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हिन्द स्वराज (आत्म-निर्भरता एवं स्वराज्य दर्शन)

हिन्द स्वराज (आत्म-निर्भरता एवं स्वराज्य दर्शन)

Hind Swaraj by Mahatma Gandhi

मोहनदास करमचन्द गाँधी (महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

पृष्ठ 92, कुल 150 में से

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पृष्ठ 92

हिन्दुस्तान कैसे आज़ाद हो ?
पाठक : सभ्यता के बारे में आपके विचार मैं समझ गया। आपने जो कहा
उस पर मुझे ध्यान देना होगा, तुरन्त सब कुछ मंजूर कर लिया जाए, ऐसा
आप नहीं मानते होंगे, ऐसी आशा भी नहीं रखते होंगे। आपके ऐसे विचारों
के अनुसार आप हिन्दुस्तान के आज़ाद होने का क्या उपाय बताएँगे ?
संपादक : मेरे विचार सब लोग तुरन्त मान
लें, ऐसी आशा मैं नहीं रखता। मेरा फ़र्ज़
इतना ही है कि आपके जैसे जो लोग मेरे
विचार जानना चाहते हैं, उनके सामने अपने
विचार रख दूँ। वे विचार उन्हें पसंद आएँगे
या नहीं आएँगे, यह तो समय बीतने पर ही
मालूम होगा।
हिन्दुस्तान की आज़ादी के उपायों का हम
विचार कर चुके। फिर भी हमने दूसरे रूप में
उन पर विचार किया। अब हम उन पर उनके
स्वरूप में विचार करें। जिस कारण से रोगी
बीमार हुआ हो वह कारण अगर दूर कर दिया
जाए तो रोगी अच्छा हो जाएगा यह जग
मशहूर बात है। इसी तरह जिस कारण से
हिन्दुस्तान गुलाम बना वे कारण अगर दूर
कर दिये जाएं तो वह बंधन से मुक्त हो
जाएगा।
स्वराज्य को आप सपने जैसा
न मानें। मन से मानकर बैठे
रहने का भी यह स्वराज्य नहीं
है, यह तो ऐसा स्वराज्य है कि
आपने अगर इसका स्वाद
चख लिया हो, तो दूसरों को
इसका स्वाद चखाने के लिए
आप ज़िन्दगी भर कोशिश
करेंगे, लेकिन मुख्य बात तो
हर शख्स के स्वराज्य भोगने
की है। डूबता आदमी दूसरे
को नहीं तारेगा, लेकिन तैरता
आदमी दूसरे को तारेगा। हम
खुद गुलाम होंगे और दूसरों
को आज़ाद करने की बात
करेंगे, तो वह संभव नहीं है।
पाठक : आपकी मान्यता के मुताबिक हिन्दुस्तान की सभ्यता अगर सबसे
अच्छी है, तो फिर वह गुलाम क्यों बना ?
संपादक : सभ्यता तो मैंने कही वैसी ही है, लेकिन देखने में आया है कि
हर सभ्यता पर आफतें आती हैं। जो सभ्यता अचल है, वह आखिरकार
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