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हिन्द स्वराज (आत्म-निर्भरता एवं स्वराज्य दर्शन)

हिन्द स्वराज (आत्म-निर्भरता एवं स्वराज्य दर्शन)

Hind Swaraj by Mahatma Gandhi

मोहनदास करमचन्द गाँधी (महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

पृष्ठ 93, कुल 150 में से

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पृष्ठ 93

हिन्द स्वराज्य
आफ़तों को दूर कर देती है। हिन्दुस्तान के बालकों में कोई न कोई कमी थी,
इसीलिए वह सभ्यता आफ़तों से घिर गई, लेकिन इस घेरे में से छूटने की
ताकत उसमें है, यह उसके गौरव को दिखाता है।
और फिर सारा हिन्दुस्तान गुलामी में घिरा हुआ नहीं है। जिन्होंने
पश्चिम की शिक्षा पाई है और जो उसके पाश में फँस गये हैं, वे ही
जो सभ्यता अचल है, गुलामी में घिरे हुए हैं। हम जगत को अपनी
वह आखिरकार आफ़तों दमड़ी के नाप से नापते हैं। अगर हम गुलाम
को दूर कर देती है। हैं तो जगत को भी गुलाम मान लेते हैं। हम
हिन्दुस्तान के बालकों में कंगाल दशा में हैं, इसलिए मान लेते हैं कि
कोई न कोई कमी थी, सारा हिन्दुस्तान ऐसी दशा में है। दरअसल ऐसा
इसीलिए वह सभ्यता कुछ नहीं है। फिर भी हमारी गुलामी सारे
आफ़तों से घिर गई, देश की गुलामी है। ऐसा मानना ठीक है, लेकिन
लेकिन इस घेरे में से ऊपर की बात हम ध्यान में रखें तो समझ
छूटने की ताकत उसमें है, सकेंगे कि हमारी अपनी गुलामी मिट जाए, तो
यह उसके गौरव को हिन्दुस्तान की गुलामी मिट गई ऐसा मान लेना
दिखाता है और फिर सारा चाहिए। इसमें अब आपको स्वराज्य की
हिन्दुस्तान गुलामी में घिरा व्याख्या भी मिल जाती है। हम अपने ऊपर राज
हुआ नहीं है। जिन्होंने करें वही स्वराज्य है और वह स्वराज्य हमारी
पश्चिम की शिक्षा पाई हथेली में है।
है और जो उसके पाश में इस स्वराज्य को आप सपने जैसा न मानें।
फँस गये हैं, वे ही मन से मानकर बैठे रहने का भी यह स्वराज्य नहीं
गुलामी में घिरे हुए हैं। है, यह तो ऐसा स्वराज्य है कि आपने अगर
इसका स्वाद चख लिया हो, तो दूसरों को
इसका स्वाद चखाने के लिए आप ज़िन्दगी भर
कोशिश करेंगे, लेकिन मुख्य बात तो हर शख्स के स्वराज्य भोगने की है।
डूबता आदमी दूसरे को नहीं तारेगा, लेकिन तैरता आदमी दूसरे को
तारेगा। हम खुद गुलाम होंगे और दूसरों को आज़ाद करने की बात करेंगे, तो
वह संभव नहीं है।
लेकिन इतना काफी नहीं है। हमें और भी आगे सोचना होगा। अब
इतना तो आपकी समझ में आया होगा कि अंग्रेजों को देश से निकालने का
मक़सद सामने रखने की ज़रूरत नहीं है। अगर अंग्रेज हिन्दुस्तानी बनकर
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