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हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

पृष्ठ 152, कुल 254 में से

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पृष्ठ 152

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हो और राघोबा की नीच आशा और अभिलाषा पर वज्रपात हो। झों-
पड़ियों से लेकर राजभवनों तक के रहने वाले सर्वदा पुरन्धर के शुभ
समाचार सुनने के लिये कान खड़े रखते थे और अपनी शुभाशा की
चिन्तना में सर्वदा निमग्न रहते थे। इतना ही नहीं, दिल्ली, इन्दौर,
ग्वालियर, बड़ौदा, हैदराबाद, मसूर तथा कलकत्ता आदि भारत के प्रधान
राजनैतिक केन्द्रों के लोग भी पुरन्धर के समाचार के लिये उत्सुक रहते
थे। अन्त में १८ अप्रैल सन् १७७४ ई० को सारे भारतवर्ष में यह
समाचार पहुंचा कि गंगाबाई ने एक पुत्र रत्न को जन्म दिया है। सारे
महाराष्ट्र ने इस प्रसव पर परमात्मा का धन्यवाद किया और इस शिशु
को अपना नेता माना तथा उसे अपने राज्य के लिये ईश्वर द्वारा भेजा
हुआ मंत्री समझा। दूसरे देश के राज्यों ने भी, जनता के उत्साह से
उत्साहित होकर, उस दूध-मुंहे बच्चे को बधाइयां भेजीं। सारे महाराष्ट्र
के क्रांतिकारियों को इस समाचार से सब से अधिक सांत्वना मिली।
उस समय के पत्र व्यवहार तथा लिखित प्रमाणों से उनकी देशभक्ति-
पूर्ण आशाओं और अभिलाषाओं का भली भांति परिचय
मिलता है। साबाजी भोंसला अपनी छावनी से लिखता है-
"ज्योंही हमारे यहां राजकुमार के जन्म का समाचार पहुंचा,
मानों उसी समय हमारे लिये सुख-संसार की सृष्टि हो गई। सचमुच
परमात्मा ने हमारी प्रार्थनाओं को सुना, सारी सेना प्रसन्न है, मारू
बाजे बज रहे हैं। तोपों की गरज वादशाह को सलामी दे रही है।
परमात्मा हमारे पेशवा को दीर्घायु बनाये।" यह समाचार जहां कहीं
क्रांतिकारियों के पास पहुंचा वे बड़ी प्रसन्नता मनाने लगे। एक पत्र में ये
शब्द लिखे मिलते हैं- "हरीपंत सेनापति ने शीघ्र आज्ञा दी कि सारी
सेना में उत्सव मनाओ। लड़ाई के बाजों, शहनाइयों और तोपों की
घड़घड़ाहट के कारण मनुष्यों का एक शब्द भी नहीं सुन पड़ता था।
इस शुभोत्सव को मनाने के लिये हाथी के हौदों से लोगों को मिठाई