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सर्वकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 199, कुल 506 में से

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पृष्ठ 199

१५४ हर्षचरितम्
लाहलैलैरालक्ष्यमानक्षेत्रः, क्षीरोदपयःपायिपयोद्सिक्ताभिरिव पुण्ड्रेक्षु-
वाटसंततिभिर्निरन्तरः, प्रतिदिशमपूर्वपर्वतकैरिव खलधानधामभिर्विभज्य-
मानैः सस्यकूटैः संकटसकलसीमान्तः, समन्तादुद्घातघटीसिच्यमानैर्जीर-
कजूटैर्जटिलितभूमिः, उर्वरावरीयोभिः शालेयैरलंकृतः, पाकविशारूराजमा-
षनिकरकिर्मीरितैश्च स्फुटितमुद्गफलकोशीकपिशितैर्गोधूमधामभिः स्थलीपष्ठै-
रधिष्ठितः, महिषपृष्ठप्रतिष्ठितगायद्गोपालपालितैश्च कीटपटललम्पटचटका-
नुसृतैरवटुघटितघण्टाघटीरटितरमणीयैरटद्भिरटवीं हरवृषभपीतमामयाश-
ङ्कया बहुधाविभक्तं क्षीरोदमिव क्षीरं क्षरद्भिर्बाष्पच्छेद्यतृणतृप्तैर्गोधनैर्धव-
लितविपिनः, विविधमखहोमधूमान्धशतमम्युमुक्तैर्लोचनैरिव सहस्र-
संख्यैः कृष्णशारैः शारीकृतोदेशः, धवलधूलिमुचां केतकीवनानां रजोभिः
अतिमाधुर्यात्क्षीरोदेत्याद्युत्प्रेक्षा । निरन्तरो निर्विवरः । तदैव कल्पितत्वादपूर्वत्वम् ।
खलधानधामभिः खलपालैः । उद्घातोऽरघट्टः । जीरकोऽजाजी । जूटः समूहः ।
उर्वरा सर्वसस्याढ्या भूः । वरीयोभिरुरुतरैः । शालेयैः शालिक्षेत्रैः । युगपत्पा-
कसंभवाद्भिशरारुत्वम् । किर्मीरैः शबलैः । कोशी शिम्बिका । गोधनस्य क्षतपृष्ठ-
त्वात्कीटसंभवः । अवटुर्ग्रीवा । घण्टेव घटी घण्टाघण्टी । आमयोऽजीर्णम् । हरवृषभेण
पीतं संतमजीर्णसंभावनया बहुधा विभक्तम् । बाप्पच्छेद्येति सौकुमार्यकथनपरम् ।
विपिनं गहनम् । मुक्तैः पतितैः । लोचनान्यपि कृष्णशाराणि सहस्रसंख्यानि च ।
वर्णन कर रहे हों । चारों ओर पौधों के खेत फैले हुए थे, जिन्हें मानों क्षीर के समुद्र को
पीकर आए मेघों ने बरस कर सींचा था । सब ओर जगह-जगह पर खलिहानों में कृत्रिम
पर्वत की भाँति धान की ढेरियां लगती थीं । रहट के द्वारा जीरक की फसल से हरी-भरी
जमीन सींची जाती । धनखर खेतों में धान लहराते थे । जगह-जगह की कृत्रिम भूमियों
में पके हुए राजमाष की रंगीनी और पककर चटके हुए मूँग और गेहूं के खेत सब ओर
फैले थे । चरवाहे चारों ओर जंगलों में भैंस की पीठ पर बैठ कर गीत गा रहे थे और
चरती हुई गायों की देखभाल करते थे । गायों में कुकुरमक्खियाँ लपट कर उन्हें परेशान
करतीं और फुदकुदी चिड़ियाँ भी उनके पीछे पड़ जातीं । गायों की घेंट में बँधी हुई
घंटियाँ और छोटे-छोटे घुंबरू बहुत मधुर आवाज करते थे । गायें चारों ओर जंगल में
टहरती थीं । अजीर्ण होने की आशंका से शिवजी के बसहे बैल द्वारा पिए हुए क्षीरसमुद्र
को मानों दूध के अनेक धार के रूप में उत्पन्न करती थीं । वे गड़ांसी द्वारा छँटी बास की
कुट्टी खाकर अघा जाती थीं । अनेक यज्ञों के होमधूमों से अंधे होने के कारण इन्द्र के
द्वारा छोड़ी हुई आँखों के रूप में हजारों मृग उस स्थान को चित्र-विचित्र करते थे । केवड़े