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हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

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वे शूरवीर कुरुक्षेत्र में स्नान करके अपनी विजयी सेना को लाहौर
ले गये। अफ़गानों ने उन्हें रोकना चाहा, पर अटक के पार भगा दिये
गये। वहां पर मरहठा वीर ने लगामें खींची और घोड़े से उतर कर थोड़ा
विश्राम किया क्योंकि उसके सेनापति और नेता पूना में एकत्र होकर
काबुल पार के हिन्दूकुश के ऊपर आक्रमण करने का विचार कर रहे थे।
फ़ारस, इंगलैंड, पुर्तगाल, फ्रांस, हालैंड और आस्ट्रिया के राजदूत पूना
में पहुंचे और उन्होंने प्रार्थना की कि वे लोग अपने राष्ट्रों की ओर से
महाराष्ट्र के शाही दरबार में राजदूत बन कर रहना चाहते हैं। बंगाल
के मुसलमान नवाब, लखनऊ के मुस्लिम वायसराय, मैसूर के मुसलमान
सुलतान, हैदराबाद के मुस्लिम निज़ाम और रुहेलखंड और अर्काट
इत्यादि के छोटे बड़े सरदार अब मरहठों को कर, “चौथ” और “सर-
देशमुखी”–देने लगे। और भी सब कुछ देने को तय्यार थे। वे तो अब
केवल जीना ही चाहते थे। निज़ाम अब नाममात्र के निज़ाम रह गये
और जो कुछ मालगुज़ारी राज्य में एकत्र करते थे, वह किसी न किसी
प्रकार मरहठा-राजकोष में आ ही जाया करती थी। मरहठों के शत्रु
भारतवर्ष के यवन ही नहीं थे, वरन् हम देखते हैं कि ईरानी, काबुली,
तुर्क, मुग़ल, रुहेले और पठान, पुर्तगेज़, फ्रेंच, इंगलिश और अबेसीनियन
लोग सभी एक-एक करके मरहठों से स्थल और जल पर लड़े, किन्तु
हिन्दू-सेना ने देश और धर्म के नाम पर लड़कर उन्हें पराजित कर दिया।
रंगाना, विशालगढ़, चाकन, राजापुर वैनगुरला, बरसीनूर, पुरंधर,
सिंहगढ़, साल्हेर, ऊम्बरानी, सवनूर, संगमनेर, फोंडा, वाई, फाल्टन,
जिनजी, सितारा, दिनदोरी, पालखेड़, पेटलाद, चिपलून, विजयगढ़,

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श्रीगांव, थाना, तारापुर, वसाई, सरंगपुर, जैतपुर, दिल्ली, दुगई, सेराई,
भूपाल, अरकाट, त्रिचनापली, फादिग्गंज, फरुखाबाद, उद्रिग, कुञ्जपुर,
पानीपत, राक्षसभुवन, उनावदी, मोतीतलाओ, धारवाड़, शुकताल,
नसीबगढ, बडगाओं, घोरघाट, बादामी, आगरा, सास्डा, इत्यादि स्थानों
में मरहठों की स्थल और समुद्र में ऐसी भारी विजय हुई कि यदि ऐसी
हमारे पुराने इतिहास में हुई होती या किसी दूसरे देश के राष्ट्र की हुई
होती तो वहां पर उन्हें स्मरण करने के लिये विजय-स्तम्भ खड़ा किया
गया होता । शिवाजी के जन्म से लेकर नाना फड़नवीस के समय तक
हरिभक्तों को कहीं पराजय नहीं हुई। ज्यों २ वे उन्नति करते गये,
छोटी २ जागीरें, जितने बड़े कि दूसरे देशों में बहुत से राज्य हैं, देते गये,
सतारा, नागपुर, कोल्हापुर, तंजोर, मांगली. मिराज, गुन्नी, बड़ौदा,
धार, इंदौर, झांसी, ग्वालियर, और भी बहुत से स्थान सूत्रों की राज-
धानियां थीं; जो कि इतने बड़े २ हैं जितने बड़े यूरोप में बहुत से राज्य हैं।
उन्होंने हरिद्वार, कुरुक्षेत्र, मथुरा, डाकोर, आबु और अवन्ती, परशुराम
और प्रभास, नासिक, त्र्यम्बक, द्वारिका, जगन्नाथ, मालिकार्जुन, मदुरा,
गोकुल, गोकर्ण इत्यादि स्थानों को विदेशियों के पंजे से मुक्त किया।
काशी, प्रयाग और रामेश्वर फिर से गर्वपूर्ण से निर्भय होकर अपने कलस
उठाने के योग्य बन गये और वे मन में परमात्मा को धन्यवाद देने लगे
कि एक हिन्दू-राज्य अब भी उनके शत्रुओं से बदला लेने के लिये जीवित
है। इस हिन्दू साम्राज्य में पुराने समय के मउखरि, चालुक्य,
पल्लव, पांड्य, चोल, केराल, राष्ट्रकूट, अंध्रा, केसरी, भोज, मालवा,
हर्ष और पुलकेशिन के राज्य, राठोड़ और च्यवन आदि सभी पुराने
वंशों के राज्य सम्मिलित थे। इनके गवर्नर और सेनापति इतने बड़े २
देशों पर शासन करते थे कि पुराने समय में उतने बड़े राज्य पर शासन
करने वाले अश्वमेध यज्ञ किया करते थे। पहले और दूसरे चन्द्रगुप्त के
राज्यों को छोड़ कर कोई हिंदूराज्य इतना विशाल और विस्तृत नहीं हुआ,

