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हिन्द स्वराज (आत्म-निर्भरता एवं स्वराज्य दर्शन)

हिन्द स्वराज (आत्म-निर्भरता एवं स्वराज्य दर्शन)

Hind Swaraj by Mahatma Gandhi

मोहनदास करमचन्द गाँधी (महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

पृष्ठ 114, कुल 150 में से

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सत्याग्रह-आत्मबल
पाठक : आप जिस सत्याग्रह या आत्मबल की बात करते हैं, उसका इतिहास
में कोई प्रमाण है ? आज तक दुनिया का एक भी राष्ट्र इस बल से ऊपर चढ़ा
हो, ऐसा देखने में नहीं आता। मार-काट के बिना बुरे लोग सीधे रहेंगे ही
नहीं, ऐसा विश्वास अभी भी मेरे मन में बना हुआ है।
संपादक : कवि तुलसीदास जी ने लिखा है :
दया धरम को मूल है, पाप मूल अभिमान,
तुलसी दया न छाँड़िये, जब लग घट में प्रान।
मुझे तो यह वाक्य शास्त्र-वचन जैसा लगता है। जैसे दो और दो चार ही
होते हैं, उतना ही भरोसा मुझे ऊपर के वचन पर है।
दयाबल आत्मबल है, सत्याग्रह है और इस बल के दुनिया में इतने लोग
प्रमाण पग-पग पर दिखाई देते हैं। अगर यह बल नहीं आज भी जिन्दा हैं, यह
होता, तो पृथ्वी रसातल (सात पातालों में से एक) में बताता है कि दुनिया
पहुँच गई होती। का आधार हथियार
लेकिन आप तो इतिहास प्रमाण चाहते हैं। इसके बल पर नहीं है, बल्कि
लिए हमें इतिहास का अर्थ जानना होगा। सत्य, दया और
'इतिहास' का शब्दार्थ है : 'ऐसा हो गया।' ऐसा आत्मबल पर है।
अर्थ करें तो आपको सत्याग्रह के कई प्रमाण दिये जा
सकेंगे। 'इतिहास' जिस अंग्रेजी शब्द का तरजुमा है
और जिस शब्द का अर्थ बादशाहों या राजाओं की इतिहास होता है, उसका
अर्थ लेने से सत्याग्रह का प्रमाण नहीं मिल सकता। जस्ते की खान में आप
अगर चाँदी ढूँढने जाएँ, तो वह कैसे मिलेगी ? 'हिस्टरी' में दुनिया के
कोलाहल की ही कहानी मिलेगी। इसलिए गोरे लोगों में कहावत है कि जिस
राष्ट्र की 'हिस्टरी' (कोलाहल) नहीं है वह राष्ट्र सुखी है। राजा लोग कैसे
खेलते थे, कैसे खून करते थे, कैसे बैर रखते थे, यह सब 'हिस्टरी' में मिलता
है। अगर यही इतिहास होता, अगर इतना ही हुआ होता, तब तो यह दुनिया
कब की डूब गई होती। अगर दुनिया की कथा लड़ाई से शुरू हुई होती, तो
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