक रही हैं, उन्हें नियम स्पर्श नहीं
कर पाते, अतः-
सखियन के सुख पर सुख नाहीं। आनँद मोद रँगी मन माहीं।।
रूप रसासव यहै अहारा। तन मन की कछु नाहिं सँभारा।।
एकै रस नित भींजी रहहीं। साँझ भोर समुझयौ नहिं कबहीं।।
सो रस करति रहति नित पानैं। निसि बासर बीतत नहिं जानैं।।
- प्रेम लता
और भी-
सुरत रंग विवि वदन पर श्रम जल कन रहे सोहि।
रसिक सखी ललितादि सब छबि अनूप रहीं जोहि।।
कोमल अंचल पवन डुलावैं। अति आसक्त नैन भरि आवैं।।
एक वैस सब सखी सहेली। मानौ नेह बाग की बेली।।
सींची नवल कटाच्छनि जल सौं। फूलीं चाह फूल फल दल सौं।।
एक रूप तन मन अनुरागीं। जुगल हेत हित रस सौं पागीं।।
-रसानन्द
नित्य विहार में जो उज्ज्वलतम महा मधुर रस उच्छलित होता है उसके
ठहरने का एक ही स्थान है सखियों का हृदय। श्रीआचार्य्य पाद कहते हैं-
निविड़ कानन भवन, बाहु रंजित रवन, सरस आलाप, सुख पुंज बरसावै।
उमै संगम सिंधु सुरत पूषन बंधु द्रवत मकरंद हरिवंश अलि पावै।।
५४ • • हित चौरासी
और
मदन मुदित अंग-अंग बीच-बीच सुरत रंग।
पलु पलु हरिवंश पिवत नैन चषक झेलि।।
-हित चौरासी ८१, १७
श्रीध्रुवदासजी कहते हैं कि युगल में उत्पन्न रस कहाँ जाकर ठहरा-
प्रेम रसासव छके दोउ करत विलास विनोद।
बढ़त रहत उतरत नहीं गौर-स्याम छबि मोद।।
मैंड़ तोरि रस चल्यौ अपारा। रही न तन मन कछू सँभारा।।
सो रस कहौ कहाँ ठहरानौं। सखियनि के उर नैन समानौं।।
तेहि अवलम्ब सबै सहचरी। मत्त रहत ठाढ़ी रँग भरी।।
- रति मंजरी
सखियों के 'मन-नैन' में जाकर रस नित्य स्थिति पाता है अतः ये
युगल रस की कोषाध्यक्ष हैं-
जुगल प्रेम रस कोष तहाँ की अधिकारिनु जु सहेली। - चाचा हित वृन्दावन दास
केवल कोषाध्यक्ष ही नहीं हैं, ये सखियाँ इस रस की पूर्ण मार्मिकता की
भेदी हैं, चाचाजी कहते हैं-
महाभाव दंपति रस बतियाँ समुझत संधि सहेली।
कमल गंध कौ अलि ज्यौं मरमी जा उर लगन गहेली।।
दादुर मीन चिन्हार न तासौं जदपि रहें नित भेली।
वृन्दावन हित रूप जानि ततसुखजुउपास दुलेली।। - जुगल सनेह पत्रिका
अस्तु; नित्य विहार का चतुर्थ अंग श्रीधाम वृन्दावन है। श्रीहित हरिवंश
चन्द्र का वृन्दावन भूतल स्थित होकर भी सबसे परे है। नित्य एक रस है,
आनन्द मय है और प्रेम मय है। यहाँ शुद्ध माधुर्य्य रस की कैशोर लीला नित्य
निरन्तर होती रहती है। वृन्दावन का स्वरूप वर्णन करते हुए आचार्य्य पाद ने
लिखा है कि-“श्रीराधिका कृपा बिनु सबके मननि अगम्य” है, और-
हित चौरासी • • ५५
किं ब्रूमोऽन्यत्र कुण्ठी कृतक जन पदे धाम्न्यपि श्रीविकुण्ठे
राधा माधुर्य्यवेत्ता मधुपतिरथ तन्माधुरीं वेत्ति राधा।
वृन्दारण्य स्थलीयं परम रस सुधा माधुरीणां धुरीणां
तद्द्वन्द्वं स्वादनीयं सकलमपि ददौ राधिका किङ्करीभ्यः॥
–श्रीराधा सुधा निधि १७५;
अर्थात् "अन्यत्र की तो बात ही क्या विकुण्ठ धाम की श्री भी (श्रीराधा
माधुर्य्य के अभाव से) कुंठित हो गयी है। क्योंकि श्रीराधा के माधुर्य्य को केवल
श्रीमाधव जानते हैं और श्रीमाधव के माधुर्य्य को श्रीराधा जानती हैं। इस
आस्वादनीय युगल को परम रस-सुधा माधुरी अग्रगण्य श्रीवृन्दारण्य स्थली
ने श्रीराधा किङ्करी गणों को सम्पूर्ण रूप से प्रदान कर दिया है।
