हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८८ • • हित चौरासी
अहौ प्यारी जू। या खेलि विषै तुम्हारी भाइ भरी भृकुटी हैं, सोई तौ धनुक
हैं, और नेत्र हैं सोई चापि है। तिनमें कटाक्ष हैं, सोई बान हैं। तिन करि प्रीतम के
मन रूपी मृग कौं वलात्कार सौं बेध्यौ है। हेत यह कै प्रीतम कौं प्रेम सौं रस बस
करौ है। इति।।
इस अर्थ में चापि का अर्थ डोरी किया जा सकता है जो धनुष पर वाण
खींचने के लिये होती है। किन्तु टीका में भी ज्यों का त्यों चापि रख दिया गया
है। टीकाकार का भाव चापि के लिये धनुष का ही है, या डोरी का या वाण का
कुछ समझ में नहीं आ रहा है। वैसे तो चाप का सरलार्थ धनुष ही सर्वत्र किया
जाता है। इस न्याय से भृकुटि धनुषों पर दृग धनुषों (चाप) का चढ़ाना कैसे
सम्भव है ?
चापि का अर्थ व्याकरण के अनुसार च+अपि=चापि; च=और अपि=भी
अर्थात् चापि=और भी विशेष, अधिक ऐसा मान लिया जाय तो 'मानस मृग.
.. चापि' इस पङ्क्ति का अर्थ निम्न प्रकार से गठित होगा-
(श्रीप्रियाजी, श्रीलालजी के) मानस मृग को वल पूर्वक (मानस मृग वल)
बेध रही (बेधत) हैं, भृकुटि रूप धनुष एवं विशेष दृगों से, (भृकुटि धनुष दृग
चापि।)
अब यह प्रश्न होता है कि वे विशेष दृग (दृग चापि) क्या हैं ? उनका
परिचय लीजिये-
खंजन मीन मृगज मद मेंटत, कहा कहौं नैननि की बातैं।
सुनि सुंदरी कहाँ लौं सिखई, मोहन बसीकरन की घातैं।।
बंक निसंक चपल अनियारे अरुन स्याम सित रचे कहाँ तैं।
डरत न हरत परायौ सर्वसु मृदु मधुमिव मादिक दृग पातैं।।
इसी उक्त पद की छाया लेकर पीयूष वर्षी विहारी ने एक सूत्र लिख
दिया-
अमी, हलाहल, मद भरे; स्वेत, स्याँम, रतनार।
जियत, मरत, झुकि झुकि परत; जेहिं चितवत इक बार।।