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सर्वकोश
हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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पृष्ठ 238

हित चौरासी • • २३१
कान्हरौ
मूल-खंजन मीन मृगज मद मेंटत,
कहा कहौं नैननि की बातैं।
सुनि सुंदरी कहाँ लौं सिखईं,
मोहन बसीकरन की घातैं।।
बंक निसंक चपल अनियारे,
अरुन स्याम सित रचे कहाँ तैं।
डरत न हरत परायौ सर्वसु;
मृदु मधुमिव मादिक दृग पातैं।।
नैंकु प्रसन्न दृष्टि पूरन करि,
नहिं मोतन चितयौ प्रमदा तैं।
(जै श्री) हित हरिवंश हंस कल गामिनि,
भावै सो करहु प्रेम के नातैं।।७३।।
भावार्थ – (श्रीहित अलि ने कहा- "हे राधे!) मैं तुम्हारे नयनों की क्या
बातें कहूँ ये तो खंजन, मीन एवं मृग छौनों का भी मद चूर चूर कर रहे हैं। हे
सुन्दरि! सुनो तुमने मोहन को अपने वश में कर लेने के लिये कितनी कितनी
युक्तियाँ सोच रखी हैं ? (उन अनेक युक्तियों में से नयनों की सुन्दरता भी एक
युक्ति है।) अरी ! तुमने ये तिरछे, नुकीले, चञ्चल, और वेखटक (निडर) इसी
तरह अरुनारे, श्याम और स्वेत (वर्णों से युक्त) नयन कहाँ से बनाकर तैयार
कर लिये? इन लोचनों की मीठी मदिरा जैसी मद पूर्ण चोटों से दूसरे का
सर्वस्व अपहरण करते तुम्हें डर भी नहीं लगता?"
हे प्रमोद मयी प्रमदे ! तुमने आज तक कभी मेरी ओर प्रसन्नता पूर्वक प्रेम
पूर्ण दृष्टि से तनिक भी नहीं देखा ! (अतः ऐसी दृष्टि से देख देना तो उचित ही
है पर यदि न देखना चाहो तो) तुम्हारी इच्छा ! जो चाहो सो करो ! हे हंस कल
गामिनि! प्रेम के नाते से हमें यह सब स्वीकार है।
टिप्पणी – इस पद में श्रीप्रियाजी के नेत्रों के सौन्दर्य्य की अनुपम रीति
से वर्णना है। इन परम सौन्दर्य्य मयी प्रियाजी के रूप के एक कण मात्र का भी
वर्णन करने में समस्त कवि कुल मण्डली अपना सिर झुका देती है-असमर्थता
प्रकट कर देती है फिर रस के तीव्र आयुध आपके नयनों का वर्णन कर ही कौन