हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 234, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ेंदन्तपत्रेण विभ्राजमानाम्, कौस्तुभभमस्तिस्तबकेनेव च श्रवणलग्ने-
नाशोककिसलयेनालंकृताम्, महता मत्तमातङ्गमदमयेन तिलकेनादृश्य-
च्छत्रच्छायामण्डलेनेवाविरहितललाटाम्, आपादतलीदासीमन्ताञ्च च-
न्द्रातपधवलेन चन्दनेनादिराजयशसेव धवलीकृताम्, धरणीतलचुम्बि-
नीभिः कण्ठकुसुममालाभिः सरिद्भिरिव सागराधिष्ठात्रीभिरधिष्ठिताम्,
मृणालकोमलैरवयवैः कमलसंभवत्वमनक्षरमाचक्षाणां श्रियमपश्यत् ।
असम्भ्रान्तश्च पप्रच्छ—'भद्रे ! कासि, किमर्थं वा दर्शनपथमागतासि ?'
इति । सा तु स्त्रीजनविरुद्धेनावष्टम्भेनाभिभवन्तीवाभाषत तम्—'वीर !
विद्धि मां नारायणोरःस्थलीलीलाविहारहरिणीम्, पृथुभरतभगीरथादि-
राजवंशपताकाम्, सुभटभुजजयस्तम्भविलासशालभञ्जिकां, रणरु-
धिरतरङ्गिणीतरङ्गक्रीडादोहददुर्ललितराजहंसीम्, सितनृपच्छत्रषण्डशि-
च्छादितयोदञ्चन्त्या उत्तरणमिवांशुकाङ्कञ्चयत इति । वर्ण्याभिप्रायेण त्रिपथेगेति
नाम । मदे दाने लग्नः सक्तः । समद इत्यर्थः । श्रीर्हस्तिपृष्ठेन यातीति मदान्धेत्या-
द्युक्तम् । हस्तिवाहित्वाल्लक्ष्म्या एवमुक्तम् । धरणीतलचुम्बिनीभिर्मालाभिः, सरि-
द्भिश्च । हरिणीमिति । हरिणी किल स्थाल्या लीलया विहरति । वंशोऽन्वयेऽथ वंशे
वेणौ पताकोत्क्षिप्यते । सुभटेत्यादिविशेषणेन वीरातुरागित्वमस्या दर्शितम् ।
स्तम्भे च शालभञ्जिकोत्कीर्णपुत्रिका क्रियते । षण्डो वनम्, तत्र शिखण्डिनी मयूरी ।
का किरणें उस पर डोल रही थीं । उसके हाथों में स्वाभाविक लालिमा थी लेकिन ऐसा
लगता था कि वह मतवाले गजराज के मस्तक पर रहने वाले चन्द्र का दूसरा टुकड़ा
हो । कान में अशोक का किसलय कौस्तुभमणि की किरणों के गुच्छे की भाँति लग
रहा था । हाथी के मद का तिलक उसके ललाट पर तिरोहित छत्र की छाया के समान
प्रतीत हो रहा था । पैर से ललाट तक चाँदनी के समान उज्ज्वल चन्दन से चर्चित होकर
आदिराज मनु के यश के समान धवल हो रही थी । फूल की मालाएँ उसके कण्ठ से
जमीन तक लटक रही थीं, मानों वह समुद्र पर्यन्त जाने वाली नदियों से युक्त हो ।
मृणाल के समान कोमल अपने अङ्गों से बिना शब्द के अपने को कमल से उत्पन्न बता
रही थी । उसके विषय में स्थिर होकर राजा ने पूछा—'भद्रे, तुम कौन हो, क्यों सामने
आई हो ?' वह स्त्री-जाति के विरुद्ध गर्व से अभिभूत करती हुई सी बोली—'वीर, तू मुझे
नारायण के वक्षःस्थल में हरिणी के रूप में लीलानिहार करने वाली लक्ष्मी समझ । मैं
पृथु, भरत, भगीरथ, मनु आदि के वंशों की पताका हूँ । योद्धाओं की भुजाओं के जयस्तम्भ
में विलसित होने वाली शालभञ्जिका ( पत्थर की उत्कीर्ण मूर्ति) हूँ । युद्ध में बहती हुई
रक्त की नदियों की तरङ्गों में क्रीडा का सुख अनुभव करने वाली मैं राजहंसी हूँ । राजाओं