हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 384, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ेंतेजस्यहिमभासि, तामरसवनेष्वपि निगूढशिलीमुखालापेषु त्रासा-
दिव संकुचत्सु, विहगगणेष्वपि समुपसंहृतनिजपक्षविक्षेपनिश्चलेषु
भियेवाप्रकटीभवत्सु, भुवनव्यापिनीं संध्यां प्रतिज्ञामिव मानयति
नतशिरसि घटिताञ्जलिवने जने सकले, स्वपदच्युतिचकितदिक्पा-
लदीयमानाभ्रंलिहलोहप्राकारवलयकलितास्विव बहलतिमिरमालातिरो-
धीयमानासु दिक्षु प्रदोषस्थाने नातिचिरं तस्थौ । नपन्नृपलो-
कलोलांशुकपवनकम्पितशिखैर्दीपिकाचक्रवालैरपि प्रणम्यमान इव
प्राहिणोल्लोकं प्रतिषिद्धपरिजनप्रवेशश्च शयनगृहं प्राविशत् । उत्ता-
नश्च मुमोचाङ्गानि शयनतले । दीपद्वितीयं च तमभिसर इव
लब्धावसरस्तरसा भ्रातृशोको जग्राह । जीवन्तमिव हृदये निमी-
लितलोचनो ददर्शाग्रजम् । उपर्युपरि भ्रातृजीवितान्वेषिण इव
प्रसस्रुः श्वासाः । धवलांशुकपटान्तेनेव चाश्रुजलप्लवेन मुखमा-
च्छाद्य निःशब्दमतिचिरं रुरोद । चकार च चेतसि कथं नामाकृते-
स्तादृश्या युक्तः परिणामोऽयमीदृशः । पृथुशिलासंघातकर्कशकाय-
मुखाः । सहाया अपि पक्षाः । अभिसराश्चौराः ।
लगे । पक्षी भी मानों डर के मारे अपने डैने सिकोड़ कर निश्चल भाव से छिप गए ।
सब लोग भुवन में व्याप्त संध्या को ही प्रतिज्ञा के समान मान कर सिर झुकाकर और
हाथ जोड़ कर प्रणाम करने लगे । चारों ओर अंधकार से दिशाएँ तिरोहित होने लगीं,
मानों दिक्पालों ने अपनी पदच्युति होने के डर से लोहे के आकाशचुम्बी प्राकार खड़े कर
दिए हों । देव हर्ष प्रदोषोत्थान में थोड़ी देर बैठे । पवन से कम्पित दीपशिखा के समान
उन्हें प्रणाम करते हुए राजाओं के अंशुक चंचल हो उठे । सब लोगों को भेज कर स्वयं
वे परिजनों का प्रवेश रोक कर शयनगृह में गए । वहाँ शयनतल पर उत्तान हो अङ्गों
को ढीले छोड़ पड़ रहे । वहाँ एक दीप जल रहा था और दूसरे वे थे । उसी समय भाई
के शोक ने अवसर पाकर चोर के समान उन्हें वेग से पकड़ लिया । आँखें बन्द करके
उन्होंने अपने हृदय में मानों जीते हुए अपने बड़े भाई राज्यवर्धन को देखा । मानों भाई
के प्राणों को ढूँढ़ने के लिए उनके श्वास ऊपर-ऊपर बढ़ने लगे । आँसू से डबडबाए अपने
मुँह को सफेद अंशुक के अग्रभाग से ढंक कर बहुत देर तक बिना शब्द के सिसक-सिसक
कर रोने लगे । मन में सोचने लगे कि उस तरह की आकृति का भी यह नतीजा ठीक
कैसे है ? पिताजी के शरीर की बनावट शिलासंघात जैसी थी और जैसे पर्वत से लोहा
२२ ह० च०