हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहित चौरासी • • १३६
श्रीहित अलि जी इस शारदीय महारास का मधु मय वर्णन अपनी निज
सखियों को सुना रही हैं-
सारँग
मूल-आजु बन नीकौ रास बनायौ।
पुलिन पवित्र सुभग जमुना तट मोंहन बैंनु बजायौ।।
कल कंकन किंकिनि नूपुर धुनि सुनि खग मृग सचु पायौ।
जुवतिनु मंडल मध्य स्याम घन सारँग राग जमायौ।।
ताल मृदंग उपंग मुरज डफ मिलि रससिंधु बढ़ायौ।
विविध विशद वृषभानु नंदिनी अंग सुधंग दिखायौ।।
अभिनय निपुन लटकि लट लोचन भृकुटि अनंग नचायौ।
ताता थेई ताथेई धरत नौतन गति पति ब्रजराज रिझायौ।।
सकल उदार नृपति चूडामनि सुख वारिद वरषायौ।
परिरंभन चुंबन आलिंगन* उचित जुवति जन पायौ।।
वरसत कुसुम मुदित नभ नाइक इंद्र निसान बजायौ।
(जै श्री) हित हरिवंश रसिक राधा पति जस वितान जग छायौ।।३६।।
भावार्थ-यमुना तटवर्त्ती सुन्दर एवं पवित्र पुलिन पर मोहन ने वेणु बजायी
है और उन्होंने सुन्दर रास की रचना की है। रास में कङ्कण किङ्किणि एवं नूपुरों
की मधुर मधुर ध्वनि को सुनकर खग मृग सभी सुख प्राप्त कर रहे हैं। युवति
मण्डल के मध्य में विराजित श्याम घन ने (मुरली में) सारङ्ग राग जमाया है
और उस स्वर से मिलकर बजते हुए ताल वाद्य मृदङ्ग, उपङ्ग, मुरज एवं डफ
आदि रस समुद्र का विवर्द्धन कर रहे हैं। (रासोन्मत्त होकर) श्रीवृषभानु नन्दिनी
जू ने अनेकों प्रकार से अपने विशद अङ्ग -सुधङ्ग का दिग्दर्शन कराया है।
तथा उन अभिनय निपुण (श्रीप्रियाजी) ने लटक के साथ, ललित लोचनों को
*'आलिङ्गन' और 'परिरम्भन'-चूँकि ये दोनों ही शब्द एक सा अर्थ रखते हैं तथापि
यहाँ दोनों का प्रयोग विशेष विशेष अर्थों में किया गया है अर्थात् आलिङ्गन से
साधारण भाव पूर्वक भेंट का अर्थ लेना चाहिये और परिरम्भण से अत्यन्त गाढ़ प्रीति
के आलिङ्गन-भेंट से।