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सर्वकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 330, कुल 506 में से

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पृष्ठ 330

पञ्चम उच्छ्वासः २८५
मरणाच्च मे जीवितमेवास्मिन्समये साहसम् । अतिशीतलः पतिशोका-
नलादक्षयस्नेहेन्धनादस्मादनलः । कैलासकल्पे प्रवसति जीवेश्वरे जरत्तृण-
कणिकालघीयसि जीविते लोभ इति क घटते ? अपि च जीवन्तीमपि
मां नरपतिमरणावधीरणमहापातकिनीं न स्पृक्ष्यन्ति पुत्र ! पुत्रराज्य-
सुखानि । दुःखदग्धानां च भूतिरमङ्गला चाप्रशस्ता च निरुपयोगा च
भवति । वत्स ! विश्वस्तानां यशसा स्थातुमिच्छामि लोके न वपुषा ।
तदहमेव त्वां तावत्तात् ! प्रसादयामि न पुनर्मनोरथप्रातिकूल्येन कदर्थ-
नीयास्मि ।' इत्युक्त्वा पादयोरपतत् ।
स तु ससंभ्रममपनीय चरणयुगलमवनमिततनुरुभयकरविधृतवपुष-
मवनितलगतशिरसमुद्नमयन्मातरम् । दुर्निवारतां च शुचः समवधार्य
कुलयोषिदुचितां च तामेव श्रेयसीं मन्यमानः क्रियां कृतनिश्चयां च तां
ज्ञात्वा तूष्णीमधोमुखोऽभवत् ।
अभिनन्दति हि स्नेहकातरापि कुलीनता देशकालानुरूपम् । देव्यपि
यशोमती परिष्वज्य समाघ्राय च शिरसि निर्गत्य चरणाभ्यामेव चान्तः-
भूतिः समृद्धिः, भस्म च । विश्वस्तानां विधवानाम् ।
नहीं होता ऐसे पति के इस शोकानल से कहीं चिता की आग शीतल है । कैलास के
सदृश प्राणनाथ जब प्रवास कर रहे हैं तो पुराने तृण के टुकड़े की तरह तुच्छ जीवन के
लिए लोभ की बात कहाँ घटती है ? हे पुत्र ! पुत्र के राज्यसुख राजा के मरण के
तिरस्कारजन्य पातक वाली जीती हुई भी मुझे स्पर्श नहीं करेंगे । जो दुःख से जल चुके
हैं उनके लिए ऐश्वर्य अमंगल, अप्रशस्त और उपयोगरहित होता है । हे वत्स, मैं
विधवाओं के यश से इस लोक में रहना चाहती हूं, शरीर से नहीं । इसलिए मैं ही तुम्हें
मनाती हूँ कि फिर मेरी इच्छा के प्रतिकूल मुझे दुःखी न करना ।' यह कह कर पैर
पर गिर गईं ।
कुमार हर्ष ने शीघ्र अपने पैर हटा लिए और झुक कर दोनों हाथों से पकड़ लिया
और सिर से जमीन पर टिकी हुई माता को उठा लिया । उन्होंने निश्चय किया
कि शोक का हटाना कठिन है । कुलाङ्गनाओं के लिए उचित उसी क्रिया को उन्होंने
श्रेयस्कर माना । माता को दृढ़प्रतिज्ञ जानकर चुपचाप अधोमुख हो रहे ।
कुलीन लोग स्नेह से व्याकुल होकर भी देशकाल के अनुरूप आचार का अभिनन्दन
करते हैं । देवी यशोमती ने पुत्र का आलिङ्गन कर और सिर सूंघ कर अन्तःपुर से
पैदल ही निकल गई और पुरवासियों के आर्तनाद से प्रतिध्वनित दिशाओं से मानों