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विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

सत्यभामाजीके द्वारा नारदजीको श्रीकृष्णका दान (पृष्ठ-संख्या ५२०)

विष्णुपर्व ] षट्सप्ततितमोऽध्यायः ५२१


'धर्मज्ञ नारद ! तुम्हें जो अभीष्ट हो, वह वर मुझसे माँगो। मैं तुम्हें वह वर अवश्य दूँगा; क्योंकि तुम्हारे ऊपर मेरा बहुत प्रेम है' ॥ १५ ॥

नारद उवाच
नित्यमेवास्तु मे प्रीतो भवान् विष्णो सनातन ।
त्वत्प्रसादात्तु सालोक्यं व्रजेयं ते महामते ॥ १६ ॥

**नारदजीने कहा—**सनातन विष्णो ! महामते ! आप मुझपर सदा ही प्रसन्न रहें और आपकी कृपासे मुझे आपही-का सालोक्य प्राप्त हो ॥ १६ ॥

अयोनिजो भवेयं ते नारायण सतां गते ।
भवेयं ब्राह्मणश्चैव पुनर्जात्यन्तरेष्वपि ॥ १७ ॥

सत्पुरुषोंके आश्रयभूत नारायण ! मैं आपकी कृपासे अयोनिज होऊँ और जन्मान्तरोंमें भी पुनः ब्राह्मण ही होऊँ ॥ १७ ॥

एवमस्त्विति तं देवो विष्णुः प्रोवाच भारत ।
तुतोष च ततो धीमान् नारदो मुनिसत्तमः ॥ १८ ॥

भारत ! तब भगवान् विष्णुने उनसे कहा—'एवमस्तु (ऐसा ही हो) ।' यह वरदान पाकर बुद्धिमान् मुनिश्रेष्ठ नारद बहुत संतुष्ट हुए ॥ १८ ॥

षोडश स्त्रीसहस्राणि विष्णोरतुलतेजसः ।
निमन्त्रितानि कौरव्य सत्यया हरिकान्तया ॥ १९ ॥

कुरुकुलनन्दन ! श्रीकृष्णप्रिया सत्याने अतुल तेजस्वी श्रीहरिकी सोलह हजार स्त्रियोंको अपने भवनमें निमन्त्रित किया ॥ १९ ॥

तासां ददौ संनियोगमेकैकं हरिवल्लभा ।
शच्या यो वासुदेवस्य पुरा दत्तो नराधिप ॥ २० ॥

नरेश्वर ! पहले शचीने भगवान् वासुदेवको जो भेंट-सामग्री दी थी, श्रीकृष्णवल्लभा सत्यभामाने उसमेंसे एक-एक वस्तुको लेकर उन सबको दिया ॥ २० ॥

पारिजातो वसंस्तत्र ततः प्रववृते तदा ।
आज्ञया वासुदेवस्य नारदेन महात्मना ॥ २१ ॥
निमन्त्रिता गणाः सर्वे केशवेन महात्मना ।
विभूतिं पारिजातस्य ददृशुः कुरुनन्दन ॥ २२ ॥

पारिजात वृक्ष वहाँ रहकर अपने गुणोंको प्रसिद्ध करने लगा । तत्पश्चात् श्रीकृष्णकी आज्ञासे महात्मा नारदने उनके समस्त सुहृदोंको निमन्त्रित किया । कुरुनन्दन ! महात्मा केशवद्वारा निमन्त्रित हुए उन सब लोगोंने अपनी आँखोंसे पारिजात वृक्षका वैभव देखा ॥ २१-२२ ॥

पाण्डवांश्चानयामास सहैव पृ॑थया हरिः ।
द्रौपद्या च महातेजास्तथैव च सुभद्रया ॥ २३ ॥

महातेजस्वी श्रीहरिने कुन्ती, द्रौपदी और सुभद्राके साथ पाण्डवोंको भी द्वारकामें बुलवाया ॥ २३ ॥

श्रुतश्रवां च ससुतां भीष्मकं ससुतं तदा ।
अन्यानपि च कौरव्य मित्रसम्बन्धिबान्धवान् ॥ २४ ॥

कुरुनन्दन ! श्रुतश्रवा और उसके पुत्र शिशुपालको, भीष्मक और उसके पुत्र रुक्मीको तथा अन्यान्य मित्रों, सम्बन्धियों एवं बन्धु-बान्धवोंको श्रीकृष्णने वहाँ बुलवाया था २४

रेमे च सह पार्थेन फाल्गुनेन जनार्दनः ।
सान्तःपुरो महातेजाः परमर्द्धयावसन्नृप ॥ २५ ॥

नरेश्वर ! महातेजस्वी जनार्दन कुन्तीपुत्र अर्जुनके साथ रनवाससहित वहाँ क्रीड़ाविनोदपूर्वक बड़े आनन्दसे रहे । वे उच्चकोटिकी समृद्धिसे सम्पन्न होकर द्वारकामें निवास करते थे ॥ २५ ॥

संवत्सरे ततो याते केशिहामरसत्तमः ।
पारिजातं पुनः स्वर्गमानयत् सर्वभावनः ॥ २६ ॥

एक वर्ष बीत जानेपर सबको उत्पन्न करनेवाले अमर-शिरोमणि केशिहन्ता श्रीकृष्णने पारिजात वृक्षको पुनः स्वर्गलोकमें पहुँचा दिया ॥ २६ ॥

तत्रादितिं कश्यपं च दृष्ट्वा स्वजननीं प्रभुः ।
शक्रेण सहितो धीमानप्रमेयपराक्रमः ॥ २७ ॥

अप्रमेय पराक्रमशाली बुद्धिमान् भगवान् श्रीकृष्णने वहाँ इन्द्रसहित जाकर पिता कश्यप तथा अपनी माता अदितिका दर्शन किया ॥ २७ ॥

