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हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

[ ६३ ]
इस प्रकार सिद्दी को परास्त किया गया और वह हिन्दू
के अधीन एक छोटी सी रियासत के रूप में दिन काटने लगा।
पुर्तगेजों को मरहठों के साथ अकेले ही लड़ना पड़ा। जब से न०।
की शक्ति का विकास हुआ था तब से उनको भारत में
विजयों और खम्बयात से लेकर लंका तक सारे पश्चिमी भाग
छाये हुए प्रभाव का धीरे २ ह्रास हो रहा था। उनके द्वारा धर्म
किये हुए उनके अत्याचार मुसलमानों की अपेक्षा किसी तरह से
भी कम भयंकर न थे। पुर्तगेजी कोंकण के पीड़ित हिन्दुओं ने जब देखा
कि सिद्दियों के अधीन रहने वाले कोंकण निवासियों ने अपनी दासता
की जंजीरें काट दी हैं तो उन्होंने भी मरहठा सेना से सहायता पाने
की आशा प्रकट की। वहां के सारे हिन्दुओं में देश भक्ति की लहर
दौड़ गई, और उन्होंने विधर्मियों के हिन्दुत्व को नष्ट कर देने के
पागलपन का मुक़ाबला बड़ी दृढ़ता से करना आरम्भ कर दिया। जब
मराठी सेना उनकी सीमा पर पहुँच गई तो पुर्तगेज भय के कारण
पागल से हो गए और उन्होंने हिन्दुओं के आन्दोलन को दबाने के
लिए घोर अत्याचार करने आरम्भ कर दिये। पुराने लिखित प्रमाणों
से पता लगता है कि उन्होंने बड़ी अधिक मात्रा में हिन्दू ज़मींदारों
की सम्पत्तियां जब्त कर लीं। सारे ग्रामों को घेर कर उन्हें तलवार के जोर
से ईसाई बना लिया। वे हिन्दू बच्चों को उठा कर ले गये। जिन
व्यक्तियों ने अपने धर्म को न छोड़ा उन्हें या तो पकड़ कर क़त्ल कर
दिया या उन्हें दास बना लिया। ब्राह्मण विशेष कर उनके रोष के
शिकार हुए। उन्हें घरों में ही क़ैद कर दिया गया। सारी हिन्दू जाति
को अपने उत्सव मनाने की भी मनाही कर दी गई। यदि कोई हिन्दू
अपने उत्सव मनाने का साहस भी करता तो उसका घर घेर लिया
जाता था। और उसके घर से सारे प्राणियों को धार्मिक न्यायालयों के
सम्मुख पेश किया जाता। वहां उन्हें या तो ज़बरदस्ती से ईसाई बना
लिया जाता था या उन्हें दास बना कर बेच दिया जाता था अथवा

[ ६४ ]

उनका वध कर दिया जाता था। परन्तु इन निर्दयतापूर्ण यातनाओं के
सम्मुख भी हिन्दू-नेता पुर्तगेज़ी शाशन की इन राक्षसी आज्ञाओं
का अवरोध करने पर ज़ोर देते रहे। सहस्रों व्यक्ति पुर्तगेज़ियों के रोष
का शिकार बने। अंत में हिन्दू-जनता के नेताओं—बासी ( वसीन )
और दूसरे प्रदेशों के देश मुखों और डसाइयों ने बाजीराव और
शाहूजी जी के साथ गुप्त रूप से पत्र-व्यवहार करना आरम्भ कर दिया।
उन्हों ने उन लोगों को अपनी स्वतन्त्रता तथा हिन्दू धर्म और देश
की मान रक्षा के लिये पुर्तगेज़ों पर आक्रमण करने पर वाधित किया।
वीर, साहसी, सर्व प्रिय और हिन्दुओं के हिन्दू—मलाद के सरदेसाई
अंताजी रघुनाथ ने पुर्तगेज़ी आज्ञा का खुले रूप से उल्लंघन किया।
और साथ ही उसने अपनी जागीर के लोगों को भी इस आज्ञा को भंग
करने के लिये प्रोत्साहित किया। उसने अपने धार्मिक त्योहारों को
खूब मनाया। परिणाम स्वरूप वह पुर्तगेज़ियों के अत्याचारों का शिकार
बन गया। उसे बंदी बनाया गया और गोआ के धार्मिक न्यायालय के
कठोर परीक्षण के लिये भेजा गया। हिन्दुओं का सौभाग्य समझिये कि
वह किसी प्रकार वहां से भाग निकला और सकुशल पूना पहुँच गया।
उसने एक गुप्त आयोजना की व्यवस्था की। उसने बाजीराव से प्रतिज्ञा
की जब मरहठी सेना पुर्तगेज़ी प्रदेश में प्रवेश करेगा तब वे उनकी सब
प्रकार से सहायता करेंगे और उनका हर प्रकार से पथ-प्रदर्शन करेंगे।
साथ ही उसने बाजीराव को विश्वास दिलाया कि पुर्तगेज़ी कोंकण
के सब हिन्दू आप को अवतार समझते हैं। उनका यह पूर्ण विश्वास
है कि आप का जन्म हिन्दुओं के अधर्मी बैरियों को दण्ड देने के लिए
ही हुआ है। सारी प्रजा बड़ी उत्सुकता के साथ, दैवी मुक्तिदाता के रूप
में आपकी प्रतीक्षा कर रही है।
यद्यपि मरहठे उस समय उत्तर में कई लड़ाइयां लड़ रहे थे और
उन्हें सारे भारत में युद्ध करने के कारण बहुत खर्च करना पड़ रहा था
तो भी बाजीराव ने कोंकण निवासी अपने सहधर्मियों और देशवासियों

[६५]

