हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तम उच्छ्वासः ३६३
तास्मदीयप्रणयो देवोऽपि दिवसैः कतिपयैरेव परागतः प्राग्ज्योतिषेश्वर
इति करोतु चेतसि' इत्युक्त्वा तूष्णीमभूत् । अचिराच्च नमस्कृत्य
निर्जगाम ।
राजापि रजनीं तां कुमारदर्शनौत्सुक्यस्वीकृतहृदयः समनैषीत्। आत्मा-
र्पणं हि महताममूलमन्त्रमयं वशीकरणम् । प्रभाते च प्रभूतं प्रतिप्राभृतं
प्रधानप्रतिदूताधिष्ठितं दत्त्वा हंसवेगं प्राहिणोत् । आत्मनापि ततः प्रभृति
प्रयाणकैरनवरतैरभ्यमित्रं प्रावर्तत । कदाचित्तु राज्यवर्धनभुजबलोपार्जित-
मशेषं मालवराजसाधनमादायागतं समीप एवावासितं लेखहारकाद्भण्डि-
मशृणोत् । श्रुत्वा चाभिनवीभूतभ्रातृशोकहुताशनस्तद्दर्शनकातरहृदयो
बभूव मूर्च्छांन्धकारमिव विवेशातिष्ठच्च समुत्सृष्टसकलव्यापारः प्रतीहार-
निवारणनिभृतनिःशब्दपरिजने निजमन्दिरे सराजकपरिवारस्तदागम-
नमुदीक्षमाणो मुहूर्तम् ।
अथ भण्डिरेकेनैव वाजिना कतिपयकुलपुत्रपरिवृतो मलिनवासा
माल्यान्योषधयः । साधनं हस्त्यादि । निभृतः सनयः ।
अथेत्यादि । राजद्वारं भण्डिराजगामेति संबन्धः ।
अच्छा नहीं, यदि उसके लिये सिर झुकाना पड़े । तो हमारे प्रणय को स्वीकार करने वाले
देव भी यह समझें कि कुछ ही दिनों में प्राग्ज्योतिषेश्वर आ जाते हैं।' इतना कहकर
हंसवेग चुप हो गया । थोड़ी देर बाद नमस्कार करके चलता बना ।
राजा ने भी उस रात को कुमार के दर्शन की उत्सुकता में व्यतीत किया । आत्म-
समर्पण कर देना महापुरुषों का मूलमन्त्ररहित वशीकरण है । प्रातःकाल उन्होंने
प्रधान दूत के साथ बदले में बहुत-सा उपहार देकर हंसवेग को विदा किया । स्वयं शत्रु
पर चढ़ाई करने के लिए सेना का प्रयाण उस दिन से बराबर जारी रखा । एक दिन
लेखहारक ने आकर यह सूचना दी कि राज्यवर्धन की सेना ने मालवराज की जिस सेना
को जीत लिया था उस सबको साथ लेकर भण्डि आ रहा है और समीप ही पहुँच गया
है । सुनते ही उनके हृदय में भ्रातृशोक की अग्नि फिर से उमड़ गई और भण्डी को देखने
के लिये व्याकुल हो गये, मानों मूर्च्छा के अन्धकार में प्रवेश कर गये हों । सब कार्य को
छोड़कर राजसमूह और अन्तःपुर के लोगों के साथ भण्डि के आगमन की प्रतीक्षा करते
हुए क्षण भर अपने भवन में ठहरे । प्रतीहारों के रोक लगा देने से भवन के सब परिजन
इशारे से काम करते थे ।
कुछ समय के बाद भण्डि अकेला ही घोड़े पर सवार कुछ कुलपुत्रों को साथ किए