हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंराजद्वार पर पहुँचते ही उन्होंने उद्विग्न होकर सुषेण नामक वैद्यकुमार से पिता की
हालत पूछी। सुषेण ने कोई आशाजनक बात न कहीं तो घबराए हुए पिता के पास
पहुँचे। उन्होंने उन्हें रुग्णावस्था में देखा। प्रभाकरवर्धन ने हर्ष को देखकर उठने की
चेष्टा की। उन्होंने बड़ी कठिनता से यह कहा—'हे वत्स, दुबले जान पड़ते हो।' तब भंडि
ने कहा कि हर्ष को भोजन किए हुए तीन दिन हो चुके हैं। यह सुन कर पिता ने गद्गद
कंठ से कहा—'तुम्हारे आहार के बाद ही मैं पथ्य लूँगा।' पिता का पुत्र के प्रति स्नेह
स्वाभाविक है, पर यहाँ स्वाभाविकता की सीमा पर यह स्नेह पहुँच गया है। गुणवान् पुत्र
के प्रति पिता का इससे बढ़कर क्या भाव हो सकता है। हर्ष की गुणग्राहिता भी
असामान्य थी। जब उन्होंने सुना कि रसायन नामक वैद्यकुमार ने सम्राट् के प्रति भक्ति
और स्नेह से अभिभूत होकर आग में कूद कर जान दे दी, तो उनकी प्रतिक्रिया यह हुई कि
उसने कुलपुत्रता धर्म को चमका दिया। स्वयं बाण ने हर्ष की गुणग्राहिता की प्रशंसा
अपनी प्रथम भेंट के अवसर पर की थी। जब बाण ने अपना विशिष्ट परिचय दिया तब
हर्ष ने कहा था कि मैंने भी ऐसा ही सुना है। तब बाण ने एकान्त में हर्ष की उदारता एवं
गुणग्राहिता की प्रशंसा की है। अस्तु, इसी बीच जब प्रभाकरवर्धन मृत्युशय्या पर अन्तिम-
साँस तोड़ने ही वाले थे तब हर्ष के जीवन की दूसरी मार्मिक घटना माता यशोवती के सती
हो जाने की तैयारी सुनकर हुई। किसी प्रकार वे माँ को उनके निर्णय से विचलित न
कर सके। तत्पश्चात् पिता भी दिवंगत हो जाते हैं। इन उद्वेजक घटनाओं से हर्ष
अत्यन्त शोकमग्न अवस्था में पड़ गए। अनेक कुलपुत्र, गुरु, वृद्ध ब्राह्मण, मूर्धाभिषिक्त
अमात्य, मस्करी, मुनि, वेदान्ती तथा पौराणिक लोगों ने हर्ष के शोक को उदाहरणों और
दृष्टान्तों द्वारा कम किया। तब हर्ष के मन में राज्यवर्धन के विषय में अनेक विचार
आने लगे। कहीं बड़े भाई पिता के मरण का घातक समाचार सुन कर बुद्ध की तरह
आश्रम में न प्रविष्ट हो जायें ! हर्ष की यह भावना राज्यवर्धन के प्रति अपार भ्रातृ-प्रेम
और हृदय की पवित्रता को व्यंजित करने वाली है। सचमुच इस प्रकार की आन्तरिक
वृत्ति के कारण महानता की दृष्टि से हर्ष एक उच्च आदर्श का रूप धारण कर लेते हैं।
जैसा हर्ष ने राज्यवर्धन के विषय में मन में सोचा था, शोक से भरे हुए राज्य-
वर्धन ने आकर वही सोचा और अपनी तलवार फेंक दी। राज्यवर्धन के इस विचार से
हर्ष का हृदय विदीर्ण हो गया। उन्होंने अपने आप में ही कोई ऐसा दोष अनुभव किया
जिसके कारण राज्यवर्धन ने यह निश्चय कर डाला। हर्ष के उस विदीर्ण हृदय में कितनी
पवित्रता और विशालता थी। इसी बीच एक घटना और घटती है। मालवराज द्वारा
ग्रहवर्मा की मृत्यु और राज्यश्री के कारागार में बन्द होने की खबर तत्काल मिली।
सुनते ही राज्यवर्धन का विषाद जाता रहा, वे आगबबूला हो गए। हर्ष को राज्यभार
सम्भालने के लिए कहा और स्वयं फिर हाथ में कृपाण उठा लिया। यहाँ भी हर्ष ने साथ
जाने के लिए आग्रह किया। राज्यवर्धन हर्ष के पराक्रम से परिचित थे, उन्होंने कहा—