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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

पृष्ठ 187, कुल 275 में से

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पृष्ठ 187

हित चौरासी • • १८१
किन्तु सौन्दर्य्य का भार न सह सकने के कारण) उन (बाहुओं एवं नयनों) की
गति (शिथिल होकर) विचलित हो गयी खिसक पड़ी अर्थात् दामिनि के सुखद
एवं मादक स्पर्श ने श्याम घन श्रीकृष्ण को विचलित कर दिया। किन्तु [फिर
भी श्याम घन श्रीकृष्ण के] मन में पूर्ण शरद शशि [वत श्री प्रियाजी के मुख]
को भेंट लेने (चुम्बन आदि लेने) का लोभ रहा ही आया। [इस प्रकार भूतल
स्थित दामिनी श्रीराधा श्याम घटा रूप श्रीकृष्ण को विचलित करके आकाश
स्थित दामिनि से विजयी हुई; क्योंकि आकाश तड़ित मेघ को विचलित न कर
ही सकी, और न उसने उसमें कोई हलचल ही उत्पन्न की; इसलिये यह हार
गयी। अन्ततोगत्वा इस होड़ से गौर वदनि दामिनि श्रीप्रियाजी के रूप सौन्दर्य्य
की श्रेष्ठता सिद्ध हुई।]

  • ५६ -
    अवतरण- युगल किशोर का सुख ही रसिक सखियों का सुख है;
    क्योंकि ये सखियाँ युगल के प्रति 'तत्सुख सुखित्वम्' की भावना में ही पगी हैं।
    इस पद में आशीर्वादात्मक पद्धति से जो कुछ कहा गया है; उससे यही
    उक्त ध्वनि, ध्वनित हो रही है। युगल सरकार सदा सर्वदा श्रीवृन्दावन की नव
    निकुञ्ज कुटी में आमोद प्रमोद, हास परिहास, रास विलास और रति विहार
    करते रहें और हम सखिजन उस विलास सुख का दर्शन करती रहें, यही
    हमारा परम और चरम सुख है। यह नित्य विहार की नित्य सिद्धा सखियों की
    भावना है। इसी भावना का आभास, श्रीहित हरिवंश चन्द्र रसिकाचार्य्य वर्य्य
    नित्य सहचरि भाव से रसोपासक रसिक जनों को इस प्रकार करा रहे हैं-
    मलार
    मूल-हौं बलि जाऊँ नागरी स्याम।
    ऐसें ही रंग करौ निसि वासर, वृंदा विपिन कुटी अभिराम।।
    हास विलास सुरत रस सिंचन, पसुपति दग्ध जिवावत काम।
    (जै श्री) हित हरिवंश लोल लोचन अलि,
    करहु न सफल सकल सुख धाम।।