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सर्वकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 312, कुल 506 में से

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पृष्ठ 312

पञ्चम उच्छ्वासः २६७
न ह्यल्पपुण्यभाजां वंशमलंकुर्वन्ति भवादृशाः । फलमस्यानेकजन्मान्त-
रोपार्र्जितस्याकलुषस्य कर्मणः । करतलगतमिव कथयन्ति चतुर्णामप्यर्ण-
वानामाधिपत्यं ते लक्षणानि । त्वज्जन्मनैव कृतार्थोऽस्मि । निरभिला-
षोऽस्मि जीवितव्ये । भिषगनुरोधः पाययति मामौषधम् । अपि च वत्स !
सर्वप्रजापुण्यैः सकलभुवनतलपरिपालनार्थमुत्पत्स्यमानानां भवादृशां
जन्मग्रहणोपायः पितरौ । प्रजाभिस्तु बन्धुमन्तो राजानः, न ज्ञातिभिः ।
तदुत्तिष्ठ । कुरु पुनरेव सर्वाः क्रियाः । कृताहारे च त्वय्यहमपि स्वयमुप-
योक्ष्ये पथ्यम्' इत्येवमभिहितस्य चास्य धक्ष्यन्निव हृदयमतितरां
शोकानलः संदुधुक्षे । क्षणमात्रं च स्थित्वा पित्रा पुनराहारार्थमादिश्यमानो
धवलगृहादवततार । चकार च चेतसि- 'अकाण्डे खल्वयं समुपस्थितो
महाप्रलयो व्यभ्र इव वज्रपातः । सामान्योऽपि तावच्छोकः, सोच्छ्वासं
मरणम् , अनुपदिष्टौषधो महाव्याधिः, अभस्मीकरणोऽग्निप्रवेशः, अनुपर्-

तुम्हारे सदृश लोगों की पीड़ा सारे संसार को दुःखी बना डालती है। तुम्हारे सदृश लोग
अल्प पुण्य वालों के वंश में उत्पन्न नहीं होते । अनेक जन्म-जन्मान्तरों में किए गए पुण्य-
कर्मों के फल के रूप में उत्पन्न हो । तुम्हारे ये लक्षण बताते हैं कि चारों समुद्रों का
आधिपत्य तुम्हारी हथेली पर होगा । मैं तुम्हारे जन्म से ही कृतकृत्य हूँ। अब जीवित
रहने की मेरी इच्छा नहीं। वैद्यों के अनुरोध से विवश होकर औषध का सेवन कर लेता
हूँ । और भी, वत्स ! पिता-माता तो सारे संसार के पालन के लिए उत्पन्न होने वाले
तुम्हारे जैसे लोगों के जन्म लेने के लिए केवल उपाय बन जाते हैं । सचमुच राजा तो
प्रजाओं से अपने आपको बन्धुमान समझते हैं न कि पिता आदि सगोत्र जनों से । इस
लिए उठो, फिर से सब कार्य करो । तुम भोजन कर लोगे तो मैं भी पथ्य सेवन करूँगा ।'
जब राजा ने यह कहा तब उनका शोकानल हृदय को भस्म करता हुआ और उद्दीप्त हो
उठा । क्षणभर ठहर कर पिता के द्वारा फिर भोजनार्थ आज्ञा देने पर वे धवलगृह से नीचे
उतरे और मन में सोचने लगे-'निश्चय ही असमय में यह महाप्रलय बिना मेघ के
वज्रपात के समान उपस्थित हुआ । साधारण भी शोक वह मरण है जिसमें उच्छ्वास होता
है; वह महाव्याधि है जिसकी कोई दवा नहीं; वह अग्नि-प्रवेश है जिसमें जलता हुआ
भस्म नहीं हो जाता, वह नरकवास है जो बिना मरे ही प्राप्त होता है, वह अङ्गार की
वर्षा है जिसमें ज्योति नहीं निकलती; वह आरे से फाड़ना है जिसमें खण्ड-खण्ड नहीं
होते, वह वज्रसूचीपात है जिससे कोई व्रण नहीं होता । अगर वह शोक की आग किसी
विशेष व्यक्ति पर आधारित हो तो क्या कहना ! अब मैं क्या करूँ ?'