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सर्वकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 336, कुल 506 में से

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पृष्ठ 336

पञ्चम उच्छ्वासः २८६
र्दीकृत इव निर्वात्यातपे, रोदनताम्रसकललोकलोचनरुचेव लोहितायति
जगति, उष्णायमानानेकनरनिःश्वाससंतापप्लुष्ट इव च नीलायमाने
दिवसे, नृपानुगमनप्रचलितयेव लक्ष्म्या मुच्यमानासु कमलिनीषु, पति-
शुचेव परिवृतच्छायायां श्यामायमानायां भुवि, कुलपुत्रेष्विव परित्यक्त-
कलत्रेषु कृतकरुणप्रलापेषु वनान्तानाश्रयत्सु दुःखितेषु चक्रवाकेषु, छत्र-
भङ्गभीतेष्विव निगूढकोशेषु कुशेशयेषु, स्फुटितदिग्वधूहृदयरुधिरपटलप्लव
इव गलिते रक्तात्पे, क्रमेण च लोकान्तरमुपगतवत्यनुरागशेषे जाते
तेजसामधीशे, गगनतलवितन्यमानबहलरागपाटलायां प्रेतपताकायामिव
प्रवृत्तायां संध्यायां, शवशिविकालंकारकृष्णचामरमालास्विव स्फुरन्तीषु
दर्शनप्रतिकूलासु तिमिरलेखासु, असितागुरुकलकाष्ठायां केनापि चिता-
यामिव रचितायां रजन्यां, दन्तामलपत्रप्रसाधितकर्णिकासु केसरमाला-
कल्पितमुण्डमालिकासु, अनुमर्तुमिवोद्यतासु प्रहसितमुखीषु कुमुदलक्ष्मीषु,
ह्मानं वर्धमानम् । निर्वात्य शाम्यति सति । यश्चार्द्रीकृतः सोऽवश्यं निर्वाति
शीतलीभवति । छायातपप्रतिपक्षजातिः, कान्तिश्च । श्यामा रात्रिः, नायिका च ।
वनं तोयम्, विपिनं च । छत्रभङ्गो राजदण्डः, पत्राणां च छत्राकारताभेदः । कोशो
गञ्जः, कर्णिका च । अनुरागो भक्तिः, लौहित्यं च । तेजसामधीशो राजापि । शव-
शिविका मृतयानम् । चामरमाला अपि दर्शनप्रतिकूलाः । काष्ठा दिशः, दारु च ।
अनेक लोगों की गरम सांस के संताप से झुलस कर मानों दिन नील वर्ण का होने लगा ।
मानों राजा के पीछे-पीछे चल पड़ी लक्ष्मी ने कमलिनियों को छोड़ दिया । छाया से ढंकी
हुई पृथिवी मानों पति के शोक में श्याम होने लगी । कुलपुत्रों की भाँति चक्रवाकों ने
दुखी हो कर अपने कलत्र का त्याग कर दिया और करुण रोदन करने लगे एवं वनों में
जाकर बसेरा लिया । कमलों ने मानों राजा के विनाश से डर कर अपने कोश (धनराशि
या बीजकोश) को छिपा लिया । दिग्वधुओं के फटे हुए हृदय की रुधिर की धार के
समान रक्तात्प विगलित होने लगा । क्रम से अनुरागशेष होकर सूर्य लोकान्त में
चला गया । आकाशमण्डल में गहरा लाल वर्ण वाली संध्या प्रेतों की पताका के समान
फैल गई । शव-शिविका (अरथी) में शोभा के लिए लगाए गए काले चंवरों की मालाओं
के समान दर्शन के अयोग्य अन्धकार की लेखाएँ स्फुरित होने लगीं । अगुरु वृक्ष के काले
काष्ठों से मानों किसी ने रजनी के रूप में चिता का निर्माण किया । कुमुदलक्ष्मियाँ
निर्मल पत्र रूपी दन्तपत्र और कर्णिका (बीजकोशरुपी कर्णांलंकार) से प्रसाधन कर
एवं केसर (पराग, बकुल) की मुण्डमाला पहन कर अनुमरण के लिए हँसते-हँसते तैयार
१६ ह० च०