हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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करते हुए हिन्दू-ध्वजा को सिन्ध के तट तक ले गये। शाहू जी ने बाजी-
राव को ऐसा ही करने की आज्ञा दी थी। पर अब तो और भी आगे बढ़ने
की सम्भावना प्रतीत होने लगी थी।
अटक की विजय ने राजनैतिक क्षेत्र में मरहठों का प्रभाव बढ़ा
दिया। अब वह दिल्ली की चारदिवारी के अन्दर संकुचित नहीं रह
सकता था। काश्मीर काबुल और कंधार से मरहठों के यहां उनके
प्रतिनिधि, भेदिये तथा राजदूत अधिकाधिक संख्या में आने लगे।
एक समय वह था जब गद्दी से उतारे जाने पर हिन्दू राजे काबुल
और फारस के मुसलमान-बादशाहों से सहायता मांगा करते थे।
पर अब समय ने पलटा खाया। रघुनाथराव के पास प्रतिदिन काबुल
और कन्धार से पद-च्युत राजाओं क प्रार्थना-पत्र आने लगे। ४ मई
सन् १७५८ को सेनापति ने नाना साहब को लिखा—"सुल्तान तैमूर
और जहानखां की सेनायें हरा दी गई हैं और उनके खेमे और सारी
सामग्री हम लोगों के हाथ लगी है। केवल थोड़े व्यक्ति ही भाग कर
ज़िन्दा अटक पार कर सके हैं। ईरान के शाह ने अब्दाली को पराजित
कर दिया और स्वयं मुझे पत्र लिखा है जिसमें अनुरोध किया है कि
मैं और आगे कन्धार तक बढ़ं, क्योंकि हम दोनों की सम्मिलित शक्ति
से नष्ट हो जाने पर ही अब्दाली अटक को हमारा सीमाप्रान्त स्वी-
कार करेगा। लेकिन मैं विचार करता हूं कि हम अटक तक ही क्यों
सीमाबद्ध हो जांय । अकबर से औरङ्गजेब तक काबुल और कंधार
के दोनों सूबे "हिन्दू-राज्य" के अन्तर्गत रहे हैं। फिर उन्हें हम विदे-
शियों को क्यों दें? मैं सोचता हूं कि ईरान का बादशाह प्रसन्नता-
पूर्वक ईरान तक सीमाबद्ध रहेगा और वह काबुल और कन्धार के
हमारे दावे पर आपत्ति नहीं करेगा। पर वह उसे चाहे या न चाहे मैंने तो
निश्चित कर लिया है कि उन प्रांतों को अपने राज्य का एक भाग समझूं
और उन पर हमारा शासन हो। अब्दाली का भतीजा पहले ही से
हमारे पास आया है और उसने राज्य पर अपने अधिकार का दावा