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और न उतना गौरव प्राप्त कर सका । और जहां तक जातीय सेवाओं,
आत्म बलिदानों का संबंध है, किसी को भी मरहठों की तरह भयंकर
आपदाओं और विपत्तियों का सामना नहीं करना पड़ा और ऐसी कठि-
नाइयों का सामना करते रहने पर भी कोई भी राज्य मरहठा राज्य की
तुलना नहीं कर सकता ।
शायद हमारे इतिहासों में, जो मनुष्य सब हिंदू राजाओं को परास्त
कर देता था, वह चक्रवर्त्ती कहलाता था और जो विदेशियों से देश और
धर्म की रक्षा करता था उसे 'विक्रमादित्य' कहा करते थे । पहले विक्र-
मादित्य ने सीदियन लोगों को देश से निकाला, दूसरे ने शक लोगों को
और तीसरे ने, जिन्हें यशोधर्मा विक्रमादित्य कहते हैं; हूण लोगों को
हटाकर उनके राजा को एक महान् युद्ध में मार डाला । यदि हमारी
यह कल्पना सत्य है कि विक्रमादित्य का महान् पद उसे ही मिलता था
जो धर्मयुद्ध में लड़कर विदेशियों को मार भगाता था, तो जो दिग्विजय
करने के लिये अपनी सैनिक शक्ति के उत्कर्ष के लिये नहीं अपितु देश और
धर्म दोनों को विदेशियों की पराधीनता से स्वतन्त्रता कराने के लिये लड़े
हों और उन्होंने उन पर विजय पाई हो तब उनके कार्य, जिन्होंने यह सब
से आखिरी हिन्दू-साम्राज्य स्थापित किया, कई प्राचीन चक्रवर्तियों और
विक्रमादित्यों के कार्यों और उनके उद्देश्यों की दृष्टि से किसी प्रकार भी
कम महत्त्वशाली नहीं। इसलिये वे भी चक्रवर्ती और विक्रमादित्य दोनों
पदों से विभूषित किये जाने के अधिकारी हैं और प्रत्येक हिन्दू का धर्म
है कि वह उनके प्रति वही भाव रक्खे जो पुराने भारतीय अपने चक्रवर्ती
राजाओं और विक्रमादित्य राजाओं के प्रति रखा करते थे। क्योंकि उन्होंने
जातीय पताका राजपूतों के शिथिल हाथों से पकड़ी और हिंदुओं से
घृणा करने वाले सभी के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी तथा दाहिर,
अनंगपाल, जैपाल, पृथ्वीराज, हरपाल, प्रताप इत्यादि राजाओं के बलि -