की करुणापूर्ण पुकार को अनसुना नहीं किया। बड़ी तीव्र गति, नीति
तथा परिश्रम से बाजीराव्रो ने देवी पार्वती के उपलक्ष्त मे एक बड़े तथा
अपूर्व महोत्सव के बहाने पूना में एक बड़ी भारी सेना एकत्रित कर
ली। सबको काम सम्हाल कर भविष्य में होने वाले युद्ध की बहिरेषा
तैयार की गई। चिम्णाजी अप्पा को सेनापति बनाया गया। रामचन्द्र
जोशी, अताजी और रामचन्द्र रघुनाथ तथा अन्य सरदारों और नायकों
को भिन्न २ मोर्चों पर भेजा गया। सन् १७३७ में मरहठी सेनाओं ने
पुर्तगेज़ों के 'थाना' के किले पर आक्रमण कर दिया, पुर्तगेज़ों ने अंत
समय तक मुकाबला किया पर अन्त में उन्हें किला मरहठों के हवाले करना
ही पड़ा। इस विजय की प्रसन्नता मे उन्होंने सलसट्टी पर भी धावा
बोल दिया। शंकरजी केशव ने अरनाला के क़िले पर अधिकार
जमा लिया और जोशी ने धारवी और पारसिक पर विजय प्राप्त कर
ली। गोआ के वायसराय को इन आपत्तियों के कारण बड़ा दुःख
पहुँचा। परिणामतः उसने एक बड़े शूरवीर योद्धा एटानियां को इस युद्ध
को जारी रखने के लिये भेजा। योरूप से और भी फौज मंगवा भेजी।
इस प्रकार सेनाओं को एकत्रित करके ऐटोनियो ने एक बड़ा भीषण
आक्रमण किया। पैडरोमेलो की अध्यक्षता में ४५०० सिपाहियों ने थाना
के किले को दोबारा अपने अधीन करने के लिए आक्रमण कर दिया।
उधर 'थाना' का किला मल्हारराव के अधीन था। यह भी कोई कम वीर
सिपाही न था। बड़ी घमसान लड़ाई हुई क्योंकि दोनों पक्ष एक
समान थे, परन्तु मरहठों के तोपखाने ने उनकी शक्ति को क्षीण कर
दिया। यह देख कर वीर पेडरोमेलो ने और सेनाओं को संगठित
करना आरम्भ किया पर एक गोले से उसका काम तमाम हो गया।
उसकी मृत्यु होते ही पुर्तगेजी सेना जहाज़ों में बैठ कर दौड़ भागी।
एक घोर युद्ध के पश्चात मरहठों ने 'माहिम' पर भी अधिकार कर
लिया। उधर वेनकटराव घोरपाडे बढ़ता २ गोआ के समीप 'राखोल'
तक पहुंच गया। अब ऐसे प्रतीत होने लग पड़ा था कि पुर्तगेज़ियों की

शक्ति पूर्णतया नष्ट हो जायगी।
उसी समय नादिरशाह के आक्रमण का समाचार पहुँचा। यह
भारत के लिए सबसे बड़ा भारी खतरा था। मरहठे ही हिन्दुओं की
एकमात्र शक्ति थी जो उसका मुकाबला कर सकती थी। अतः अब उनके
सामने यह एक और आपत्ति आ पड़ी। इस आक्रमण ने पुर्तगेज़ों के
जीवन की अवधि कुछ और बढ़ा दी। बाजीराओ इस परिस्थिति को
ताड़ गए और उन्होंने लिख भेजा—"पुर्तगेज़ों के साथ युद्ध तो शून्य
के समान ही है। भारत में अब हमारा एक ही दुश्मन है। इसलिए
सारे भारत को संगठित हो जाना चाहिये। मैं अपनी मरहठा सेना
को नर्मदा से लेकर चम्बल तक फैला दूंगा और फिर देखूँगा कि किस
तरह नादिरशाह दक्षिण की ओर बढ़ने का साहस करता है।"
अतः उसने दिल्ली, जयपुर और अन्य उत्तरी राज्यों के दर्बारों में
स्थित मरहठा प्रतिनिधियों को आज्ञा दी कि आप लोग केवल मरहठों
का ही नहीं अपितु राजपूतों, बुंदेलों और मरहठों सब का एक सम्मिलित
संगठन करो। आजकल उस समय के मरहठा नीतिज्ञ का एक छपा
हुआ पत्र मिलता है जिसे पढ़कर यह पता लगता है कि किस प्रकार
हिन्दुओं ने मुगल सम्राट् को गद्दी से उतार कर उसके स्थान पर उदय-
पुर के महाराणा को भारत के शासन पर बिठा देने की आयोजना
की थी।
मराठा नेता, बाजीराओ का उत्सुक हृदय हिन्दुओं की विस्तृत
विजयों की विस्तृत आयोजनाएं कर रहा था। उसके पास
इतने द्रव्य-साधन थे कि वह जहां एक ओर वसीन को घेरने और
पुर्तगेज़ों के साथ लड़ने के लिए फौज भेज सकता था वहां दूसरी ओर
उसके पास नादिरशाह को मार भगाने के लिए भी असंख्य सेना
थी। अतः पुर्तगेज़ों को शीघ्र ही पता लग गया कि नादिर शाह के
आक्रमण के कारण भी उनके घेरे में कोई दुर्बलता नहीं आ सकी।

[ ६७ ]
गोआ के वायसराय को एक के बाद दूसरे पुर्तगेज़ो-किलों के छिन जाने
के समाचार पहुँचने लगे। सिरिगाओं, तारापुर, तथा दहानु के किलों
को मरहठों ने अल्प समय में ही अपने अधीन कर लिया और उनकी
सेनाओं को यमपुरी पहुँचा दिया । आक्रमणकारियों तथा अभिरक्षकों
की धीरतापूर्ण कथा यह सुप्रसिद्ध है । उसे इस छोटी सी पुस्तक में
विस्तारपूर्वक वर्णन करने की कोई आवश्यकता दिखाई नहीं देती।
मरहठे इस सारे ही युद्ध काल में बड़ी भयंकरता से लड़ते रहे। उसका वर्णन
हम एक प्रत्यक्ष साक्षी के मुख से कराते हैं। उसका कथन है—"यहां
तक कि बड़े २ अधिकारी भी इस युद्ध में अपने स्थानों पर खड़े होकर
लड़ने लग पड़े। अपने प्यारे नेता बाजीराव की धिक्कारों से बचने के
लिये वे अपनी जानें हथेली में लेकर रण क्षेत्र में कूद पड़े। उधर पुर्त-
गेज़ों की ओर भी एक सेनापति के पीछे दूसरा सेनापति हाथ में
तलवार लेकर युद्ध अग्नि में कूदने से न झिझकता था। मरहठे आक्रमण
करते पर बड़ी हानि उठाकर उन्हें पीछे हटना पड़ता। वे बार २ हमले
करते पर हर समय पीछे धकेल दिये जाते। दोनों ओर का भयंकर
नुकसान होने लगा। कई बार तो मरहठों की अपनी सुरंगें ही फट जातीं
जिसके कारण उनके सहस्रों सिपाही मारे जाते। पर बदला लेने वाली
उस दृढ़-प्रतिज्ञ मरहठा सेना ने हार नहीं मानीं। उन्होंने १८ बार
आक्रमण किया। पुर्तगेज़ों ने भी १८ बार ही उन्हें पीछे धकेल दिया।
पर हर बार मरहठों का उत्साह बढ़ता ही गया, घटा नहीं। इस प्रकार
घेरा पड़ा ही रहा। नादिर शाह आया भी और वापिस भी चला गया
पर वह घेरा यों का त्यों ही पड़ा रहा। बसीन पर फिर भी अधिकार
न किया जा सका। अंत में चिम्मा जीअप्पा निराश हो गया और
क्रुद्ध होकर अपने योद्धाओं को गर्ज कर कहने लगा—"देखो ! मैं
अवश्य बसीन के किले में प्रवेश करूंगा। यदि आप मुझे आज जीवित
अवस्था में वहां नहीं ले जा सकते तो कल तुम मेरे सिर को अपनी
तोपों द्वारा उस किले की दीवार तक फेंक देना ताकि मैं अपने मृत्यु

[ ६८ ]

