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सर्वकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 457, कुल 506 में से

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पृष्ठ 457

४१० हर्षचरितम्
तहिङ्गवः, प्रचुरपूगफलाः, प्रसवपूगपिङ्गलप्रियङ्गवः, परागपिञ्जरितमञ्जरी-
पुञ्जायमानमधुपमञ्जुरिशञ्जानितजनमुदः, मदमलमेचकितमुचुकुन्दरस्क-
न्धकाण्डकथ्यमाननिःशङ्ककरिकरटकण्डूतयः, उड्डीयमाननिःशङ्कचटुलकृ-
ष्णशारशावसकलशाद्वलसुभगभूमयः, तमःकालतमालमालामीलिता-
तपाः, स्तबकदन्तुरितदेवदारवः, तरलताम्बूलीस्तम्बजालकितजम्बूजम्भी-
रवीथयः, कुसुमरजोधवलधूलीकदम्बचक्रचुम्बितव्योमानः, बहलमधुमो-
क्षोक्षितक्षितयः, परिमलघटितघनघ्राणतृप्तयः; कतिपयदिबससूतकुकुटी-
कुटीकृतकुटजकोटराः, चटकासंचार्यमाणवाचाटचाटकैरिक्रियमाणचाटवः,
सहचरीचारणचञ्चरचकोरचञ्चवः, निर्भयभूरिभुरुण्डभुज्यमानपाककपिल-
प्रसादिकामिनीदर्शनमात्रेण कुसुमिताः संपद्यन्ते । हिङ्गु रामठम् । उक्तं च—
‘सहस्रवेधि जतुकं बाहीकं हिङ्गु रामठम्’ इति । पूगः क्रमुकवृक्षः । प्रसवपूगाः पूग-
फलसमूहाः । प्रियङ्गु श्यामलता । ‘श्यामा तु वनिताह्वया । लता गोबन्धनी गुन्द्रा
प्रियङ्गुः फलिनी फली । विष्वक्सेना गन्धफली कारम्भः प्रियकश्च सः ॥’ पुञ्जमानः
संहियमाणः । मुचुकुन्दः पुष्पतरुभेदः करटौ गण्डौ । तमालस्तापिच्छः । उक्तं
च—‘शक्रपादपः पारिभद्रकः । भद्रदारु द्रुकिलिमं पीतदारु च दारु च । पूतिकाष्ठं
च सप्त स्युर्देवदारुणि’ इति । ताम्बूली नागवल्ली । जम्बू वृक्षभेदः । जम्भीरा दन्त-
शठाख्याः । उक्तं च—‘स्युर्जम्बीरे वृन्दशठजम्भजम्भीरजम्भलाः’ इति । ‘समीरणो
मरुवकः प्रस्थपुष्पः फणिज्जकः । जम्भीरे’ इति । धूलीकदम्बाख्या ग्रैष्मिका वृक्ष-
भेदाः । कुटजो गिरिमल्लिका । उक्तं च—‘कुटजो गिरिमल्लिका’ इति । चटकाया
अपत्यानि चाटकैराः । चारणं भोजनम् । चञ्चुरा निपुणाः । भुरुण्डाः पक्षिभेदाः ।
समान भर गये थे । हींग हवा से हिल रहे थे । सुपारी के फल खूब लगे थे । प्रियङ्गुलतायें
सुपारी के फूलों से पीली लग रही थीं । पराग से भरी पीली मञ्जरियों पर लदे हुए भौंरे
की सुन्दर गुञ्जार सुनकर लोग प्रसन्न हो रहे थे । मुचुकुन्द के वृक्षों में लगे हुए मद के
मलिन चित्ते स्पष्ट बता रहे थे कि हाथियों ने निःशङ्क होकर अपने कुम्भस्थल की खुजान
मिटाई है । घास की हरियाली से भरी जमीन पर चञ्चल हिरन के बच्चे कुलांचे मार रहे
थे । अन्धकार के समान कृष्ण वर्ण बाले तमालवृक्षों से आतप नष्ट हो गया था । देवदारु
वृक्षों में गुच्छे निकल आए थे । जामुन और जम्मीरी नींबू के वृक्षों पर नागवल्ली लतायें
लहरा रही थीं । धूलीकदम्बों के फूलों का पराग उड़कर आकाश में व्याप्त हो रहा था ।
धरती फूलों के मकरन्द से सिंच गई थी । फूलों की गन्ध नाक में भर जाती थी । कुछ
ही दिनों की ब्याई हुई कुक्कुटी कुटज के कोटर में बैठी थी । गौरैया चूँ-चूँ करते हुए
अपने चुङ्गकों को उड़ाना सिखा रही थी । चकोर अपनी सहचरी को चोंच से चुग्गा