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दानों और चित्तौड़ और विजयनगर की राजधानियों पर किये गये अत्या-
चारों का बदला अच्छी तरह लिया ।
मरहठों ने छः शताब्दियों में प्राप्त की हुई मुमलमलानों की विजय
को एक शताब्दी में मिटा दिया । यदि वे पूर्ण रीति से जगे होते तो
अर्द्ध-शताब्दी भी न लगी होती ।
अब हम हिन्दुओं को उचित है कि इन शूरवीरों के द्वारा किये
गये हिंदू-जाति के उपकारों के लिये सदैव उन्हें श्रद्धाभक्ति की दृष्टि से
देखते रहें, सदैव कृतज्ञता प्रकट करते रहें और जिस बड़े राज्य को
उन्होंने स्थापित किया था उसपर एक बार दृष्टिपात करलें, क्योंकि शीघ्र
ही और अकस्मात् इस विशाल साम्राज्य के ऊपर परदा पड़ने वाला है
और यह हम लोगों के सजल नेत्रों से ओझल हो जाने वाला है ।
७.
पटाक्षेप
ॐ हिंमत सोडू नये सूर्य पुन्हा येइल उदयाला" —प्रभाकर
यह सिंहावलोकन हमने सन् १७९५ ई० अर्थात् खारदा की
लड़ाई तक किया है । पहले के सब वर्णन इसी काल से सम्बन्ध रखते
हैं । हमारा उद्देश्य घटनाओं की गणना करने का नहीं था । हमारा
उद्देश्य यही रहा है कि मरहठों के मुख्य - आदर्शों और सिद्धान्तों को
जनता के सामने लायें और उनके उन मनोरथों और उद्देश्यों का पता
लगायें जिनके लिये मरहठे देश की धर्मवेदी पर बलिदान देने के लिये
प्रस्तुत हुए । और इन ही आदर्शों के प्रकाश में हिंदू जाति के इतिहास में
मरहठों के इतिहास का स्थान निश्चित करें । यह कार्य समाप्त होगया।
ॐ इस आशा को दृष्टि में रख कर कि भले दिन फिर कभी न कभी
अवश्य उदय होंगे, हिम्मत नहीं हारनी चाहिए ।

[ ५४ ]
उसपर भी सन् १७९५ ई० से लेकर १८१८ ई० तक का समय, जिसमें
महाराष्ट्र राज्य का विध्वंस हुआ, अभी शेष रह गया है और वह ऐसा
रोमाञ्चकारी है कि उसका वर्णन बिना आंसू बहाये नहीं हो सकता।
हम ऊपर देख आये हैं कि मरहठे, मुसलमानों के छः शताब्दियों
के बढ़े हुए प्रभाव को सत्यानास करके थके हुए हैं और आराम करने के
लिये जा रहे हैं। ठीक इसी समय एक शक्तिशाली राष्ट्र उसपर आक्रमण
करता है जो पहले दो बार नीचा देखकर चुप होगया था।
मरहठे तीसरी बार भी उन पर विजित हुए होते या उन्हें अवश्य
भगा देते, किन्तु अभाग्यवश उसी समय नाना फड़नवीस मर गया और
बाजीराओ दूसरा मरहठों का पेशवा हुआ जो कि शत्रुओं का निस्सन्देह
दास था। यह दो व्यक्ति-नाना और बाजीराओ-द्वितीय परस्पर विरुद्ध
वृत्तियों के प्रतीक थे—सारे महाराष्ट्र आन्दोलन में इन दो परस्पर विरुद्ध
वृत्तियों का सदा संघर्ष चलता रहा है--एक वृत्ति तो स्वार्थ और राष्ट्रीय
हित विरोधी आत्म-उन्नति की ओर बढ़ाती रही और दूसरी वृत्ति स्वार्थ
त्याग तथा परोपकार का पाठ पढ़ाती रही जिस में मनुष्य आप राज्य
मुकुट प्राप्त न करके अपने देश के गौरव के उत्कर्ष बढ़ाने और अपनी
जाति को स्वतन्त्र कराने में सफल होता था। यद्यपि मरहठे इस कुवृत्ति
को पूर्णतया नष्ट न कर सके तो भी उन्होंने नाना फड़नवीस के समय
तक इसे विकसित नहीं होने दिया--इसी के फलस्वरूप वे हिन्दू-पद-
पादशाही की स्थापना कर सके थे। बाजीराव द्वितीय अति स्वार्थी
पेशवा था और किसी प्रकार और मरहठों से मेल और सहानुभूति
नहीं रखता था। ज्योंही शासन की बागडोर इसके हाथ में पहुंची, इस
पर विदेशी राष्ट्र के द्वारा आक्रमण हुआ। यदि वह राष्ट्र भारतवर्ष का
होता या एशिया महाद्वीप के अन्तर्गत किसी राष्ट्र का होता तो मरहठे
अवश्य विजयी हुए होते, क्योंकि एशिया के राज्यों में मरहठे सब से