के पश्चात् तो किले में प्रविष्ट हो जाऊँ।” ऐसी अदम्य वीरता भरे शब्दों
ने उन योद्धाओं में जोश भर दिया। वे सिर धड़ की बाज़ी लगा कर
रणक्षेत्र में कूद पड़े। मानाजी आंगरे, मल्हगराओ होलकर, राणोजी
शिंदेगाव एक दूसरे से पहले किले की दीवारों तक पहुँचने की
कोशिश करने लगे। इस समय एक और खंदक भक से उड़ गई।
मरहठे अदम्य साहस के साथ आगे बढ़े और खण्डहरों में जाकर
डट गए। पूर्तगेज़ों की अपूर्व वीरता उन्हें अपने मोर्चों से पीछे न हटा
सकी। पुर्तगेज़ अब अधिक समय तक मरहठों के सामने न ठहर सके
और उन्होंने हथियार डाल दिये। मरहठों का गेरुवा झंडा हिन्दू धर्म
और हिन्दू जाति के उत्पीड़िकों के ऊपर फहराने लगा। उसे बसीन के
ऊपर गाड़ दिया गया। आकाश हिन्दू-धर्म के जयकारों से गूंज उठा।”
अब सारा ही कोंकण प्रदेश स्वतंत्र हो चुका था। इस के पश्चात्
कभी पुर्तगेज़ सिर न उठा सके। परन्तु वे गोवा में उपद्रव खड़े करते रहे।
उनका वहां भी नाश कर दिया जाता पर मरहठों को इससे और अधिक
महत्वपूर्ण कार्य करने थे इसलिए उन्होंने इस ओर विशेष ध्यान नहीं
दिया। मरहठों ने समुद्र तथा पृथ्वी द्वारा आक्रमण कर के पुर्तगेज़ों की
शक्ति को, जो कभी एशिया के समुद्रों में गुडहोप अंतरीप से लेकर
पीले-समुद्र तक अकंटक राज्य भोगती थी—नष्ट भ्रष्ट कर दिया। इसके
पश्चात् उन्हें कभी हिन्दुओं के विरुद्ध हाथ उठाने का साहस नहीं हुआ।
अब अनुमान कीजिये कि उन हिन्दुओं के मन में कितनी प्रस-
न्नता भर गई होगी। इन विदेशियों से छुटकारा पाकर उन्होंने कितनी
शान्ति का अनुभव किया होगा। जो कभी विदेशियों द्वारा शासित
किये जाते थे, जिनका यह दृढ़ विश्वास हो गया था कि वे सदा
शासित किये जाने के लिए ही उत्पन्न हुए हैं अब जब कि उन महाराष्ट्र
वीरों ने उनके दुश्मनों को मार २ कर भगा दिया तो वे राष्ट्रीय गौरव
और विजय गर्व से फूले न समाते थे। कई शताब्दियों से पुर्तगेजी-

[ ६६ ]
कोंकण के हिन्दुओं ने हिन्दू ध्वजा को वहां फहराते नहीं देखा था,
अब उन्होंने विदेशियों की खोपड़ी को तोड़ दिया और अपनी जाति
तथा धर्म के प्रति किये गये अत्याचारों का जी भर कर बदला लिया।
ब्रह्मेंद्र स्वामी के संवाददाता ने इस विजय के समाचार को इन
शब्दों में लिख कर भेजा—"यह वीरता, शक्ति, और विजय—ये सारे
कार्य उस प्राचीन समय के दिखाई पड़ते हैं जब कि देवता भारत में
अवतीर्ण हुआ करते थे। वे लोग वास्तव में धन्य हैं जो इस विजय के
दिनों को देखने के लिए जीवित बच रहे हैं, और इन व्यक्तियों से भी वे
लोग अधिक भाग्यशाली हैं जो इस विजय को संभव बनाने के लिए अपने
प्राणों की आहुतियां दे चुके हैं।"
१०
नादिरशाह और बाजीराव
बघूं नादिरशाह कसा पुढे येतो तो ! ॐ —बाजीराव ।
जिस प्रकार मरहठों की सेना कोंकण में शानदार सफलताएं प्राप्त
कर रही थी, वैसे ही अन्य स्थानों में भी वह बड़ी शान से फैल रही थी।
बाजीराव ने मालवा, गुजरात और बुन्देलखण्ड़ को विजय कर के हिन्दू-
राज्य की सीमा चम्बल तक पहुंचा दी। किन्तु इतने पर ही वह सदा के
लिये सन्तुष्ट न हो गया था, क्योंकि उसे तो एक महान् हिन्दू-राज्य स्था-
पित करना था, जिसके अन्दर सारा भारतवर्ष सम्मिलित हो सके और
हिन्दुओं के सारे तीर्थ स्वतन्त्र हो जांय; ताकि वे हिन्दू-धर्म के शत्रुओं
और नास्तिकों के स्पर्श से अपवित्र न हों। इसलिये उसका यह कर्त्तव्य
कोंकण से परशुराम के पवित्र मंदिर के स्वतन्त्र करने तक ही सीमित न
रहा, क्योंकि काशी, गया, मथुरा अब भी इन विधर्मियों के शासन से

  • देखें नादिरशाह कैसे आगे बढ़ता है !

पीड़ित थे। इस प्रकार हमें बाजीराव और दूसरे मरहठे सरदार उन
पवित्र स्थानों को, पुरन्धर और नासिक की भांति, स्वतंत्र कराने के लिए
अविश्रान्त प्रयत्न करते हुए दिखाई पड़ते हैं। कोंकण में जल
और स्थल की लड़ाई लड़ते हुए मरहटों को किसी भयंकर आपत्ति की
सम्भावना भयभीत नहीं कर सकी थी। अतएव बाजीराव ने मुगल-सम्राट्
को धमकी दी कि यदि मुझे अन्य मांगों के साथ-ही-साथ काशी, गया,
मथुरा और अन्य पुण्यक्षेत्र न मिले, तो मैं दिल्ली पर चढ़ाई कर दूंगा।
इस भय ने दिल्ली के यवन नेताओं को अपनी सारी शक्तियां एकत्रित करने
पर विवश कर दिया, और बाईस सेनाध्यक्ष इन हिन्दू-वीरों का सामना
करने को भेजे गये। परन्तु जब किसी प्रकार भी वे मरहटों पर सफ-
लता प्राप्त न कर सके तो अपने आप को रिझाने के लिये उन्होंने एक
बनावटी विजय-समाचार बढ़ाचढ़ा कर मुगल-बादशाह को लिख भेजा कि
बाजीराव एक महान युद्ध में-जिसका कि वास्तव में कोई अस्तित्व ही नहीं
था—पूर्णतया नष्ट-भ्रष्ट कर दिया गया है और मरहठे ऐसी बुरी तरह
खदेड़े गए हैं कि अब वे उत्तर भारत में कभी न दीख पड़ेंगे। इस
समाचार को सुन कर मुगल-बादशाह खुशी से फूला न समाया। और
उस ने असभ्यता के साथ मरहठा-राजदूत को दिल्ली से निकलवा दिया।
साथ ही इस बड़ी विजय के उपलक्ष में शानदार उत्सव मनाने की
आज्ञा दी।
दिल्ली के इन बनावटी कृत्यों का समाचार पाते ही बाजीराव ने
एक विकट हंसी हंसी। उसने अपने मनमें कहा "अच्छा मैं अपनी सेना
को दिल्ली के किले की दीवार तक ले जाऊंगा और मुगल-सम्राट् को
उसकी राजधानी के शोलों के शोकयुक्त प्रकाश में अपनी शक्ति का परिचय
दूंगा।" उसने अपना प्रण पूरा किया। संताजी यादव, तुकोजी होल्कर
और शिवाजी तथा यशवन्तराव पवार को साथ लेकर उसने शीघ्र ही
दिल्ली के फाटक को जा खटखटाया। मुगल-बादशाह अपनी शाही फौज
से एक के बाद एक सेना भेजने लगा, लेकिन प्रत्येक को पराजित

