हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 480, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टम उच्छ्वासः ४३१
स्थास्यसि कथमिवाशिवे शवशिबिरे शबरिके । सुतनु, तनूनपाति पति-
ष्यसि त्वमपि । मृणालकोमले मालावति, म्लानासि । मातर्मातङ्गिके,
अङ्गीकृतस्त्वयापि मृत्युः । वत्से वत्सिके, वत्स्यसि कथमनभिप्रेते प्रेतनगरे ।
नागरिके, गरिमाणमागतास्यनया स्वामिभक्त्या । विराजिके, विराजि-
तासि राजपुत्रीविपदि जीवितव्ययव्यवसायेन । भृगुपतनाभ्युद्यमभागा-
भिज्ञे भृङ्गारधारिणि, धन्यासि । केतकि, कुतः पुनरीदृशी स्वप्नेऽपि सुस्वा-
मिनी । मेनके, जन्मनि जन्मनि देवीदास्यमेव ददातु देवो देहं दहन्दहनः ।
विजये, वीजय कृशानुम् । सानुमति, नमतीन्दीवरिका दिवं गन्तुकामा ।
कामदासि, देहि दहनप्रदक्षिणावकाशम् । विचारिके, विरचय वह्निम् ।
विकिर किरातिके, कुसुमप्रकरम् । कुररिके, कुरु कुरुबककोरकाचितां
चिताम् । चामरं चामरग्राहिणि, गृहाण । पुनरपि कष्टे मर्षयितव्यानि
नर्मदे, नर्मनिर्मितानि निर्मर्यादहसितानि । भद्रे सुभद्रे, भद्रमस्तु ते
परलोकगमनम् । अग्रामीणगुणानुरागिणि ग्रामेयिके, गच्छ सुगतिम् ।
तनूनपाति वह्नौ । वत्स्यस्यासिष्यसि । भृगुः प्रपातः । उक्तं च—‘प्रपातस्त्वतटो
भृगुः’ इत्यमरः । निर्माणं विधानम् । अर्थात्संसारस्य ।
हो रही हैं । अरी शबरिका, मुर्दों की इस अमङ्गल छावनी में कैसे तू ठहरेगी ? अरी
सुन्दर अङ्गों वाली तू भी आग में गिरेगी । अरी मृणाल की भाँति कोमल मालावती, तू
मुरझा गई है । हे माता मातङ्गिका, तूने भी मृत्यु को स्वीकार कर लिया ? अरी वत्से
वत्सिका, अनभिप्रेत प्रेतनगर में तू कैसे रहेगी ? अरी नागरिके, स्वामी के प्रति इस
भक्ति से तुझमें गौरव आ गया है । अरी विराजिका, राजपुत्री की विपत्ति में अपने प्राण
त्यागने के इस प्रयत्न से तू सुशोभित है । अरी भृङ्गार ( विशेष प्रकार का जलपात्र )
धारण करने वाली, पहाड़ की चोटी से गिरने के इस उद्योग से तू धन्य है । अरी केतकी,
स्वप्न में भी ऐसी कामिनी कहाँ मिलेगी ? अरी मेनका, अग्निदेव शरीर को जलाकर
जन्म-जन्म में देवी की ही दासी बनने का सौभाग्य दे । अरी विजया, आग जगा दे ।
अरी सानुमती, स्वर्ग जाने के लिए तैयार इन्दीवरिका तुझे प्रणाम कर रही है । अरी
कामदासी, अग्नि की परिक्रमा करने दे । अरी विचारिका, आग लगाने की तैयारी
कर । अरी किरातिका, फूल बिखेर । अरी कुररिका, कुरुबक की कोढ़ियों से चिता को
सजा । अरी चामरग्राहिणी, चँवर उठा। अरी नर्मदा, परिहास की हँसियों को भूल जाना।
भद्रे सुभद्रा, तेरा परलोकगमन मंगलमय हो । अरी ग्रामीण गुणों में अनुराग करने
वाली ग्रामेयिका, तेरी सद्गति हो । अरी वसन्तिका, फुर्सत दे । हे देवी, छत्रधारी
२८ ह० च०