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सर्वकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 412

सप्तम उच्छ्वासः ३६५
भुवो वदनात्प्लावितभुवनमुद्गवन्तम्, अर्जुनबाहुदण्डसहस्रसंपिण्डितोन्मु-
क्तमिव सहस्रधा प्रवर्तमानं प्रवाहं नर्मदायाः । 'प्रसर तात । भाव, किं
विलम्बसे ? लङ्गति तुरङ्गमः । भद्र, भग्नचरण इव संचरसि यावदमी पुरः-
सराः सरभसमुपरि पतन्ति । वाहयसि किमुष्ट्रम् ? न पश्यसि निर्दय,
निःशूकशिशुकं शयानम् ? वत्स रामिल, रजसि यथा न नश्यसि तथा
समीपे भव, किं न पश्यसि गलति सक्तुप्रसेवकः ? किमेवमित्त्वर, त्वरसे ।
सौरभेय सरणिमपहाय हयमध्यं धावसि ? धीवरि, विशसि । गन्तुकामा
मातङ्गि, मातङ्गमार्गम् । अङ्ग, गलति तिरश्चीना चणकगोणी । गणयसि
न मामारटन्तम् ? अवटमवटेनावतरसि । सुखमास्स्व स्वैरिणि । सौवी-
रक, कुम्भो भग्नः । मन्थरक, खादिष्यसि गतः सन्निक्षून् । उक्षाणं प्रसा-
दय । कियच्चिरमुञ्चिनोषि चेट, बदराणि ? दूरं गन्तव्यम् । किमद्यैव
विद्रासि द्रोणक, द्राघीयसि दण्डयात्रा त्रिनैकेन निष्ठुरकेन निष्क्रेयमस्मा-
कम् । अग्रतः पन्थाः स्थपुटक, स्थावरक, यथा न भनक्षि फाणितस्थालीं
कुम्भभवोऽगस्त्यश्च । प्लावितभुवनं स्कन्धावारम् , नर्मदाप्रवाहं च । पूर्वं कार्त्तवीर्ये-
णान्तःपुरैः सह रेवातीरे विहरता तच्छ्रोतो भुजसहस्रेणोभयतो वृत्वा त्यक्तमभूत् ।
प्रसरतेत्येवमादिप्रवर्तमाननानेकसंलापनमिति स्कन्धावारविशेषणम् । तातेति । भावे-
ति च । मान्यामन्त्रणम् । लसति गलति । प्रसेवको भस्त्राभरणमित्यन्ये । इत्वरो
गमनशीलः । सौरभेयो दान्तः । अङ्गेति इष्टामन्त्रणम् । अवटं श्वभ्रम् । अतटेनामा-
र्गेण । स्वैरिणि स्वतन्त्रे । 'स्वादीरेरिणोः' इति वृद्धिः। सौवीरिकं काञ्जिकम् । विद्रासि
लङ्घसि । निष्ठा श्लेषः । स्थपुटो निम्नोन्नतः, विषम इत्यन्ये । फाणितमिक्षुविकारः,
स्वयं भी आश्चर्य में डूब गए । चलते हुए कटक में अनेक संलाप सुनाई पड़ रहे थे—'आगे
बढ़ो; भाई, देर क्यों लगा रहे हो ? अरे, घोड़ा लंगड़ाकर चल रहा है; भले मानस, अभी
पाँव टूटे की तरह रेंग रहे हो, और ये आगे वाले लोग हमारे ऊपर गिरे पड़ते हैं; अरे
निर्दय, ऊँट को मत चला, देखता नहीं बच्चा आगे सोया पड़ा है ? वत्स रामिल, धूल में
कहीं गायब न हो जाओ, मेरे समीप ही रहो; अरे देखते नहीं कि फटे थैले से सत्तू कैसे
गिर रहे हैं ? अरे चालू, ऐसी हड़बड़ी ही क्या है ? अबे, बैल की लीक छोड़कर घोड़ों के
बीच भागा जाता है ? अरी धीवरी, कहाँ घुसी पड़ती है ? अरी हथिनी की बच्ची, हाथियों
में जाना चाहती है; वाह, चने की बोरी टेढ़ी होकर झर रही है; अरे, मैं कब से चिल्ला
रहा हूँ, फिर भी तू नहीं सुनता; अरे, गड्ढे में गिरेगा क्या ?; अरे मनमौजी, चुपचाप
बैठ; अरे सौवीरक, तेरा घड़ा तो फूट गया; अरे मन्थरक, पड़ाव पर ही पहुंचकर गन्ना