[ ७१ ]

होना पड़ा। अब तो उसे अपनी जान की पड़ गई और बनावटी
स्वप्न देखने की मूर्खता का फल भोगना पड़ा। यह पहला ही मौका
था जब मराठा-शक्ति ने मुअम्मुल्ला दिल्ली के दरवाजे पर धक्का
देकर उसे हिला दिया। निज़ाम को मरहठों की उत्तर भारत की यह
'बेशाल उन्नति असह्य हो गई, अतः वह ३४००० सिपाही और उस काल
के सर्वोत्तम भारतीय तोपखाने के साथ सिरोंज के लिये रवाना हुआ।
राजपूतों ने भी मरहठों के विरुद्ध निज़ाम के साथ मिलजाना उचित
समझा। परन्तु शीघ्र ही बाजीराव उन्हें रौंदता हुआ आ पहुंचा और
मरहठा सेनापति की प्रवीणता, युद्ध-कुशलता और वीरता ने निज़ाम को
फौरन अनुभव करा दिया कि वह पुनः एक बार मरहठों का शिकार बन
गया है। मरहठों की लगातार चढ़ाई और पीछा करने से विवश होकर
उसने भूपाल के क़िले में छिप कर अपनी जान बचाई और वहीं से अपनी
तितर-बितर हुई सेना को एकत्रित करके फिर आक्रमण करने का प्रयत्न
करने लगा। लेकिन मरहठी सेना मुसलमानी और राजपूती फ़ौज़ों
की अपेक्षा अधिक सुसज्जित थी। उन्होंने निज़ामी सेना को घेर लिया
और वह भूखों मरने लगी। नामी-गरामी मुसलमान जनरल से कुछ
करते न बन पड़ा। आखिरकार बाजीराव की शर्तों के अनुसार उसे सन्धि
करनी ही पड़ी।
ठीक इसी समय मुसलमानों का एक दूसरा षडयन्त्र फलीभूत
हुआ। नादिरशाह. सिंधु-नदी पार करके आ पहुंचा। इससे मुसलमानों
के हृदय में अपने मरते हुए बादशाह को फिर से ज़िन्दा करने की आशा
बलवती हो गई। औरङ्गज़ेब की परम्परा में पले और शिक्षित हुए निज़ाम
तथा अन्य मुसलमान सरदारों ने नादिरशाह के साथ इस आशा पर
भाई-चारे का नाता जोड़ लिया कि कम-से-कम वह उस कार्य को पूरा
करेगा जिसे भीरु मुगल न कर सके थे, और महाराष्ट्र-मण्डल के
हिन्दुओं की बढ़ती हुई शक्ति को नष्ट करके मुसलमानी साम्राज्य को
एक बार फिर पूर्ण गौरव और शक्ति की चोटी पर पहुंचा देगा। यदि

[ ७२ ]

बाजीराव हिन्दू-सेना लेकर इस भयानक विदेशी को रोकने के लिये
निर्भयतापूर्वक कटिबद्ध न हुआ होता, तो ऐसा होने में कुछ सन्देह
भी न था।
दबने या भयभीत होने के स्थान पर बाजीराव की कल्पना शक्ति
जाति के इस बड़े संकटपूर्ण समय पर और भी ऊंची उड़ने लगी।
नादिरशाह के आने पर उसे एक बहुत उत्तम अवसर दिखाई देने लगा।
वह सोचने लगा कि जो हिन्दू-इतिहास सौ वर्ष में पूरा होता, वह अब
केवल एक वर्ष में ही संपूर्ण जायगा। उसके योग्य राजदूत उत्तर भारत के
भिन्न भिन्न राजदरबारों में बड़ी चतुरता और उत्साह के साथ कार्य कर
रहे थे और सेनापति रणक्षेत्रों में ख्याति प्राप्त कर रहे थे। जिस प्रकार
पोवार, शिण्डे, गूजर, ऐङ्गरे और दूसरे मरहठों-जनरलों ने युद्धविद्या में
नाम और सफलता प्राप्त की थी, वैसे ही व्यांकोजी राव, विश्वासराव,
दादा जी, गोविन्दनारायण, सदाशिव, बालाजी, बाबूराव, मल्हार और
महादेव भट्ट हिजने राजनैतिक विषयों के पण्डित समझे जाते थे और
उन लोगों ने उतनी ही सफलता भी प्रप्त की थी।
वास्तव में इन महाराष्ट्र-राजनीति विशारद पुरुषों ने ही इस हिन्दू-
आन्दोलन के उच्च आदर्श और राजनीतिक सिद्धान्त को उचित रीति से
स्थिर रक्खा। वे बड़ी योग्यता से ऐसी परिस्थिति उत्पन्न करते रहे जिस
से मरहटे सैनिक सफलतापूर्वक कार्य करने में अग्रसर रहें। इन राज-
नीतिज्ञ पुरुषों के पत्र-व्यवहार अब छपे हुए मिलते हैं, जिन्हें पढ़कर
पाठक मरहटा राजनीतिज्ञों, कूटनीतिज्ञों, योद्धाओं तथा मल्लाहों की आयो-
जनाओं, आशाओं और आश्चर्यजनक प्रयत्नों के महत्व से प्रभावित
हुए बिना नहीं रह सकते। उनके ये प्रयत्न केवल एक, और एक ही आशा
तथा उद्देश्य लिये थे वह यह कि एक ऐसा दृढ़ हिन्दू-राज्य स्थापित हो,
जो हिन्दू-जाति की राजनैतिक स्वतन्त्रता का रक्षक और पोषक हो। मरहठों
की इसी आयोजना को नष्ट करने के लिये, औरङ्गजेबी शिक्षा प्राप्त
मुसलमान-राजनीतिज्ञों ने नादिरशाह को बुलाया, क्योंकि वे मरहठों

[ ७३ ]