ऐसे वृन्दावन को रसिक जन सर्व त्याग पूर्वक ग्रहण करते हैं; क्योंकि
यहाँ श्रीराधा नामक एक दिव्य निधि सदा विराजमान् है जो, सज्जनों को भव
से उद्धार करने वाले भाव रूप सुधा रस का प्रवाह है। यह वृन्दावन श्रीराधा
करों से स्पर्श की हुई पल्लव-वल्लरी से मण्डित, पदाङ्कों से चिन्हित मनोहर
स्थल युक्त एवं श्रीराधा यशोगान से मुखरित मत्त खगावली से सेवित है। यह
राधा केलि पुञ्ज का नित्य कुञ्ज कानन है। इस नित्य कानन में श्रीनन्द नन्दन
की दर्प युक्त बाहुओं के आलिंगन से शिथिलाङ्गी एवं अनन्त रस-कला विस्तारक
घनीभूत आनन्द मूर्ति प्रेम प्रतिमा किशोरी राधा का नित्य निवास है। वृन्दावन
के नव लता मन्दिर में तीव्र काम के उन्माद से उन्मादित रति केलि कलाओं के
कौतुक-पूर्ण रस स्वरूप एवं आनन्द मय किशोराकृति युगल विराज रहे हैं।
यह वन मधुर एवं रस केलि धाम क्यों है ? इस लिये कि इसमें विदग्ध नागरी
मणि श्रीराधा एवं रसिक शेखर श्रीकृष्ण कभी गान से, कभी अमन्द हिन्दोल से
कभी कुसुम सुरभित वायु से तो कभी सुरत-केलि चातुरी के प्रकाश पूर्वक
क्रीड़ा किया करते हैं।
यह वृन्दावन साक्षात् राधा रूप है। और अपने राधा रूप से प्रियतम
श्रीकृष्ण को अन्य राधा की भाँति अपनी ओर आकर्षित कर रहा है। कितना
साम्य है राधा और श्रीवन में ! श्रीराधा की रोम राजि श्रीवन की यमुना है, अङ्ग
५६ • • हित चौरासी
प्रभा बन्धूक बन्धु है। श्रीराधा की चम्पकाङ्ग छवि श्रीवन की चम्पक लताओं का
विकास है। एक ओर नाभि है तो दूसरी ओर सरोवर। वक्षोज या पुष्प-गुच्छ
एक ही बात है। भुजाएँ हैं लताएँ और नूपुरों की झङ्कार है मधुपों की झङ्कार।
इस प्रकार वृन्दावन तत्स्वरूप होकर भी लीला के लिये प्रेम धाम है तब
इस प्रेम धाम की श्रीराधा ही स्वामिनी हैं इसी वृन्दावन की वेतस् कुञ्जों में
रहस्य रूपा श्रीराधा स्वामिनि का अविचल निवास है।
कहाँ तक कहा जाय ? वृन्दावन की महिमा अनन्त है। श्रीहिताचार्य्य पाद
इस वृन्दावन की महिमा का प्रभाव वर्णन करते हुए कहते हैं कि हमारे जैसा
परम अधम तुच्छ गर्ह्य कर्मा प्राणी भी निगम पदवी से परे श्रीराधा का और
श्रीराधा के भी हृदय में निवास करने वाले श्रीकृष्ण का अपने हृदय में दर्शन
करता है। यदि सौभाग्य से इस वन में यह पार्थिव देह छूट जाय तो निश्चय ही
नव रस कोमल कला मूर्त्ति श्रीराधा की दासी होने का अवसर मिल सकता है
क्योंकि यहाँ का चराचर मात्र राधा रूप है, भले ही दूसरों की दृष्टि में वह दर्शन
सम्भाषण के योग्य न हो किन्तु वास्तव में वह महा योगीन्द्रों के लिये वन्दनीय,
दर्शनीय सघन रस दाता और एक मात्र आनन्द मूर्ति है।
वृन्दावन का यह प्रकृष्ट महिमामय रूप केवल राधा किङ्करियों के अथवा
इस भाव वाले रसिकों के ही हृदय में ही सम्यक्तया प्रकट हो सकता है। यद्यपि
वृन्दावन पापियों को भी रस दान करते हैं तथापि श्रीराधा कृपा के बिना इनके
स्वरूप का वास्तविक प्रकाश नहीं हो सकता। इस प्रकार श्रीवृन्दावन की
महिमा और उनका स्वरूप आश्चर्यमय ही नहीं अत्याश्चर्यमय है।
अस्तु; उपरोक्त वर्णन में जिस नित्य विहार के अङ्गों की ओर संकेत
