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सर्वकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 272, कुल 506 में से

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पृष्ठ 272

चतुर्थ उच्छ्वासः २२७
चूडामणिसंक्रान्तेनापि द्वितीयेनातपत्रेणापत्रपमाणौ, भगवति षण्मुखेऽपि
स्वामिशब्देनासुखायमानश्रवणौ, दपणदृष्टेनापि प्रतिपुरुषेण दूयमानन-
यनौ, संध्याञ्जलिघटनेष्वपि शूलायमानोत्तमाङ्गौ, जलधरधृतेनापि धनुषा
दोधूयमानहृदयौ, आलेख्यक्षितिपतिभिरप्यप्रणमद्भिः संतप्यमानचरणौ,
परिमितमण्डलसंतुष्टं तेजः सवितुरप्यबहुमन्यमानौ, भूभृदपहृतलक्ष्मीकं
सागरमप्युपहसन्तौ, बलवन्तमकृतविग्रहं मारुतमपि निन्दन्तौ, हिमव-
तोऽपि चमरीवालव्यजनवीजितेन दह्यमानौ, जलधीनामपि शङ्खैः खिद्य-
मानौ, चतुःसमुद्राधिपतिमपरं प्रचेतसमप्यसहमानौ, अनपहृतच्छत्रा-
नपि विच्छायानवनिपालान्कुर्वाणौ, माधुष्वप्यसेवितप्रसन्नौ, मुखेन मधु
जरद्हूम् । भङ्गः कुञ्चितत्वम्, युद्धे पलायनं च । अपत्रपमाणौ लज्जन्तौ । स्वामी
कुमारः, प्रभुश्च । प्रतिपुरुषेनेति । स्पर्धायां प्रतिशब्दः । दोधूयमानं संतप्यमानम् ।
मण्डलं बिम्बम्, विषयश्च । तेजः प्रकाशः, तैक्ष्ण्यं च । भूभृदत्र प्रकरणान्मन्दरः,
राजानश्च भूभृतः । लक्ष्मीः समृद्धिरपि । विग्रहं वैरम्, देहश्च । अनपहतेत्यादि
वर्ण्यमानवयोवस्थाभिप्रायेणोक्तम् । छाया कान्तिः, आतपप्रतिपक्षजातिश्च । सति
छत्रे विच्छायत्वं न भवतीति विरोधः । माध्विति । साधूनां सेवान्यतिरेकेण
प्रसादायो ग्यत्वम् । प्रसन्नौ प्रसादवन्तौ, सुरापि प्रसन्ना । मधु माधुर्यम्, मद्यं च ।
असेवितप्रसन्नश्च कथं मुखेन मधु क्षरतीति विरोधः । ऊष्मा स्मयः, तापश्च ।
लज्जित होते थे । भगवान् कार्तिकेय के लिए भी स्वामी शब्द का व्यवहार करना उनके
कानों को सुखकर नहीं लगता । दर्पण में अपने ही प्रतिबिम्ब को किसी दूसरे प्रतिस्पर्धी का
समझकर उनकी आँखों को कष्ट होता । संध्या को प्रणाम करने के लिए हाथ जोड़ते ही
उनके सिर में पीड़ा होने लगती । उनके सामने मेघ भी जब धनुष धारण करता तो उनके
हृदय में कँपकँपी होने लगती । सिर नहीं झुकाते हुए चित्रलिखित राजाओं को देखकर उनके
पैर मारे क्रोध के थरथराने लगते । सूर्य के मण्डल में घिरे हुए तेज को भी वे बहुत नहीं
मानते थे । हरी हुई लक्ष्मी वाले समुद्र की भी वे हँसी उड़ाते थे । बलवान् होकर भी युद्ध
नहीं करने वाले (अथवा शरीर से रहित) वायु की भी वे निन्दा करते थे । हिमालय
को भी चमरी के बालों से झले जाते देखकर वे भीतर-भीतर जलते थे । समुद्रों के भी
शंखों (शंख संज्ञक निधियों) को देखकर खिन्न होते थे । चारों समुद्रों पर आधिपत्य करने
से दूसरे वरुण को भी सह नहीं पाते थे । छत्र छीन कर भी राजाओं को छायारहित
(कान्तिहीन) कर देते थे । सज्जनों पर सेवा के बिना ही प्रसन्न रहते (अथवा प्रसन्ना
अर्थात् मदिरा के न सेवन करने पर भी) और मुख से उनके प्रति मीठी बात बोलते
(अथवा मधु अर्थात् मदिरा को मुँह से उगलते) । दुष्ट राजाओं के वंश को अपनी गर्मी