हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकर परिवार के साथ विन्ध्याचल के जंगल में चली गई। जब वहाँ वह अग्निप्रवेश करने
के लिए तैयार थी तब हर्ष उसे ढूँढते हुए पहुँच गए। इस अवस्था में सहसा भाई को
पाकर वह विलाप करने लगी। हर्ष ने रोते हुए कहा—'अब धीरज धरो, अपने को
सम्हालो।' राज्यश्री पर इस समय दुःख का पहाड़ टूट पड़ा था, हर्ष ने मृत्यु के मुख से
खींच कर उसे बचा लिया। वह अपने सतीत्व की रक्षा के लिए शत्रु के कारावास से भी
भाग निकली। भारतीय नारी का यह उच्च आदर्श राज्यश्री में एकान्ततः प्रस्फुरित होता
है। बौद्धभिक्षु आचार्य दिवाकरमित्र के सामने राज्यश्री ने हर्ष से विनयपूर्वक कषाय
वस्त्र धारण की अनुज्ञा माँगी। एक विधवा के तपस्वी जीवन के लिए आत्मसंयम के
अतिरिक्त और दूसरा क्या कर्तव्य रह जाता है। हर्ष ने भाई के वध का बदला लेने की
जो प्रतिज्ञा की थी उसे सुनाकर तत्काल राज्यश्री को ऐसा न करने के लिए कहा। उन्होंने
भिक्षु दिवाकरमित्र से कह दिया कि प्रतिज्ञा पूरी होने पर मैं और यह एक साथ कषाय
ग्रहण करेंगे। तब राज्यश्री ने भाई की बात पर आग्रह नहीं किया।
इस प्रकार इन प्रमुख पात्रों की चर्चा के साथ ही हर्षचरित का कथानक भी बहुत
अंश में सामने आ जाता है।
कादम्बरी
महाकवि बाणभट्ट की दूसरी 'अतिद्वयी' रचना कादम्बरी है। यह एक कथा है।
आधुनिक परिभाषा में कथा को ही उपन्यास कहते हैं। यद्यपि कथा और उपन्यास में
बहुत अन्तर है, तथापि काल्पनिकता का सम्बन्ध दोनों में एक-सा अभिलक्षित होता है।
आधुनिक उपन्यास कथा का विकसित रूप है और कथा उपन्यास का पूर्वरूप। कादम्बरी
संस्कृत साहित्य की सर्वोत्कृष्ट गद्य-रचना है और बाण की अमर कृति है। 'हर्षचरित इस
पृथिवी लोक की तथ्यात्मक आख्यायिका है पर कादम्बरी दिव्य-लोक को भूतल पर लाने
वाली काव्य-कल्पना है।' यह दृढ़ता के साथ कहा जा सकता है कि बाण हर्षचरित की
अपेक्षा कादम्बरी में अधिक सफल हुए हैं। कादम्बरी की कथा के सम्बन्ध में यह मान्यता
है कि यह गुणाढ्यकृत बृहत्कथा से ली गई है। गुणाढ्य ने बृहत्कथा को पैशाची भाषा में
लिखा था, जो अब तक उपलब्ध नहीं है। उसके संस्कृत अनुवाद के रूप में क्षेमेन्द्रकृत
बृहत्कथामंजरी और सोमदेवकृत कथासरित्सागर में कादम्बरी-कथा का मूल रूप सुरक्षित
है। भारतीय प्राचीन साहित्य में उपजीव्य तीन ग्रन्थ विशेष रूप से रहे हैं—रामायण,
महाभारत और बृहत्कथा। अतः सम्भव है कि बाण ने अपनी कथा की मूल घटनाएँ
बृहत्कथा से ली हों, किन्तु यह निर्विवाद है कि उन्होंने अपनी प्रतिभा से उसे एक सर्वथा
नवीन और मौलिक रूप दे दिया है।
कादम्बरी की कथा संक्षेप में इस प्रकार है—'विदिशा के राजा शूद्रक के समीप एक
चाण्डालकन्या पंजरबद्ध आश्चर्यकारी शुक को उनकी सेवा में अर्पित करती है। यह