किया गया है उन सबसे सम्पन्न होने वाले वृन्दावन विहार किंवा नित्य विहार
की झाँकी कीजिये-
प्रथम जथा मति प्रनऊँ श्रीवृन्दावन अति रम्य।
श्रीराधिका कृपा बिनु सबके मननि अगम्य।।
वर जमुना जल सींचन दिनहीं सरद बसंत।
विविध भाँति सुमनसि के सौरभ अलि कुल मंत।।
हित चौरासी • • ५७
अरुन नूत पल्लव पर कूँजत कोकिल कीर।
निर्त्तनि करत सिखी कुल अति आनंद अधीर॥
बहत पवन रुचि दायक सीतल मंद सुगंध।
अरुन नील सित मुकुलित जहँ तहँ पूषन बंधु॥
अति कमनीय विराजत मंदिर नवल निकुंज।
सेवत सगन प्रीति जुत दिन मीन ध्वज पुंज॥
रसिक रासि जहँ खेलत स्यामा स्याम किसोर।
उभय वाहु परिरंजित उठे उनींदे भोर॥
कनक कपिश पट सोभित सुभग साँवरे अंग।
नील वसन कामिनि उर कंचुकि कसूँभी सुरंग॥
ताल रबाब मुरज डफ बाजत मधुर मृदंग।
सरस उकति गति सूचत बर बँसुरी मुख चंग॥
दोउ मिलि चाँचरि गावत गोरी राग अलापि।
मानस मृग बल बेधत भृकुटी धनुष दृग चापि॥
दोउ कर तारिनु पटकत लटकत इत उत जात।
हो हो होरी बोलत अति आनँद कुलकात॥
रसिक लाल पर मेलत कामिनि बन्दन धूरि।
पिय पिचकारिनु छिरकत तकि तकि कुंकुम पूरि॥
कबहुँ कबहुँ चंदन तरु निर्मित तरल हिंडोल।
चढ़ि दोऊ जन झूलत फूलत करत कलोल॥
वर हिंडोर झँकोरनि कामिनि अधिक डरात।
पुलकि पुलकि वेपथु अँग प्रीतम उर लपटात॥
हित चिंतक निजु चेरिनु उर आनँद न समात।
निरखि निपट नैननि सुख त्रिन तोरतिं बलि जात॥
अति उदार विवि सुंदर सुरत सूर सुकुमार।
(जै श्री) हित हरिवंश करौ दिन दोऊ अचल विहार॥
– हित चौरासी, पद ५७
५८ • • हित चौरासी
अस्तु ; गोस्वामी श्रीहित हरिवंश चन्द्र का नित्य विहार एक विलक्षण
और अत्यन्त गूढ़ है, जिसके लिये श्रीध्रुवदासजी ने लिखा है-
जो रस कह्यौ हरिवंश हित विरलौ समुझन हार।
एक दोई जो पाइये खोजत सब संसार॥
क्योंकि इन्होंने अत्यन्त सूक्ष्म प्रेम की बात कही है। इस सूक्ष्म प्रेम का
सरस गान 'हित चौरासी' की पदावली है। यद्यपि श्रीहरिवंश कृपा के बिना उस
गान रस में किसी का प्रवेश नहीं है तथापि चञ्चु प्रवेश के ही लिये सही, उस
विधा का इस प्राक्कथन में दिग्दर्शन कराया गया है अतएव पाठकों से विनम्र
प्रार्थना है कि 'हित चौरासी' में जो कुछ है उसे रसिक जनों की कृपा के द्वारा
समझें सुनें और अन्तर्गत करें।
विनीत
हितदास
श्रीहित हरिवंश चन्द्रो जयति।
श्रीहित राधावल्लभो जयति।
हित चौरासी
(सार्थ एवं सटिप्पण)
- १ -
अवतरण—श्रीराधा पद पङ्कज मधुकर, रसिकावतंस अनन्त श्रीगोस्वामी
हित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु पाद ने महामधुर एवं परमोज्वल शृङ्गार—श्रीवृन्दावन
रस विलास की जो अजस्र एवं अनुपम प्रेम तरङ्गिणी प्रवाहित की है, उसकी
एक एक छलक प्रत्येक कल्लोल ही 'हित चौरासी' के प्रत्येक पद हैं। प्रथम
छलक रूप इस पद में प्रेमोत्सर्ग और 'तत्सुखित्व सुखितम्' की महान् एवं
सर्वोत्कृष्ट झाँकी है। इसमें प्रेम की एकात्मता का गहरा परिचय मिलता है। यह
पद रस सिद्धान्त का मूल है—प्राण है। इस पद वर्णना में श्रीहिताचार्य्य चरण ने
श्रीराधा के मुख से (श्रीहित अलि के प्रति) जो कुछ कहलवाया है, उससे युगल
किशोर के पारस्परिक असीम प्रेम, त्याग तत्सुखित्व, सेवा भाव ऐकान्तिक
