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सर्वकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 259, कुल 506 में से

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पृष्ठ 259

२१४ हर्षचरितम्
हस्तस्तस्थौ पुरः पुरोधाः ! पुरातन्यः स्थितय इवादृश्यन्तागता बान्धव-
वृद्धाः । प्रलम्बश्मश्रुजालजटिलाननानि बहलमलपङ्ककलङ्ककालकायानि
नश्यतः कलिकालस्य बान्धवकुलानीवाकुलान्यधावन्त मुक्तानि बन्धन-
वृन्दानि । तत्कालापक्रान्तस्याधर्मस्य शिबिरश्रेणय इवालद्यन्त लोक-
विलुण्ठिता विपणिवीथ्यः । बिलसदुन्मुखवामनकबधिरवृन्दवेष्टिताः साक्षा-
ज्जातमातृदेवता इव बहुबालकव्याकुला ननृतुर्वृद्धधात्र्यः । प्रावर्तत च
विगतराजकुलस्थितिरधःकृतप्रतीहाराकृतिरपनीतवेत्रिवेत्रो निर्दोषान्तः-
पुरप्रवेशः समस्वामिपरिजनों निर्विशेषबालवृद्धः समानशिष्टारिष्टजनो
दुर्ज्ञेयमत्तमत्तप्रविभागस्तुल्यकुलयुवतिवेश्यालापविलासः प्रनृत्तसकलकट-
कलोकः पुत्रजन्मोत्सवो महान् ।
अपरेद्युरारभ्य सर्वाभ्यो दिग्भ्यः स्त्रीराज्यानीवावर्जितानि, असुरविव-
राणीवापावृतानि, नारायणावरोधानीव प्रस्खलितानि, अप्सरसामिव
पुरोधाः पुरोहितः । विपणिवीथ्यो वणिक्पथपङ्क्तयः । जातमातृदेवताः मार्जरा-
नना ब्रह्मपुत्रपरिवारा सूतिकागृहे स्थाप्यते । अवरोधोऽन्तःपुरम् ।
अपरेद्युरित्यादौ । इदमित्थं बिभ्राणेन परिजनेनानुगम्यमानानि सामन्तान्तःपुर-
लिए पधारे हुए सत्ययुगीन प्रजापति हों । साक्षात् धर्म के समान पुरोहित ब्राह्मण हाथ में
शान्तिकर्म के लिए जल और फल लिए खड़े हो गए । बड़े-बूढ़े रिश्तेदार पुरानी मर्यादाओं के
समान एकत्र हुए । दाढ़ों के बढ़ जाने से विकट मुँह वाले मैल के बैठ जाने से काले
चिकट शरीर वाले बन्दी कारागार से मुक्त कर दिए गए और आकुल होकर इस प्रकार
भागने लगे मानों नष्ट होते हुए कलिकाल के भाई-बन्धु हों । प्रसन्न हुए लोगों ने मारे
खुशी के बनियों की दुकानें लूट लीं जो भागते हुए अधर्म की पैंठ सी जान पड़ती थीं ।
राजमहल में ऊपर मुँह किए हुए बौने और बहरों से घिरी हुई साक्षात् जानमातृका-
संज्ञक देवियों के समान बालकों से अकुलाई जाती हुई बूढ़ी धात्रियाँ नाचने लगीं ।
राजकुल के नियम शिथिल कर दिए गए, प्रतीहार लोगों ने अपना वेष और डंडे उतार
कर रख दिए और सब लोग बेरोक-टोक राजा की हवेली में घुसने लगे, मालिक और
नौकर में कोई भेद नहीं रहा, बाल और वृद्ध सब एक हो गए, शिष्ट और अशिष्ट का
भी अन्तर नहीं के बराबर हो गया, कुलयुवतियों और वेश्याओं की बातचीत में किसी
प्रकार का भेद-भाव नहीं रहा । शिविर में रहने वाले लोग भी नाचने लगे । इस प्रकार
धूम-धाम से पुत्र का जन्मोत्सव मनाया गया ।
दूसरे दिन सामन्तों की स्त्रियाँ राजकुल में आती हुई दिखाई पड़ीं, मानों सक्र