हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपत्युः पार्श्वात्स्वगृहमानाययत् । असूत च सा तत्र देवी दीर्घायुष-
मेनम् । अवर्धतानेहसा च तत्रैवायमानन्दितज्ञातिवर्गो बालस्तारक-
राज इव राजीवलोचनो राजगृहे । भर्तृभवनमागच्छन्त्यामपि दुहि-
तरि नासेचनकदर्शनमिममुञ्चन्मातामहो मनोविनोदनं नप्तारम् ।
अशिक्षतायं तत्रैव, सर्पा विद्याः सकलाश्च कलाः । कालेन चोपारूढ-
यौवनमिममालोक्याहमिवासावप्यनुभवतु मुखकमलावलोकनानन्द-
मस्येति मातामहः कथंकथमप्येनं पितुरन्तिकमधुना व्यसर्जयत् ।
मामपि तस्यैव देवस्य सुगृहीतनाम्नः शर्यातस्याज्ञाकारिणं विकुक्षिना-
मानं भृत्यपरमाणुमवधारयतु भवती । पितुः पादमूलमायान्तं मया
साभिसारमकरोत्स्वामी । तद्धि नः कुलक्रमागतं राजकुलम् । उत्तमानां
च चिरंतनता जनयत्यनुजीविन्यपि जने कियन्मात्रमपि मन्दाक्षम् ।
अक्षीणः खलु दाक्षिण्यकोशो महताम् । एतच्च गव्यूतिमात्रमिव
सगर्भा सती पुलोम्नागत्यापह्रियमाणतया च्यवनं गर्भमत्याक्षीत् । तेन चान्वर्थ-
नाम्ना तद्रक्षो दृष्टैवादह्यत । अन्तर्वत्नी गर्भिणीम् । वैजनने मासि प्रसवमासे ।
दीर्घायुषमिति साभिप्रायम् । रूपकुलाद्युत्कर्षे वर्णिते सत्येतदेव वरगुणवर्णनमव-
शिष्यते । अनेहसा परिपूर्णेन कालेन । 'न जायते यत्र तृप्तिस्तदासेचनकं विदुः' ।
नप्तारं पौत्रम् । साभिसारं ससहायम् । मन्दाक्षमुपरोधम् । गव्यूतिः क्रोशद्वयम् ।
पति के पास से अपने घर ले गए । वहाँ उसने चिरंजीवा इस दधीच को उत्पन्न किया ।
राजा के घर में राजीवलोचन यह चन्द्रमा के समान बांधवों को आनन्दित करता हुआ
समय के साथ बढ़ा । पुत्री सुकन्या अपने पति के घर आने लगी, तब भी नाना ने नेत्र के
सुखद और मन बहलाने वाले नाती को नहीं छोड़ा । इसने ननिहाल में ही समस्त
विद्याओं और कलापों की शिक्षा प्राप्त की । समय से इसे जवान देख और 'मेरे समान
इसके पिता भी उसके मुखकमल को देखकर आनन्द का अनुभव करें, वह सोच
इसके नाना ने किसी-किसी प्रकार पिता के पास भेजा है। उन्हों सुगृहीतनामा देव
शर्यात का आज्ञाकारी विकुक्षि नामक एक तुच्छ भृत्य मुझे समझें । मेरे मालिक ने पिता
के पास आते हुए इसके साथ मुझे लगा दिया । वह राजकुल मेरी वंशपरम्परा द्वारा
सेवित है । सम्बन्ध के पुराने हो जाने पर उत्तम लोग अपने भृत्य के प्रति कुछ लज्जा
का अनुभव करते हैं । महान् लोगों की उदारता का भण्डार कभी नहीं घटता । यहाँ
से दो कोस आगे सोन पार भगवान् च्यवन का निवास च्यवनाश्रम है, जो चैत्ररथ नामक
कुबेर के उद्यान के सदृश है । हम दोनों की यात्रा वहीं तक है। यदि आप दोनों का