एकात्म भाव का सुन्दर दर्शन होता है।
अस्तु, रसधाम श्री वृन्दावन में वसन्त की सुहावनी सन्ध्या है। समस्त
वन अरुणिम नव नव पल्लव से सज्जित एवं पुष्पों से आभूषित हो रहा है, मानो
आनन्द मोद में झूम झूम कर रँग रलियाँ सी कर रहा है। प्रेमामृत वाहिनी
कलिन्द नन्दिनी के सुरम्य तट पर परम मनोहर एवं दिव्य लता भवन है। लता
गृह के चारों ओर सखि समूह अपने अपने सेवा कार्य में संलग्न हैं। कुंज के
अभ्यन्तर कक्ष में प्रेम, माधुर्य्य एवं रस की अधिष्ठात्री नवल किशोरी श्रीराधा
अपने कोटि प्राणोपम प्रियतम के सुकण्ठ में अपनी कोमल बाहु लता लपेटे
सुन्दर सुकोमल कुसुम शय्या पर विराज रही हैं। सम्मुख निकट ही मणिमय
चौकी पर रूप लावण्यमयी, दिव्य गुण गण विचक्षणा, प्रेम प्रतिमा श्रीहित
सजनि ऐसी शोभित हैं जैसे दूसरी नवल किशोरी श्रीराधा।
६० • * हित चौरासी
ऐसे सुख पूर्ण, अवसर में रस का स्रोत प्रवाहित करती हुई रसेश्वरी
श्रीप्रियाजी ने अपनी निकट सहचरि श्रीहित सजनि से कहा-
श्रीहित अलि-राधावल्लभीय रसोपासना क्षेत्र में रसिक महानुभावों ने
रसिकाचार्य्य श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभुपाद के मुख्यतः चार रूप बताये हैं-
(१) आचार्य्य रूप – व्यास नन्दन एवं तारा तनय श्रीहित हरिवंश
(२) वंशीरूप – श्रीकृष्ण के अधरों से लगी श्रीराधा का यशोगान
कारिणी युगल की नित्य संगिनी
(३) श्रीराधा सहचरी रूप- निकुञ्जेश्वरी श्रीराधा की स्वरूप भूता
अन्तरङ्ग सहचरि, सखि, सहेली सजनि और दासी आदि रूपों से निरन्तर
छायावत् साथ रहते हुए सुख चिन्तन करने वाली एक अन्तरङ्ग सखि जिसे
हित अलि, हित सखि, हित सजनि आदि नामों से कहा गया है।
(४) सर्व व्यापक हित रूप – ब्रज साहित्य में 'हित' शब्द का सरलार्थ
प्रेम है। ये श्रीहित हरिवंशचन्द्र उसी 'हित' अर्थात् प्रेम के अवतार हैं। यह इस
प्रकार है कि आप भगवान श्रीकृष्ण की वंशी के अवतार हैं और वंशी साक्षात्
प्रेम रूपा है। जैसा कि पद्म पुराण में कहा है-
वंशी तत्प्रेम रूपिका।
वंशी उन (श्रीकृष्ण) की प्रेम रूपा है'। और श्रीहित हरिवंश चन्द्र स्वयमेव
वंशी हैं)
यथा-
त्वमसि हि हरिवंश श्याम चन्द्रस्य वंशः,
परम रसद्नादैर्मोहिताऽशेष विश्वः।
– श्रीप्रबोधानन्द सरस्वती पाद
(हे हरिवंशचन्द्र ! यह निश्चय है कि आप स्वयं श्रीकृष्ण की वंशी के
अवतार हैं; जिस वंशी ने अपने परम रसमय नाद से सम्पूर्ण विश्व को मोहित
कर लिया था) प्रेम ही परमात्मा है, सर्वोपरि तत्व है। यह प्रेम निर्गुण सगुण
व्यापक, एवं महान् है। अतः प्रेम रूप श्रीहित हरिवंशचन्द्र भी व्यापक हैं।
हित चौरासी • • ६१
राग विभास
मूल – जोई जोई प्यारौ करै, सोई मोहिं भावै;
भावै मोहिं जोई, सोई सोई करें प्यारे।
मोकौं तो भाँवती ठौर प्यारे के नैननि में।
प्यारौ भयौ चाहै मेरे नैननि के तारे।।
मेरे तन मन प्रानहूँ तें प्रीतम प्रिय;
अपने कोटिक प्रान प्रीतम मोसौ हारे।
(जै श्री) हित हरिवंश हंस हंसिनी साँवल गौर
कहौ कौन करै जल तरंगनि न्यारे।।१।।
भावार्थ–(श्रीप्रियाजी ने कहा"हे सखि!) प्यारे श्रीलालजी जो जो भी कुछ
करते हैं, मुझे वह सभी प्रिय लगता है और मुझे जो कुछ प्रिय लगता है, वे भी