के उत्कर्प˙ को नहीं देख सकते थे। वे प्रत्यक्ष तथा गुप्त दोनों रीतियों से
उसे सहायता भी देते रहे जिससे वह मरहठों के कुचलने में समर्थ
हो सकें।
लेकिन नादिरशाह को फौरन ही मालूम हो गया कि उसे मई
सन् १७३६ ई० मे ऐसी हिन्दू-शक्ति का सामना करना है, जो इससे
बिलकुल ही भिन्न है, जिसका सामना सन् ११२०—११२४ के बीच
मुहम्मद गजनवी को करना पड़ा था। कूटनीति, राजनीति, देशभक्ति,
उत्साह, सैनिक और संगठन शक्ति के साथ-साथ मरहठों में आत्म-
बलिदान का सर्वोच्च भाव भी मौजूद था। पर आत्म-बलिदान तथा
इसी प्रकार की अन्य चतुराईयां केवल उस अवस्था में ही की जाती थीं
जब उन्हें यह विश्वास हो जाता था कि ऐसे बलिदान से मरहठों की अपेक्षा
शत्रुओं को ही अधिक हानि होगी। महाराष्ट्र के हिन्दू जब से अपनी
मातृ-भूमि, अपने धर्म और जाति के नाम पर उठे थे तब से हर
प्रकार से मुसलमानों से श्रेष्ठ सिद्ध हुए थे। उनका दृढ़ विश्वास था
कि इन लड़ाइयों से हम भगवान् राम और कृष्ण की इच्छाओं को
पूर्ण कर रहे हैं। वे नादिरशाह से नहीं डरते थे। मरहठा राजदूतों
और कूटनीतिज्ञों ने बाजीराव को बड़े जोरदार शब्दों में लिखा—
“नादिरशाह कोई ईश्वर नहीं है। वह सारी सृष्टि का नाश नहीं कर
सकता। वह किसी को अपने से अधिक शक्ति-शाली जान लेने पर
अवश्य सन्धि कर लेगा; बल की परीक्षा हो जाने पर ही मित्रता की
बात आरम्भ हो सकती है। शान्ति सर्वदा युद्ध के पश्चात् ही होती
है। इसलिये मरहठा-सेना को आगे बढ़ने दो। यदि केवल राजपूत
और दूसरे हिन्दू आप (बाजीराव) के नेतृत्व में साहस के साथ
सामना करें तो बड़े २ कार्य सम्पादन हो सकते हैं। निजाम की
सहायता पा लेने पर नादिरशाह लौट जाने वाला पुरुष नहीं है,
बल्कि वह सीधे हिन्दू राज्यों पर चढ़ाई कर देगा। सारे हिन्दू राजों
महाराजों तथा सवाई जयसिंह बड़ी उत्सुकता से आप (बाजी-

[ ७४ ]
राश्रो) के आने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। यदि आप हमारे मरहटों का
नेतृत्व करें तो हिन्दू सीधे दिल्ली पर चढ़ाई कर सकते हैं और मुसलमान
बादशाह को गद्दी से उतार कर महाराणा उदयपुर को वहां के राज-
सिंहासन पर बिठा सकते हैं”।
वसीन की चढ़ाई अभी तक जारी थी। मरहठी सेना कर्नाटक
से लेकर कटक और इलाहाबाद तक युद्ध कर रही थी। लेकिन बाजी-
राव ने एक क्षण की भी देर न की और इन मरहठी आशाओं को
जिन्हें कि उनके प्रतिनिधियों ने उत्तर भारत के हिन्दुओं के
हृदयों में उत्पन्न किया था, तथा उनके बड़े उत्तरदायित्व के भार को
जिसे उन्होंने अपने ऊपर लिया था तनिक भी हतोत्साहित न होने
दिया। जब बाजीराव के कुछ साथी भिन्न-भिन्न प्रकार की रायें प्रकट
करने लगे तो उसने ऊँची आवाज़ में कहा—'ऐ मेरे शूरवीरो ! शंका में
पड़ कर क्या सोच रहे हो ? संगठिन होकर आगे बढ़ो। हिन्दू-पद-
पादशाही का दिन बहुत समीप है। मैं अपनी सेना नर्मदा से चम्बल
तक फैला दूंगा और तब देखूंगा कि किस तरह नादिरशाह दक्षिण की
तरफ बढ़ने का साहस करता है।”
बदला लेने वाली इस हठी मरहठा प्रवृत्ति ने फारस देश के
विजयी की हिन्दुओं के नाश करने वाली इच्छा को दबा दिया और
उसे हतोत्साह करके नष्ट कर दिया। नादिरशाह ने बाजीराव को
मुस्लिम धर्म का अनुयायी प्रकट करके एक लम्बा और हास्यास्पद
पत्र लिखा और स्वयं चतुरता पूर्वक वापिस लौट गया। पत्र में उसने
लिखा था—"मैं तुम्हें आज्ञा देता हूं कि दिल्ली के मुग़ल बादशाहों की
आज्ञा मानो, अन्यथा बृजवाइयों की तरह दण्ड मिलेगा।' यह पत्र रद्दी
की टोकरी में डाल दिया गया और महाराज शाहूजी ने खुले शब्दों में
१४ जून सन् १७३६ ई० को शाही दरबार में घोषित किया—'मरहटों
के डर से नादिरशाह देश छोड़ कर भाग गया”।
नादिरशाह के इस प्रकार दुम दबा कर भाग जाने के कारण निज़ाम

[ ७५ ]
विपत्ति-सागर में डूब गया। नादिरशाह के साथ हिन्दुओं के विरुद्ध भाग
लेने और भूपाल की सन्धि की शर्तों को पूरा करने में हीला-हवाला
करने पर उसे यथेष्ट दण्ड देने के लिये मरहठे दिल्ली की तरफ बढ़े। ठीक
उसी समय उनका सब से बड़ा अधिनायक बाजीराव २२ अप्रैल सन्
१७४० ई० को, इस असार संसार से नाता तोड़ कर चल बसा।
बाजीराव की मृत्यु के पश्चात् कोई भी दूसरा व्यक्ति हिन्दुओं की
स्वतन्त्रता के लिये उससे अधिक ईमानदारी और सफलता के साथ प्रयत्न
न कर पाया। जब वह अभी बालक ही था, तभी से उसने अपनी जाति
और धर्म के शत्रुओं के विरुद्ध तलवार उठायी थी और मरते दम तक उसे
मयान में न डाला था। हिन्दू-धर्म के शत्रुओं का सामना करने के लिये
सेना ले जाते समय खेमे में ही उनकी मृत्यु हुई। सभी बड़ी बड़ी कठिन
चढ़ाइयों में जो उसने रुहेलों, सिङ्गो, मुगलों और पूर्तगेजों पर की थीं; कभी
हार नहीं खाई थी। हिन्दू-पद-पादशाही के आदर्श को शीघ्रतम प्राप्त करने
के लिये उसने जो अविश्रांत परिश्रम किया था वही उसकी अकाल मृत्यु
का कारण हुआ। नादिरशाह की अंधड़जंन चढ़ाइयों से जितना धक्का
हिन्दू-धर्म के आन्दोलन को लगता, उससे कहीं अधिक इस एक असाम-
यिक मृत्यु के कारण लगा।
११
नाना तथा भाऊ
ॐ "दशरथ देउनि राज्यश्रीस रामलक्ष्मणांच्या करीं
"प्रभाततारा देउनि जाई कांति आपुली सूर्यकरों
"तशीच बाजीरावे हिंदु स्वातंत्र्याची ध्वजा दिली
"या नरवीर नानांच्या या भाऊंच्या दुर्दात करीं" - महाराष्ट्र भाट

