हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टम उच्छ्वासः ४३१
हृदयमेवं निवेदयति' इत्युक्त्वा तमपि श्रमणमभ्यधात् — 'आर्य ! उत्तिष्ठ ।
दर्शय कासौ । यतस्व प्रभूतप्राणपरित्राणपुण्योपार्जनाय यामः, यदि कथं-
चिज्जीवन्तीं संभावयामः' इति भाषमाण एवोत्तस्थौ ।
अथ समग्रशिष्यवर्गानुगतेनाचार्येण तुरगेभ्योऽवतीर्य समस्तेन साम-
न्तलोकेन पश्चादाकृष्यमाणाश्वीयेनानुगम्यमानः पुरस्ताच्च तेन शाक्यपु-
त्रीयेण प्रदिश्यमानवर्त्मा पद्धयामेव तं प्रदेशमविरलैः पदैः पिबन्निव
प्रावर्तत । क्रमेण च समीपमुपगतः शुश्राव लतावानान्तरितस्य मुमूर्षोर्म-
हतः स्त्रैणस्य तत्कालोचिताननेकप्रकारानालापान् — 'भगवन्धर्म ! धाव
शीघ्रम् । क्कासि कुलदेवते । देवि धरणि, धीरयसि न दुःखितां दुहितरम् ।
क नु खलु प्रोषिता पुष्पभूतिकुटुम्बिनी लक्ष्मीः । अनाथां नाथ मुखरवश्य,
विविधाधिविधुरां वधूं त्रिधवां विबोधयसि किमिति नेमाम् । भगवन्,
भक्तजने संज्वरिणि सुगत सुप्तोऽसि । राजधर्म पुष्पभूतिभवनपक्षपातिन्,
उदासीनीभूतोऽसि कथम् । त्वय्यपि विपद्बान्धव विन्ध्य, वन्ध्योऽय-
यतस्व यत्नं कुरु ।
अश्वीयमश्वसमूहः । शाक्यपुत्रीयेण दिवाकरमित्रशिष्येण । अविरलैर्दीर्घैः । पदै-
श्चरणक्रमैः । मुमूर्षोर्मरणोन्मुखस्य । स्त्रैणस्य स्त्रीसमूहस्यालापाञ्छुश्रावेत्यन्वयः ।
संज्वरिणि संतापवति । राजधर्मो बुद्धः ।
तक पहुँच गई है।' और उस दूसरे भिक्षु से भी कहा—'आर्य, उठो और बताओ वह कहाँ
है ? प्रयत्न करो, बहुत से प्राणों की रक्षा के पुण्योपार्जन के लिए चलें, जिससे किसी प्रकार
जीवित अवस्था में ही उसे प्राप्त कर सकें।' यह कहते ही उठ खड़े हुए ।
समस्त शिष्य वर्ग के साथ आचार्य दिवाकरमित्र हर्ष के आगे चले, और उनके पीछे
समस्त सामन्त लोग घोड़ों से उतर कर पैदल उन्हें खींचते हुए चलने लगे । राजा के
आगे-आगे मार्ग दिखलाता हुआ दिवाकरमित्र का शिष्य चल रहा था । इस प्रकार वे
पैदल ही उस प्रदेश को अपनी आँखों से जैसे पीते हुए कदम बढ़ाते चल पड़े । कुछ देर में
जब समीप पहुँच गये तो लतावन की ओट में मरने के लिए तैयार बहुत-सी स्त्रियों के उस
अवसर के लिए उचित विलाप सुने—'हे भगवन् धर्म, शीघ्र दौड़ो। हे कुलदेवते, कहां हो ?
हे देवी पृथिवी, अपनी दुखिया पुत्री को क्यों नहीं धीरज देती हो ! पुष्पभूति की गृहिणी
लक्ष्मी कहां चली गई ? हे मुखरवंश में उत्पन्न होने वाले राजन् (गृहवर्मा), नाना
प्रकार की मानसिक व्यथाओं से पीड़ित अनाथ विधवा अपनी वधू को क्यों नहीं समझाते ?
हे भगवन् सुगत, क्या तुम भी इस दुःखिनी के लिए सो गए ? हे पुष्पभूति के भवन में