वही सब करते हैं। यदि मुझे केवल उनके ही नेत्रों में रहने योग्य सुहावना स्थल
है तो वह भी मेरे नयनों के तारे (पुतलियाँ) बन जाना चाहते हैं। सखि ! वे मुझे
मेरे अपने तन, मन और प्राणों से भी अधिक प्रिय हैं परंतु उन्होंने तो मुझ पर
अपने कोटि कोटि प्राण न्यौछावर कर दिये हैं। श्रीराधा की प्रेम विभोरता से
भावित श्रीहित सजनी (हित हरिवंश) ने कहा–
"हे श्यामल गौर ! आप दोनों वृन्दावन प्रेम पयोधि रूप मान सरोवर के
हंस हंसिनी हैं। आप जल तरङ्गवत अपृथक हैं तब आपको पृथक कर ही कौन
सकता है ?
टिप्पणी-(१) जल तरंगनिः-
श्रीराधा और श्रीकृष्ण केवल कथनमात्र के लिये ही दो हैं, वास्तव में तो
ये एक ही प्रेम तत्व के दो विग्रह हैं। इनके तन दो हैं किन्तु मन, प्राण, आत्मा
एक ही हैं। क्रीड़ा के लिये ही एक प्रेम ने अपने दो और इसीप्रकार अनेक रूप
धारण कर रखे हैं। इनके युगल स्वरूप के एकत्व समर्थन के विषय में शास्त्रों
में अनेकों वाक्य मिलते हैं यथा-संहिता में–
यः कृष्णः सापि राधा या राधा कृष्ण एव सः।
(जो श्रीकृष्ण हैं, वही श्रीराधा हैं और जो श्रीराधा हैं वही श्रीकृष्ण हैं।)
६२ • • हित चौरासी
इसी प्रकार श्रीराधा तापिन्युपनिषद् में भी-
ये यं राधा यश्च कृष्णो रसाब्धि-
र्देहश्चैकः क्रीडनार्थं द्विधाऽभूत्।।
"(ये रससमुद्र श्रीराधा और श्रीकृष्ण वास्तव में एक देह हैं, केवल क्रीड़ा
के लिये ही दो होकर प्रकट हैं।)"
ऐसे ही वहीं श्रीराधातापिन्युपनिषद् में फिर भी
राधया सहिते देवो माधवे नैव राधिका।
योऽनयोर्भेदं पश्यति स संसृतेर्मुक्तो न भवति।
यस्तु राधां विना तं ध्यायति, प्रवदति, प्रपठति स मूढतमोत्तमः।
(श्रीराधा के सहित श्रीकृष्ण ही पूर्ण श्रीकृष्ण हैं। जो इन दोनों में भेद
दृष्टि रखता है, वह कभी संसृति (आवागमन रूप संसार) से मुक्त नहीं हो
सकता। जो श्रीराधा के बिना माधव का सेवन करता, पठन करता और कथन
वर्णन करता है वह मूढ़ों में भी महामूढ़ है)
अतएव श्रीहिताचार्य्य पाद ने यहाँ जल तरङ्गवत् कहकर दोनों की एकता
प्रकट की है।
(२) जोई जोई प्यारो करै सोई मोहिं भावै;
भावै मोहिं जोई सोई करैं प्यारे।
इस पंक्ति में श्रीप्रियाजी ने यह बताया है कि मुझे अपने प्रियतम की सब
चेष्टाएँ प्रिय लगती हैं और मुझे उनका कुछ भी अप्रिय नहीं है परन्तु विशेषता
यह है कि प्रियतम भी वही करते हैं जो कुछ मुझे प्रिय है और जो मुझे अप्रिय है
उसे तो वे कभी भूलकर भी नहीं करते इस कथन में दोनों के चित्तों की एकता
प्रकाश मिलता है।
दूसरी पंक्ति-
मोकौं तो भाँवती ठौर प्यारे के नैननिं में,
प्यारौ भयौ चाहै मेरे नैननिं के तारे।
इसमें यह बताया गया है कि दोनों-प्रिया प्रियतम एक दूसरे के
सौन्दर्य-माधुर्य्य पर पूर्ण मुग्ध हैं। इन दोनों की दृष्टियों में विश्व के अन्य
हित चौरासी • • ६३
सौन्दर्य आते तक नहीं। यदि श्रीप्रियाजी को प्रियतम के नयनों में भाँवती ठौर
है, तो प्रियतम भी उनकी आँखों के तारे बन जाना चाहते हैं। जब आखों के तारे
ही बन जायेंगे, तब तो अपने प्रिय-पात्र के सिवाय और कुछ दिखेगा ही नहीं,
प्रियतम मय त्रिलोकी बन जायगी। कितनी साध है आत्मसात हो जाने की ?