  • जिस प्रकार दशरथ ने राम लक्ष्मण के हाथों में राज्य लक्ष्मी को दे
    दिया, तथा जिस प्रकार प्रभात-तारा अपनी ज्योति सूर्य को समर्पण करके विलीन
    हो जाता है उसी प्रकार बाजीरावों ने हिन्दू-स्वतन्त्रता की ध्वजा नरवीर नाना और
    भाऊ के शक्तिशाली हाथों में दे दी।

२. संताजी-धनाजी का युद्ध व मुगलों का पराभव

[ ७६ ]
यद्यपि बाजीराव का देहान्त हो गया लेकिन जो उत्साह वह लोगों
के हृदय में भर गया था, वह न मरा । इसके पश्चात् वे और भी दृढ़ होते
गये। बाजीराव के पुत्र 'बालाजी' उर्फनाम 'नानासाहब' और बर्सीन के
विजेता चिम्नाजी के पुत्र 'भाऊसाहब' की अध्यक्षता में मरहठे अधिक
सफलता प्राप्त करने का प्रयत्न करने लगे । बालाजी की अवस्था केवल
१८ वर्ष की ही थी, तो भी वह अपने पिता के समय से ही युद्ध-क्षेत्र
देख चुका था । उसने लोगों को दिखला दिया कि नेता होने के सारे गुण
उसमें वर्तमान हैं। शाहूजी सदैव उसके गुणों की प्रशंसा किया करते
थे और बाजीराव के मर जाने पर बालाजी को प्रधान मन्त्री बनाने में
उसने तनिक भी आगा-पीछा न देखा। उक्त मन्त्री नियुक्त करने की
प्रथा बड़ी धूम-धाम से की गई । उत्सव समाप्त होने पर महाराज शाहूजी
ने इस नवयुवक को शिक्षा देते हुये एक पत्र अर्पण किया, जिसमें उत्साह-
वर्धक शब्दों द्वारा मरहठों के उन उद्देश्यों का वर्णन किया था जिनके लिये
वे इस बड़े आन्दोलन में अपना बलिदान देते आ रहे थे । पत्र में राजा
ने लिखा था- “तुम्हारे पिता बड़ी भक्तिपूर्वक अपने कार्य का सम्पादन
करते रहे और उन्हें बड़ी सफलता भी प्राप्त हुई। उनकी इच्छा थी कि
हिन्दू-शासन हिन्दुस्तान की अन्तिम सीमा तक फैले । तुम अपने पिता
के सुयोग्य पुत्र हो, तुम्हें उनके आदर्श की ओर ध्यान देना चाहिये,
उनकी जो हार्दिक अभिलाषा थी उसे पूर्ण करना चाहिये । अपने घुड़-
सवारों को अटक के पार ले जाओ ।”
राजाज्ञा मानने वाले नाना और भाऊ साहब ने अपने प्राणों को
खतरे में डाल कर भी शिवाजी द्वारा आरम्भ किये गये कार्य को सफल
बनाने का प्रयत्न किया । ऐसा करने के लिये तो उन्हें किसी उपदेश की
आवश्यकता ही न थी, क्योंकि बाल्यकाल से ही उनका एकमात्र उद्देश्य
हिन्दू-पद-पादशाही स्थापित करना ही था, यही उनकी यौवनावस्था की
उत्कट अभिलाषा थी जिसके लिये अपना सर्वस्व निछावर करने में भी उन्हें
किञ्चिन् मात्र हिचकिचाहट न हुई । शाहूजी ने अपने कारागार के दिन

[ ७७ ]

दिल्ली में बिताये थे। उस समय शाही परिवार के लोग कभी कभी उस
पर कृपादृष्टि डालते रहे थे, इसी कारण वह मुग़ल-दरबार की चापलूसी
किया करते थे तथा उनके प्रति अपनी राजभक्ति दिखाया करते थे।
उनकी ये बातें भी ये लोग घृणा की दृष्टि से देखते थे।
मंत्रित्व ग्रहण करते ही शाहूजी ने बालाजी को पूना भेज दिया
और राघोजी भोंसले को दक्खिन पर चढ़ाई करने के लिये आज्ञा दी।
शाहूजी के लौटने पर मरहटों में गृह-कलह आरम्भ हो गई, जिस
से लाभ उठा कर सादातउल्ला जनरल की अधीनता में प्रायद्वीप के सारे
दक्खिन-पूर्वी भाग को जीत कर मुसलमानों ने मुसलमानी-राज्य में मिला
लिया और तंजौर के छोटे मरहठा-राज्य को दबाने लगे। तंजौर के
महाराज प्रतापसिंह ने शाहूजी से सहायता मांगी। सादातउल्ला सन्
१७३२ ई० में मर गया और उसका भतीजा दोस्तमुहम्मद आरकाट का
नवाब बना। यह एक शक्तिशाली सरदार और मरहटों का कट्टर शत्रु था।
१६ मई १७४० ई० को प्रातःकाल ही मरहटों ने तंग पहाड़ी रास्ते को
पार करके दोस्त-मुहम्मद की सेना पर दक्खिन की ओर बढ़ कर आगे
पीछे और बगल से हमला कर दिया। थोड़े ही घण्टों की लड़ाई में
मुसलमानी फ़ौज नष्ट हो गई और दोस्तमुहम्मद मारा गया। मुसलमानी-
राज्य के अन्याय से पीड़ित हिन्दू, अपने सहधर्मियों की इस विजय से
बड़े प्रसन्न हुये और मरहटों के ध्येय को अपना ध्येय बना लिया। राघोजी
नगरों और ग्रामों से लड़ाई के व्यय का भारी चन्दा वसूल करता हुआ
अरकोट की ओर बढ़ा। सफ़दरअली और चंदासाहब, जो क्रमशः
दोस्तमुहम्मद के बेटे और दामाद थे, विलोर और त्रिचनापल्ली में बड़ी-
भारी फ़ौज लिये पड़े थे। राघोजी ने यह बात उड़ा दी, कि क्योंकि इस युद्ध
में मरहटों को बहुत आर्थिक हानि उठानी पड़ी है इसलिये उसने अरकाट
छोड़ने का विचार किया है। वह सचमुच त्रिचनापल्ली से ८० मील हट आया।
चन्दासाहब, जो एक बड़ा कार्यकुशल और चतुर पुरुष था, मरहटों की
इस चाल में आ गया और उसने १० हज़ार आदमियों की फ़ौज लेकर

