हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय उच्छ्वासः १८३
मानुषनिर्माणकारणकालुष्यपरमाणूनिव क्षयमुपनयन्तम्, आहुतिदानप-
र्यस्ताभिः प्रेतमुखस्पर्शदूषितम्, प्रक्षालयन्तमिवाशुशुक्षणिं करनखदी-
धितिभिः, धूमालोहितेन चक्षुषा क्षतजाहुतिमिव हुतभुजि पातयन्तम्,
ईषद्विवृताधरपुटप्रकटितसितदशनशिखरेण दृश्यमानमूर्तमन्त्राक्षरपङ्क्तिनेव
मुखेन किमपि जपन्तम्, होमश्रमस्वेदसलिलप्रतिबिम्बिताभिरासन्नदी-
पिकाभिर्दहन्तमिव कर्मसिद्धये सर्वावयवान्, अंसावलम्बिना बहुगुणेन
विद्याराजेनेव ब्रह्मसूत्रेण परिगृहीतं भैरवाचार्यमपश्यत् । उपसृत्य चाक-
रोन्नमस्कारम् । अभिनन्दितश्च तेन स्वव्यापारमन्वतिष्ठत् ।
अत्रान्तरे पातालस्वामी शातक्रतवीमाशामङ्गीचकार, कर्णतालः
कौबेरीं परिव्राट् प्राचेतसीम् । राजा तु त्रैशङ्कवेन ज्योतिषाङ्कितां ककुभ-
मलंकृतवान् ।
मपि कालुष्यकथनम् । क्षतजमिति । प्रस्तावनानुगुण्येन रक्ताहुतिः संभाव्यते । जपव-
शादीषदित्याद्युक्तम् । ईषद्विवृतत्वादेव शिखरग्रहणम् । प्रतिबिम्बादानोपपादनार्थ-
मासन्नपदम् । गुणास्तन्तवः, गुणनं गुणाः । पौनःपुन्येनावर्तनं च । उत्कर्षो वा गुणः।
विद्याराजो मन्त्रविशेषः ।
शातक्रतवीं पूर्वीम् । अङ्गीचकारेत्यनेन सर्वेषां स्वरुचिपरिगृहीतत्वमुक्तम् ।
कौबेरीमुत्तराम् । प्राचेतसीं पश्चिमाम् । त्रिशङ्कुरिक्ष्वाकुवंशयः शापाच्चण्डालतां
प्राप्तो यज्ञेन स्वर्गमारुरुक्षुरर्धपथे देवैर्निवारितो दक्षिणस्यां दिश्युदेति । तेन त्रैश-
ङ्कवेन ज्योतिषाङ्कितां ककुभं दिशं दक्षिणाम् । दक्षिणस्यामित्युक्तेऽनिष्टप्रतीतिरिति
त्रैशङ्कवेनेत्युक्तम् ।
जन्म लेने के हेतु कालुष्य के समस्त परमाणुओं का विनाश कर रहे हों । आहुति डालते
समय उनके हाथ के नखों की किरणें फैल जाती थीं मानों प्रेत के मुँह के स्पर्श से दूषित
अग्नि को धोकर पवित्र कर रहे थे । धुँए के लगने से उनकी आँखें लाल हो रही थीं मानों
अग्नि में रक्त की आहुति डाल रहे थे । वे जप कर रहे थे, उनका अधर कुछ खुला हुआ
था, उनके दाँत मूर्तिमान् मन्त्र के अक्षरों की भाँति दिखाई पड़ रहे थे । उनके पास में रखे
हुए दीये शरीर के छूटते हुए पसीनों में झलक रहे थे, मानों वे कर्मसिद्धि के लिए अपने
अङ्ग जला रहे थे । उनके कन्धे से विद्याराज नामक मन्त्र के समान बहुत गुणों वाला
ब्रह्मसूत्र लटक रहा था । राजा ने भैरवाचार्य के पास जाकर नमस्कार किया । फिर राजा
अपने काम में लग गए ।
इसी बीच पातालस्वामी पूर्व दिशा में बैठा, कर्णताल उत्तर में और टीटिभ पश्चिम
में डट गया । राजा ने दक्षिण दिशा को अलंकृत किया जो त्रिशंकु के तेज से चिह्नित है ।