हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय उच्छ्वासः १८१
टिटविकटस्वस्तिकाप्रन्थीन्महामुद्राबन्धानिव धारयन्तो मूर्धभिः एक श्रव-
णविवरविततविमलदन्तपत्रप्रभालोकलेपधवलितकपोलैर्मुखैरपिबन्त इव
निशाचरापचयचिकीर्षया शार्वरमन्धकारम्, इतरकर्णावलम्बिनां
रत्नकुण्डलानामच्छाच्छया रुचा गोरोचनयेव मन्त्रपरिजप्तया समाल-
ब्धाङ्गाः, स्वप्रतिबिम्बगर्भान्कर्मसिद्धये दत्तपुरुषोपहारानिवोल्लासयन्तो
निशितान्निस्त्रिंशान्, निस्त्रिंशांशुसंतानसीमन्तिततिमिरामात्मीयात्मीय-
दिग्भागसंरक्षणाय त्रिधेव त्रियामां पाटयन्तः, सार्धचन्द्रैः कलधौतबु-
द्बुदावलितरलतारागणैर्निशाया इव परुषासिधारानिकृत्तैः खड्गैर्गृहीतै-
श्चर्मफलकैरकाण्डशर्वरीमपरां घटयन्तः, काञ्चनशृङ्खलाकलापनियमित-
निबिडनिष्प्रवाणयः, बद्धासिधेनवः, टीटिभकर्णतालपातालस्वामिनो
निवेदितवन्तश्चात्मानम् ।
सन्नद्धः सकवचः । उक्तं च—'संनद्धो वर्मितः सज्जो दंशितो व्यूढकङ्कटः' । अप-
चयो हानिः । गोरोचनयेवेति सहोपमेयम् । उल्लासयन्तश्चालयन्तः । सार्धचन्द्रैरिति ।
निशायां खड्गेषु चन्द्रखण्डस्य संभाव्यमानत्वादेवमुक्तम् । न तु वस्तुवृत्तेन । कृष्ण-
चतुर्दशीक्षपायां चन्द्रः संभवतीति । कलधौतं हेम रौप्यं वा । बुद्बुदावलिर्बिन्दु-
पङ्क्तिः । चर्मफलकैः स्फटकैः । एकस्या वर्तमानत्वाह—अपरामिति । निष्प्रवाणि
नवं वस्त्रम् । उक्तं च—'अनाहतं निष्प्रवाणि तन्त्रकं च नवाम्बरे' । असिधेनुः
कृपाणम् ।
थी, मानों महामुद्राबंधों को धारण कर रहा हो । एक ही कान पर लटकते हुए निर्मल
दन्तपत्र की प्रभा से उनके मुखकमल भर रहे थे मानों राक्षसों के विनाश की इच्छा से
रात्रि के अन्धकार पीते जा रहे थे । उनके दूसरे कान में रत्नकुण्डल लटक रहे थे जिनकी
किरणें अभिमन्त्रित गोरोचना की भाँति उनके अङ्गों में लग रही थीं । तेज धार वाली
तलवारों में उनकी छाया पड़ रही थी मानों कर्मसिद्धि के लिए उनसे पुरुषों की बलि
दी गई हो । वे तलवार की किरणों से अन्धकार को छाँट रहे थे मानों अलग-अलग अपनी
अपनी दिशा की रक्षा के लिए रात को तीन भागों में बाँट रहे हों । उनके हाथ में ढाल
भी थे जिन पर अर्धचन्द्र और सोने की बुंदकियाँ बनी हुई थीं मानों तलवार की तेज
धार से रात के टुकड़े-टुकड़े कर दिए थे और मानों दूसरी रात का निर्माण कर रहे हों ।
कमर में सोने की सीकरी से नया वस्त्र बँधा हुआ था और उसमें छुरी खोसी हुई थी ।
टीटिम, कर्णताल और पातालस्वामी तीनों सामने आ गए ।