[ ७८ ]
हिन्दुओं के तीर्थ-स्थान मदुरा पर चढ़ाई कर दी। हिन्दू-सेनापति मुसल-
मानों को इस तरह फन्दे में फंसा देख लौट पड़े और त्रिचनापल्ली में
तेजी के साथ जा पहुँचे। बड़े साहब ने, जो हिन्दुओं से बदला लेने के
लिये तथा उनके तीर्थ-स्थान मदूरा को लूटने के लिये भेजा गया था,
जल्दी से अपने भाई को सहायता पहुँचानी चाही पर राघोजी ने अपनी
सेना का एक भाग भेज कर उसे बीच में ही रोक लिया। एक बड़ी
भीषण लड़ाई हुई, जिसमें बड़ा साहब मर कर अपने हाथी से गिर
पड़ा। मुसलमानों की पूर्ण हार हुई और उनके सरदार की लाश राघो
जी के खेमे में लाई गई, जहां उसे कीमती कपड़े में लपेट कर राघो जी
ने उसके भाई चन्दासाहब के पास भिजवा दिया। त्रिचनापली का घेरा
महीनों तक जागे रहा। मुसलमानों ने अत्यन्त वीरता-पूर्वक मुक़ाबला
किया पर उनसे कुछ न बन सका। अन्त में उन्हें उन हिन्दुओं से परा-
जित होना पड़ा जिन्हें वे बड़ी घृणा की दृष्टि से देखा करते थे। राघोजी
ने चन्दासाहब को क़ैद कर लिया और उसे सितारा भेज दिया और
मुरारराव घोरपाड़े को १४ सहस्त्र सेना के साथ त्रिचनापली का प्रबन्ध
करने के लिये नियत कर दिया। सफ़दरअली ने पहले ही मरहठों के
सामने हथियार डाल दिये थे और उन्होंने इस शर्त पर उसे अरकाट का
नवाब बनाना स्वीकार किया कि वह एक करोड़ रुपया मरहठों को दे;
और उसके बाप ने सन् १७३६ में जिन हिन्दू-राजाओं को गद्दी से उतार
दिया था, उन्हें फिर से राजा बनावे।
जिस समय राघोजी दक्षिण में ऐसी सफलताएँ प्राप्त कर रहे थे
उन्हीं दिनों बंगाल, बिहार और उड़ीसा के शासक अलीवर्दीखां से
उसकी गवर्नमैंट की मुठभेड़ प्रारम्भ हो गई थी। मीर हबीब ने अलीवर्दी
खां के खिलाफ मरहठों से सहायता मांगी और राघोजी के दीवान
भास्करपन्त कोल्हाटकर ने, जो बंगाल की मुसलमानी शक्ति को नीचा
दिखाने के सुअवसर की ताक में था, और चाहता था कि हिन्दू-राज्य
की सीमा पूर्व में दूर तक बढ़ाई जाय, इस निमन्त्रण को प्रसन्नता-पूर्वक

[ ७६ ]
स्वीकार किया। १० हज़ार मरहठी घुड़सवार सेना मुस्लिम प्रतिष्ठा को
धूल में मिलाती हुई बिहार पार करके बंगाल में जा पहुँची। अलीवर्दी
खां ने, जो किसी प्रकार से भी निकृष्ट नेता नहीं था, ज्योंही उन लोगों पर
चढ़ाई की, मरहठों ने उसे बड़ी बुरी स्थिति में डाल दिया। उसकी रसद
बन्द कर दी और फौज को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया और उसे वापस लौट
जाने पर विवश कर दिया। मीरहबीब अली ने भास्करपन्त से प्रार्थना
की कि वह अपने विचार बदल दें, बरसात-भर बङ्गाल में रहें और
लड़ाई के हरजाने का चन्दा शत्रुओं से वसूल करें।
इसके बाद मरहठे मुर्शिदाबाद पर चढ़ दौड़े जिसके परिणामस्वरूप
उन्होंने हुगली, मिदन पुर, राजमहल अर्थात् मुर्शिदाबाद को छोड़ कर, व २
गंगा के पश्चिम में स्थित बङ्गाल के सभी जिलों पर अधिकार कर
लिया। मरहठों ने बङ्गाल में विधर्मियों को नीचा दिखाया और हिन्दुओं
ने सफलता प्राप्त की। इसलिये धूमधाम के साथ काली की पूजा
करना निश्चित किया गया। ठीक उसी समय अलीवर्दी खां ने हुगली नदी
को पार कर के एकाएक मरहठों पर चढ़ाई कर दी और बङ्गाल की सीमा
तक उनका पीछा किया। पर यह केवल थोड़े समय के लिये ही था,
क्योंकि राघो जी शीघ्र ही लौट आया।
बालाजी भी एक दूसरी मरहठी सेना का सेनापति होकर बिहार
में आ पहुँचा। देखने में तो वह शाही जनरल की हैसियत से
आया था, पर उसका वास्तविक उद्देश्य अपने लिये कर लगाना तथा
राघोजी भोंसले के साथ अपना हिसाब-किताब तय करना था। राघोजी
और बालाजी में समझौता होते ही बालाजी हट गया और भास्करपन्त
ने युद्ध की क्षतिपूर्ति और चौथ मांगी। अलीवर्दी खां ने अपने आपको
उसके साथ लड़ने में असमर्थ समझ कर एक नई मक्कारी की युक्ति सोच
निकाली। उसने हरजाने के प्रश्न पर विचार करने के लिये एक मेहमान
और राजदूत की तरह भास्करपन्त को अपने खेमे में बुला भेजा,
और ऐसे हत्यारों को खेमे में छुपा रखने का प्रबन्ध किया जो अलीवर्दी

[ ८० ]

खां के मुँह से "काफ़िर को मारो" की ध्वनि निकलते ही उनपर हमला कर
दें। उस भयंकर दिन राघोजी गायकवाड़ को छोड़ कर लगभग २० मरहठे
अफ़सर मारे गये और राघोजी मरहठों की घबराई हुई सेना को लेकर
शत्रुराज्य से भाग गया। किन्तु विजयानन्द में मग्न मुसलमानी सेना
उसे नाश करने के लिये बार बार उस पर आक्रमण करती रही।
लेकिन मरहठों के उस आन्दोलन को, जिसे औरङ्गजेब की शाही
शक्ति भी न दबा सकी थी, भला यह अचानक आक्रमण और हत्या
क्योंकर दबा सकती ? अलीवर्दी खां ने राघोजी को एक हास्य तथा
मूर्खतापूर्ण पत्र में लिखा था, "परमात्मा को धन्यवाद है, धर्मात्माओं के
घोड़े अधर्मियों से नहीं डरते और इस्लाम के शेर के इस प्रकार कार्य्य-
रत रहते हुये मूर्ति-पूजक राक्षस उसका कुछ नहीं कर सकते। अतएव
अब हमारी दया के प्रार्थी बनो, क्षमा-याचना करो, तभी सुलह हो सकेगी,
अन्यथा नहीं।" राघोजी ने इस मूर्खतापूर्ण पत्र का जवाब देते हुये
लिखा कि जब मैं हजारों मील की यात्रा करके इस्लाम के शेर से लड़ने
के लिये गया उस समय तो वह सौ मील चल कर भी युद्ध करने का
साहस न करसका। और ऐसी शब्दाडम्बर की लड़ाई बन्द करके अली-
वर्दीखां के निमन्त्रण को अस्वीकार करते हुये उसने मरहठे घुड़सवारों को
बर्दवान और उड़ीसा पर चढ़ाई करने तथा उन पर कर लगाने की आज्ञा
दी। मरहठे वर्षों तक अलीवर्दी खां को परेशान करते रहे और जहाँ-
कहीं पहुँचे, उचित मालगुज़ारी लगा दी या मालगुज़ारी न लगा सकने
पर युद्ध-व्यय का भारी चन्दा ही लगा दिया। वे सारे जिलों में फैल कर
चारों ओर घूमने लगे और समयानुकूल कभी लड़ते, कभी भागते।
अन्त में बङ्गाल, बिहार और उड़ीसा के सूबोंमें मुसलिम-शासक के लिये
राज्य चलाना असम्भव कर दिया। मरहठे हार के डरसे रुकने वाले न थे
और न नाश का ख्याल ही उन्हें निराश कर सकता था। उन्हें तो एकमात्र
चौथ की ही चाह थी।
अन्त में 'इस्लाम के शेर' अलीवर्दी खां को सन् १७५० ई० में इन