इस आत्म सात भावना के साथ साथ विश्व विस्मृति की भी कैसी अव्यक्त
सूचना मिलती है इस कथन में !
मेरे तन मन प्रानहूँ तें प्रीतम प्रिय
अपने कोटिक प्रान प्रीतम मोसों हारे।
इस पंक्ति में प्रेम के महान् उत्सर्ग का रूप है जहाँ युगल किशोर ने
अपने कोटि कोटि प्राण एक दूसरे पर न्योछावर कर रखे हैं।
स्पष्ट है कि प्रेम राज्य में प्रतिक्षण त्याग पूर्वक प्रेमास्पद के प्रति पूर्ण
तत्सुख भावना निवास करती है। और यही प्रेम का सहज स्वभाव है। उक्त पंक्ति
में दूसरी बात यह है कि प्रेमास्पद के प्रति किये गये अपने महान्तम प्रेम को भी
प्रेमी अत्यन्त नगण्य मानता है और प्रेमास्पद के अल्प प्रेम को भी महान
समझता है।
प्रेमी प्रेमास्पद एक विशाल 'प्रेम गरीबी' लिये रहते हैं यह प्रेम गरीबी
बहुत ही स्वाभाविक है। 'मेरे तन मन हारे' इस पंक्ति में प्रेम गरीबी का बड़ा ही
सरस चित्र अङ्कित किया गया है। प्रेम मणि श्रीप्रियाजी अपने प्रति किये गये
श्रीलालजी के प्रेम को स्वयं अपने प्रेम से कोटि कोटि गुना मान रही हैं।
इसके सिवाय एक बात और भी यह ध्वनित हो रही है कि जिस प्रेम में
कोटि कोटि तन मन और प्राण न्योछावर किये जा सकते हैं, उसमें फिर और
क्या शेष रह जाता है ? सबको अपने अपने तन, मन प्राण और आत्मा ही
सबसे अधिक प्रिय हैं वरं आत्मा की प्रियता से ही सर्वत्र प्रियता आभासित होती
है किन्तु जब वही प्राण, तन, मन आत्मा उस प्रेम पर न्यौछावर हो गये, तब
अन्यान्य लोक वैभव स्वर्ग-भोग किंवा मोक्ष पर्यन्त की क्या महत्ता है ? यथा-
'लोक वेद कुलकानि सब, देत बहाये प्रेम।
(रसखान)
६४ - • हित चौरासी
अस्तु दोनों प्रेमी हैं, दोनों प्रेमास्पद हैं। दोनों दोनों पर अपने कोटि कोटि
प्राणों को न्यौछावर करते हैं, दोनों प्रेम सरोवर के हंस हंसिनी हैं ये दो होकर भी
एक हैं ऐसा ही कुछ महात्मा श्रीभगवत रसिकजी ने कहा है-
परस्पर दोउ चकोर दोउ चंदा।
दोउ चातक, दोउ स्वाति, दोउ घन, दोउ दामिनी अमन्दा।।
दोउ अरविंद, दोऊ अलि लंपट, दोऊ लोहा, दोऊ चुम्बक।
दोऊ आशिक, महबूब दोऊ मिलि, जुरे जराफा अंबक।।
दोऊ मुदार, दोउ मोर, दोऊ मृग, दोऊ राग रस भीने।
दोउ मनि विसद, दोऊ पर पन्नग, दोऊ वारि दोउ मीने।।
'भगवत रसिक' विहारिनि प्यारी रसिक विहारी प्यारे।
दोउ मुख देखि जियत अधरामृत पियत होत नहिं न्यारे।।
- २ -
अवतरण-किसी विशेष सम्भ्रम से श्रीस्वामिनी को मान हो गया है। वे
निकुञ्जान्तर भाग में विमना सी बैठी हैं। श्रीस्वामिनीजी को श्रीहित सजनि
मधुर वचनों द्वारा चाटुकारी करती हुई प्रसन्न करना चाह रही हैं अतएव
श्रीलालजी के गुण, रूप आदि के प्रशंसा पूर्ण शब्दों द्वारा उनके चित्त में प्रियतम