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संगठित थे। परन्तु यह शत्रु इंगलैंड का था। अब इस युद्ध का फल वही
निकला जिसकी सम्भावना थी।
उस समय इंगलैंड के पास, मरहठों की अपेक्षा राज्यों के विजय
करने के साधन अधिक श्रेष्ठ थे। उनके देश में बड़ी-बड़ी गृह कलहयें,
वार आफ रोजज़ धार्मिक उपद्रव और स्टार चैम्बर की क्रूरता की
घटनाएं हो चुकी थीं जिन के कारण उन में युद्ध-सम्बन्धी उन्नति अधिक
हो गई थी। मरहठों मे आज्ञा-पालन, शासन करना, अपने देश और
राजा के प्रति भक्ति रखना, अपने झंडे पर अभिमान करना, जातीय-
मिलाप, और दृढ़ विचार इत्यादि गुण एशिया वासियों के अन्य लोगों
से अधिक थे, किन्तु अङ्गरेजों की अपेक्षा बहुत ही कम थे।
उस पर भी वे बड़ी वीरता से लड़े, क्योंकि वे भली भांति जानते
थे कि इस समय जीवन-मरण का प्रश्न है। किसी-किसी देश-भक्त ने
जैसे बापू गोकुल ने, प्रण कर लिया था कि वे मर जायेंगे, किन्तु हथियार
नहीं रक्खेंगे। उन्होंने अङ्गरेजी सेनापति से कह दिया कि--'हम अपने
कफ़न को अपने सिरों पर लिये हुए हैं और हमने हाथ में तलवार लिये
लड़ कर मर जाने का दृढ़ निश्चय कर लिया है'। जिस समय सारे योग्य
और राजनीतिज्ञ सेनापति-महादाजी, नाना फडनवीस, राघोजी, तुकोजी
और फाड़के काम करते-करते मृत्यु की भेंट हो चुके थे, उस समय
निकम्मा बाजीराव द्वितीय मरहठों का सेनापति था और इंगलैंड जैसा
शक्तिशाली था उनका शत्रु इस लिए युद्ध का फल पहले ही से ज्ञात
हो गया था। मरहठे पराजित हुए, उनके साथ-साथ भारत के अन्तिम
हिन्दू-साम्राज्य का अन्त हो गया। केवल पञ्जाब में सिक्ख हिन्दू-
स्वतन्त्रता के चिराग की बत्ती की भांति टिमटिमा रहे थे, पर वह भी
इन्हीं कारणों से बुझने ही वाले थे।
हम यह मानते हैं कि हम दुःख का अनुभव करते हुए अपने महान
राष्ट्रीय साम्राज्य की समाधि पर स्मरणलेख लिख रहे हैं। किंतु हम

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इंग्लैंड की विजय पर ईर्ष्या नहीं करते। हम तो खिलाड़ियों की तरह
निष्पक्ष हो कर उन की चतुराई और शक्ति की प्रशंसा करते हैं जिस
के कारण उसने समुद्रों, द्वीपों और प्रदेशों पर हाथ फैलाते हुए हमारे
संघर्षमय हाथों से भारत साम्राज्य को छीन लिया और उसकी नींव पर
उस ने एक शानदार विश्वव्यापी अद्वितीय साम्राज्य की स्थापना कर
ली, जिसका कि इतिहास में कोई और उदाहरण नहीं मिलता।
सन् १८१८ में हमारे सब से अंतिम और सब से शानदार
हिन्दू साम्राज्य की समाधि बन गई। इस की रखवाली करो। निराश मत
बनो और ईसाकी माता मेरी की तरह चिंतायुक्त होने पर भी प्रार्थना
करते रहो — क्योंकि पता नहीं कि कब यह हिंदू साम्राज्य पुनर्जीवित
हो जाये।
॥ ओम् शम् ॥
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