[ ८१ ]
“मूर्तिपूजक राक्षसों” से पूरा काम पड़ा, और ऐसा भीषण सामना हुआ कि
लाचार होकर उसे क्षमा मांगनी पड़ी और भास्करपन्त को मारने के बदले
उड़ीसा का राज्य, तथा बङ्गाल और बिहार पर १० लाख सालाना चौथ
देने का भी वायदा करना पड़ा । इस प्रकार इस धर्म-रक्षकों को आखिर-
कार मूर्तिपूजक-विधर्मियों से इस प्रकार क्षमा-याचना करनी ही पड़ी।
क्या उन्होंने उस दिन भी अल्लाह का धन्यवाद किया होगा ?
दूसरे मरहठा-सेनापति भी उत्तर भारत की दृढ़ मुसलिम-शक्ति
को उसी समय अत्यन्त सफलतापूर्वक छिन्न-भिन्न कर रहे थे, जिस
समय राघोजी भोंसले बङ्गाल में । हठी रुहेले और पठान जो अब
तक यमुना से नेपाल तक की भूमि के स्वामी थे और जिन्होंने
संगठित होकर एक शक्तिशाली सेना भी एकत्रित कर ली थी,
मुगलों के विरुद्ध डटे हुए थे । मुगल-बादशाह के वज़ीर को डर
था कि वे मुगलों का नाश करके भारत में पुनः पठान राज्य
स्थापित करेंगे । उनकी इस अभिलाषा को धूल में मिलाने के लिए उसने
मरहठों से सहायता मांगी ताकि वे उनको समूले नष्ट कर दें । मुगल
राज्य का नाश स्वयं चाहते हुये भी मरहठों को यह पसन्द नहीं था
कि उनके लाभ को कोई दूसरी मुसलिम-शक्ति उड़ा ले जाय । यही
कारण था कि उन लोगों ने वज़ीर के निमन्त्रण को सहर्ष स्वीकार किया
और उनके नेता मल्हरराव होल्कर और जयाजीराव शिन्दे यमुना नदी
को पार करके कादिरगंज की ओर बढ़े । यहीं पठानों की सेना पड़ी थी ।
पठान बड़ी वीरता से लड़े पर उन्हें पराजित होना पड़ा । एक भारी विजय
के साथ साथ मरहठों ने मुसलिम-सेना का नाश कर दिया और दूसरे
पठान-सरदार अहमदखां को, जो बड़ी शीघ्रता से अपने कादिरगंज के
मित्रों को सहयता पहुंचाने आ रहा था, घेर लिया । अहमद खां फर्रुखा-
बाद में जा घुसा और उसकी मरहठों के साथ हफ्तों तक लड़ाई होती
रही, पर उसकी शक्ति का ह्रास न हो सका क्योंकि उसको गङ्गा की
दूसरी तरफ से रुहेलों की निरन्तर सहायता मिलती रही । अब मरहठों
ने नाव का एक पुल बनाया और फ़ौरन कुछ सेना, जो फर्रुखाबाद को

घेरे हुये थी, पीछे छोड़कर गंगा पार उतर गए और मुख्य सेना ने पठानों
और रुहेलों की ३० हज़ार संयुक्त-सेना पर आक्रमण करके एक भीषण
संग्राम के बाद उसे धूल में मिला दिया । उधर अहमदख़ां ने फ़र्रुखाबाद
से भाग जाने तथा उस बची हुई मरहठा सेना को जीतने का निष्फल
प्रयत्न किया । मरहठों ने उसका पीछा किया और मुसलमान सेना को
तितर बितर कर दिया । खेमों, हाथियों घोड़ों और ऊंटों के साथ-साथ
उनका सारा सामान लूट लिया गया । इस बार उनके हाथ बड़ा धन लगा
और वीरता तथा सफलता-दोनों दृष्टियों से इस आक्रमण का वस्तुतः
ही अत्युत्तम फल हुआ ।
मरहठों से द्वेष रख और धर्मान्धता का जामा पहन कर पठानों
ने काशी पर आक्रमण करके हिन्दू-मन्दिरों और पंडितों के साथ बड़ा
अन्याय किया था। वे डींगें मार रहे थे कि काफ़िर कभी पठानों का
सामना नहीं कर सकते; क्योंकि ईश्वर उनकी (पठानों की) ओर है ।
बहुत हद तक यह बात ठीक भी थी क्योंकि मरहठों को कभी उनका
सामना करने का सौभाग्य ही न प्राप्त हो सका था; क्योंकि जब कभी कोई
खुली लड़ाई होने लगती तभी पठान पीठ दिखाकर भाग जाते थे ।
आखिरकार मुसलमानों की भारी हार हुई और दूर तक बुरी तरह
खदेड़े गये, जिससे हिन्दुओं को अपने मन्दिर और घरों की अप्रतिष्ठा
का पूरा-पूरा बदला मिल जाने से संतोष हो गया। उस समय का
हिन्दू-साहित्य विजय-गाथा से परिपूर्ण है । उस समय के पत्र इस विजय
ध्वनि में लिखे दिखाई पड़ते हैं—
'पठानों ने काशी और प्रयाग की अप्रतिष्ठा की थी, पर अंत में
हरिभक्तों की ही विजय हुई····· शत्रुओं ने काशी में हवा का बीज
बोया, पर ईश्वर की कृपा से फ़र्रुखाबाद में उसे आंधी के रूप में काट
लिया गया।' धार्मिक सफलता के साथ साथ राजनैतिक सफलता भी कुछ
कम न हुई क्योंकि मुसलमान-बादशाह ने डर कर मरहठों को अपने
राज्य में चौथ वसूल करने की आज्ञा दे दी। मुग़ल राज्य का यही भाग