मिलन का प्रलोभन उत्पन्न कर रही हैं। कुछ ही समय में उनका प्रयास सफल
भी हो जाता है और सहज ही भोली श्रीराधा का मान कर्पूर की भाँति उड़ जाता
है। पश्चात् वे शीघ्र ही अपने प्राणाधार प्रियतम से जा मिलती हैं। इस पद में
उसी सरस वचन रचना और मान भञ्जन भावना का वर्णन है। मानवती श्रीप्रियाजी
से हित सजनि ने कहा-
राग -विभास
मूल - प्यारे बोली भामिनी, आजु नीकी जामिनी;
भेंटि नवीन मेघ सौं दामिनी।।
मोंहन रसिक राइ री माई तासौं जु मान करै,
ऐसी कौन कामिनी।
हित चौरासी • • ६५
(जै श्री) हित हरिवंश श्रवन सुनत प्यारी राधिका,
रमन सौं मिली गज गामिनी॥२॥
भावार्थ-(श्रीहित अलि ने कहा-) 'हे भामिनि ! (तुम्हें) प्यारे (श्रीकृष्ण)
ने बुलाया है। (देखो) आज (कैसी) सुन्दर रात्रि है ? अतः आप नवीन मेघ (रूप
श्रीलालजी) से ऐसे भेंटिये (मिलिये) जैसे दामिनि। अरी माई ! मोहन लाल
रसिक राज से मान करे भला ऐसी कौन कामिनी होगी ?
श्रीहित हरिवंश चन्द्र कहते हैं कि (सखि के) उक्त शब्द सुनते ही गज
गामिनि प्यारी राधिका अपने रमण (प्रियतम) से जा मिलीं।
– ३ –
अवतरण-श्रीवृन्दावन के मञ्जुल निकुञ्ज भवन में सम्पूर्ण रात्रि युगल
किशोर ने ऐकान्तिक रति विहार किया है। प्रातः काल उनकी रति विगलित
स्थिति को देखकर सखियाँ परस्पर में युगल किशोर के रति सूचक चिह्नों का
दर्शन करती हुई आनन्द मग्न हो रही हैं। उसी समय श्रीहित सखीजी अन्यान्य
(ललितादि) सखियों से युगल किशोर की प्रातः कालीन सुखान्त छवि का
वर्णन करती हैं-
राग-विभास
मूल-प्रात समै दोऊ रस लंपट,
सुरत जुद्ध जय जुत अति फूल।
श्रम-वारिज घन बिंदु वदन पर
भूषन अंगहिं अंग विकूल।।
कछु रह्यौ तिलक सिथिल अलकावलि,
वदन कमल मानौं अलि भूल।
(जै श्री) हित हरिवंश मदन रँग रँगि रहे,
नैन बैन कटि सिथिल दुकूल॥३॥
भावार्थ-प्रातः काल दोनों रस लम्पट सुरत-युद्ध में विजय एवं प्रसन्नता
पूर्वक संलग्न हैं। मुख पर श्रम वारि (प्रस्वेद) की सघन बूँदें शुभ्र मौक्तिक जैसी
६६ • • हित चौरासी
शोभित हैं एवं समस्त अङ्ग प्रत्यङ्गों के आभरण अस्त व्यस्त हैं। (ललाट पटल
का) तिलक कुछ कुछ शेष रह गया है। अलकावलि शिथिल (ढीली) हो चुकी है
(और बिखर रही है, जिससे ऐसा) विदित होता है कि वदन कमल पर प्रमत्त
भ्रमर मँडरा रहे हैं।
श्रीहित हरिवंश कहते हैं कि (युगल किशोर) प्रेम (मदन) के (आनन्द) रङ्ग
में रञ्जित हो रहे हैं, उनके नयन वचन, कटि एवं कटि के वस्त्र (सारी आदि)
सभी तो शिथिल हैं।
टिप्पणी—
'मदन रँग रँगि रहे'
श्रीवृन्दावन विहार में शृङ्गार और शृङ्गारोत्तर रस की ही प्रधानता है। इस
रस का वर्णन करने में रसिकाचार्य्य एवं रसिक महानुभावों ने यत्र-तत्र प्रेम के
