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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

पृष्ठ 183, कुल 275 में से

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पृष्ठ 183

हित चौरासी • • १७७
प्रेम सदा बढ़िवौ करै प्रतिछिन कला अशेष।
पै पूनौँ यामें नहीं तातैं प्रेम विशेष॥
-रसखानिजी
(२) नवरंग-जहाँ पर ऐसा प्रतिक्षण वर्द्धमान् प्रेम है, वहीं आनन्द है-रङ्ग
है। शरीरों के संयोग में आनन्द नहीं, आनन्द तो है मन एवं आत्मा के मिलन में,
प्रेम में।
युगल किशोर का परस्पर में एक दूसरे के प्रति अपार प्रेम है अतः उनके
बीच भी नवीन नवीन आनन्द की नित्य उत्पत्ति होनी भी स्वाभाविक है। इसनित्य
नव प्रेमानन्द की उत्पत्ति एवं विलास किस प्रकार युगल में होता रहता है,
श्रीहित ध्रुवदासजी के मुख से सुनिये-
बृंदावन में सिन्धु द्वै, उमड़े रहत अपार।
प्रेम मदन रस सौं भरे, राजत रंग अपार॥
प्रेम नेम रति रंग सुख, दिनहिं परस्पर होत।
पल पल नव नव दसा फिरै, सहजहिं ओत प्रोत।।
अदभुत जुगल किसोर रस, छिन छिन औरै और।
प्रेम मगन विलसत दोऊ रसिकनि मनि सिरमौर॥
-रंग विनोद लीला से
(३) नयौ रस- यह नित्य विहार रस, नित्य निरन्तर एक रस रहकर भी
नवीन है। एक रस इसलिये कि इसमें न तो कभी किसी प्रकार न्यूनता का
आभास ही होता ओर न इसमें अन्य किन्हीं भावों (दास्य, सख्य, वात्सल्य, शान्त
किंवा ऐश्वर्य, ज्ञान, वैराग्य, माहात्म्य आदि) का प्रवेश ही है। हाँ स्वयं यह
अत्युज्ज्वल शृङ्गार रस स्वयं भले ही उक्त भावों का रूप रस विलास में धारण
करले। यथा-
रद छद में वीभत्स रस, हाथापाई वीर।
कंप भयानक जानिये, रौद्र छुड़ावै धीर॥
वैसे यह नित्य विहार सर्वदा एक रस और नित्य नूतन है। यहाँ निरन्तर
नये ही नये रस की उत्पत्ति और आस्वादन होता रहता है। सो किस प्रकार ?
श्रीध्रुवदास जी बताते हैं-