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सर्वकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 493, कुल 506 में से

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पृष्ठ 493

४४८ : हर्षचरितम् :
सकललोककवलावेलेहलम्पटा बहला वहंलिहा लेढि लोहिताक्षिता
चिताङ्गारकाली कालरात्रिजिह्वा जीवितानि जीविनाम् । शशिरमशिक्षिता च
भगवतः सर्वभूतभुजो बुभुक्षा मृत्योः । अतिद्रुतवाहिनी चानित्यता नदी ।
क्षणिकाश्च महाभूतग्रामगोष्ठयः । रात्रिषु भङ्गुराणि पात्रयन्त्रपञ्जरदारूणि
देहिनाम् । अशुभशुभावेशविवशा विशरारवः शरीरनिर्माणपरमाणवः ।
छिदुरा जीवनबन्धनपाशतन्त्रीतन्तवः । सर्वमात्मनोऽनीश्वरं विश्वं नश्वरम् ।
एवमवधृत्य नात्यर्थमेवार्हसि मेधाविनि मृदुनि मनसि तमः प्रसरं
दातुम् । एकोऽपि प्रतिसंख्यानक्षण आधारीभवति धृतेः अपि च दूरगते-
ऽपि हि शोके नन्विदानीमपेक्षणीय एवायं ज्येष्ठः पितृकल्पो भ्राता भवत्या
गुरुः । इतरथा को न बहु मन्येत कल्याणरूपमीदृशं संकल्पमत्रभवत्याः
काषायग्रहणकृतम् । अखिलमनोज्वरप्रशमनकारणं हि भगवती प्रव्रज्या ।
ज्यायः खल्विदं पदमात्मवताम् । महाभागस्तु भिनत्ति मनोरथमधुना ।
बहला दीर्घा गौश्च । उक्तं च—'बहलाः कृत्तिका गावः' इति च । वहंलिहा छिद्रान्वे-
षिणी, वहंलिहा च गौर्वत्सस्य भवति । देहिनां शरीरवतां जीवाः प्राणिन एव
बन्धनपाशतन्त्रीतन्तवः । आत्मनोऽनीश्वरं न स्वायत्तम् । परतन्त्रमित्यर्थः । प्रति-
संख्यानं विवेककुशला मतिः । दूरगते परंपरा रूढे । ज्येष्ठो भ्रातेत्याद्युत्तरोत्तरं
साभिप्रायं व्याख्येयम् ।
के समान कालजिह्वा प्राणियों के जीवन चाट रही है जैसे गाय बछड़े को । समस्त
प्राणियों को चट कर जाने वाले भगवान् मृत्युदेव की भूख कभी नहीं बुझती । अनित्यता
रूपी नदी तेजी से बह रही है । पंचमहाभूतों की पंचायतें क्षण भर ही रहती हैं । साधु
जैसे दिन में कमण्डलु रखने के लिए लकड़ियों को जोड़ कर पिंजड़ा बनाते हैं और रात
को उसे खोल डालते हैं वैसा ही यह शरीर का यंत्र है । शरीर के परमाणु पुण्य और
पाप के अनुसार विवश होकर एक दूसरे का घात करते हैं । जीव को बंधन में बांधने
वाले पाश की डोरी के तन्तु एक दिन अवश्य टूटते हैं । सारा नश्वर संसार परतंत्र है ।
हे मेधावनि, ऐसा जान कर अपने सुकुमार मन में अन्धकार को न फैलने दो । विवेक
का एक क्षण भी धृति के लिए बड़ा सहारा होता है । शोक के कम होने पर भी अब यह
पितृतुल्य तुम्हारा ज्येष्ठ भ्राता ही तुम्हारा गुरु है, अन्यथा कौन ऐसा है जो काषायग्रहण
के लिए आपके ऐसे कल्याणरूप संकल्प की सराहना न करे। प्रव्रज्या ही सब प्रकार के
मानसिक ज्वरों को शान्त करने का उपाय है । मनस्वी के लिए यह उत्तम कार्य है । इस
समय महाभाग (हर्ष) तुम्हारे मनोरथ विफल करते हैं। जो वे आदेश दें वही तुम्हें