विशुद्ध अर्थ में काम, मदन, मार, स्मर, मन्मथ, मनसिज, मनोज आदि शब्दों
का प्रयोग किया है। चूंकि उक्त सभी शब्द 'कामदेव' के ही अर्थ के वाचक हैं,
तथापि उन महात्माओं का भाव और अर्थ इन प्रयोगों में प्रेम से ही रहा है।
शास्त्रों एवं सन्तों ने इसका बड़ा सुन्दर स्पष्टीकरण किया है। 'श्रीचैतन्य
चरितामृत' के प्रणेता श्रीकृष्ण दासजी ने काम और प्रेम का अर्थ समझाते हुए
कहा है—
आत्मेन्द्रिय प्रीति इच्छा तार काम नाम।
श्रीकृष्णोर प्रीति इच्छा तार प्रेम नाम।।
अतएव काम प्रेमे बहोत अन्तर।
काम अन्धतम प्रेम निर्मल भास्कर।।
अतएव गोपीगण न करे विचार।
कृष्ण सुख हेतु करे संगम विहार।।
(निज सुख की वासना ही काम है और प्रेमास्पद को सुखों की पूर्ति
करना ही प्रेम है। इस न्याय से सखियों किंवा श्रीप्रिया प्रियतम का प्रेम, पूर्ण
तत्सुख रूप होने से काम आदि शब्दों के द्वारा प्रकट किये जाने पर भी उज्ज्वल
प्रेम है।
हित चौरासी • • ६७
दूसरे इस दिव्य शृङ्गार रस को काम आदि शब्दों से प्रकट करने का एक
तात्पर्य और भी यह है कि यह वृन्दावन विहार रस स्थूल दृष्टि से देखने पर
'काम रस' जैसा ही दिखता है किंतु वास्तव में वह ऐसा है नहीं। इसे यों समझ
सकते हैं जैसे शुद्ध खाँड़ से एक तूँबी का आकार निर्मित कर दिया जाय; जो
केवल देखने में कड़वी तूँबी सी दिखने पर अन्तर बहिर माधुर्य से ओत प्रोत
हो।
उक्त प्रसङ्गों में व्यवहृत 'काम' शब्द के अर्थ को श्रीगोपाल तापिन्युपनिषद
में इस प्रकार समझाया गया है-
प्रेमैव गोप रामाणां काम इत्यगमत् प्रथाम्।
"(इन गोप रमणियों का प्रेम ही काम नाम से कहे जाने की परिपाटी है)
– ४ –
अवतरण—मनोरम प्रातः काल है। रुचिर कुञ्ज भवन में सम्पूर्ण रात्रि भर
श्रीयुगल किशोर रसिक राज किसी अनिर्वचनीय रस विहार में तल्लीन रहे हैं,
फिर भी दोनों के चित्तों से रस की लालसा न्यून नहीं हुई वरं वृद्धि को ही प्राप्त
हुई है किन्तु प्रातः काल होने से विवशता पूर्वक विहार–उपरत होना पड़ा है।
जिन प्रेम मयी सखियों ने सम्पूर्ण रात्रि कुञ्ज रन्ध्रों से लगकर विहार दर्शन
पूर्वक अपना जीवन रखा है, वे अरुणोदय काल में अनन्त अनन्त यूथों के रूप
में रुचिर कुञ्ज प्राङ्गण में उपस्थित हैं। समस्त साभिलाष सखियों की भावनाओं
की साक्षी श्रीहित सजनि कुञ्ज के अन्तर्भाग में प्रवेश करती हैं। वहाँ पर
श्रीस्वामिनी जी की रति विगलित दशा का अपूर्व दर्शन करके कुछ मुसका
देती हैं। हित सजनि की विशेषार्थ व्यञ्जिका हँसी से सङ्कुचित होकर श्रीप्रियाजी
लजा जाती हैं एवं अपने रति रस सूचक चिह्नों को छिपाने लगती हैं। तब उनके
संगोपन रूप व्यर्थ प्रयास की उपेक्षा पूर्वक रस–वृद्धि करती हुई श्रीहित अलिजी
कहती हैं–