तमुवाचादितिर्माता प्रणतं मधुसूदनम् ।
सौभ्रात्रमस्तु वामेवं नित्यं चामरसत्तम ॥ २८ ॥
मनोरथं मम त्वं च पूरयस्व जनार्दन ।

उस समय अपने चरणोंमें पड़े हुए मधुसूदनसे माता अदितिने कहा—'अमरश्रेष्ठ ! तुम दोनोंमें सदा ही अच्छा भ्रातृभाव बना रहे । जनार्दन ! तुम मेरे इसी मनोरथको पूर्ण करो' ॥ २८½ ॥

तथेत्येवाब्रवीत् कृष्णस्ततो मातरमात्मवान् ॥ २९ ॥
आमन्त्रयित्वा पितरौ देवराजानमब्रवीत् ।
वासुदेवो महातेजाः कालप्राप्तमिदं वचः ॥ ३० ॥

तब मनस्वी श्रीकृष्णने माता अदितिसे कहा—'बहुत अच्छा, ऐसा ही करूँगा।' तत्पश्चात् पिता-मातासे विदा ले महातेजस्वी वासुदेवने देवराज इन्द्रसे यह समयोचित बात कही—॥ २९-३० ॥

महादेवेन देवेश संदिष्टोऽस्मि महात्मना ।
अन्तर्भूमितलेऽबध्यान्सुरान् प्रति मामद ॥ ३१ ॥

५२२ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे

'दूसरोंको मान देनेवाले देवेन्द्र ! महात्मा महादेवजीने भूमिके भीतर निवास करनेवाले अवध्य असुरोंका वध करनेके लिये मुझे आदेश दिया है ॥ ३१ ॥

तदितो दशरात्रेण हन्ताहमसुरोत्तमान् ।
तत्रोपविष्टान् स्थातव्यं प्रवरेण महात्मना ॥ ३२ ॥
जयन्तेन च वीरेण दानवानां जिघांसया ।

'अतः मैं आजसे लेकर दस रातके भीतर भूमिके भीतर बैठे हुए उन बड़े-बड़े असुरोंका वध कर डालूँगा। वहाँ दानवोंके वधकी इच्छासे महात्मा प्रवर तथा वीर जयन्तको भी मेरे साथ रहना चाहिये ॥ ३२½ ॥

एकोऽत्र मानुषो देवो देवपुत्रस्तथा परः ॥ ३३ ॥
अवध्याः किल ते देवैर्ब्रह्मणो वरदर्पिताः ।
अस्माभिः किल हन्तव्यां मानुषत्वमुपागतैः ॥ ३४ ॥

'इनमेंसे एक (प्रवर) तो मनुष्य देव है और दूसरा (जयन्त) देवपुत्र। ब्रह्माजीके वरसे मदमत्त हुए वे दैत्य देवताओंके लिये अवध्य हैं; परंतु मनुष्य-भावको प्राप्त हुए हमलोग उन्हें अवश्य मार डालेंगे' ॥ ३३-३४ ॥

तथेति कृष्णं स हरिः प्रीतरूपस्तथाब्रवीत् ।
सस्वजाते ततो देवावन्योन्यं जनमेजय ॥ ३५ ॥

जनमेजय ! तब इन्द्रने प्रसन्न होकर श्रीकृष्णसे कहा— 'ऐसा ही होगा।' फिर वे दोनों देवता एक-दूसरेसे गले मिले ॥ ३५ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि पारिजातहरणे स्वर्गे पारिजातस्थापने षट्सप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७६ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें पारिजातहरणके प्रसङ्गमें पारिजातकी पुनः स्वर्गलोकमें स्थापनाविषयक छिहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७६ ॥


सप्तसप्ततितमोऽध्यायः

पुण्यक-विधिके वर्णनका उपक्रम

जनमेजय उवाच
पुण्यकानां ममोत्पत्तिं कथयस्व द्विजोत्तम ।
द्वैपायनप्रसादेन सर्वं हि विदितं तव ॥ १ ॥

जनमेजयने पूछा—द्विजश्रेष्ठ ! पुण्यकोंकी उत्पत्ति किस प्रकार हुई है, यह मुझे बताइये; क्योंकि द्वैपायन व्यासकी कृपासे आपको सब कुछ विदित है ॥ १ ॥

वैशम्पायन उवाच
उमया पुण्यकविधिर्नरेन्द्रोत्पादितः पुरा ।
शृणु येन विधानेन लोके धर्मभृतां वर ॥ २ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ नरेन्द्र ! पूर्वकालमें भगवती उमाने पुण्यकव्रतकी विधिक प्रतिपादन किया है। उसके अनुसार लोकमें जिस विधानसे व्रत किया जाता है, उसे बताता हूँ, सुनो ॥ २ ॥

स्वर्गान्नीते पारिजाते कृष्णेनाक्लिष्टकर्मणा ।
ययौ द्वारवतीं धीमान् नारदो मुनिसत्तमः ॥ ३ ॥

जब अनायास ही महान् कर्म करनेवाले श्रीकृष्ण स्वर्गसे पारिजात वृक्षको द्वारकामें ले गये, उस समय बुद्धिमान् मुनिश्रेष्ठ नारदजी भी वहाँ पधारे ॥ ३ ॥

देवासुरे नृपश्रेष्ठ संग्रामे समुपस्थिते ।
षट्‌पुरस्य वधे घोरे महादेवाज्ञयानघ ॥ ४ ॥

निष्पाप नृपश्रेष्ठ ! जब महादेवजीकी आज्ञासे देवासुर-संग्रामका अवसर उपस्थित था और षट्पुरवासी दानवोंका घोर वध होनेवाला था, उसी समयकी बात है ॥ ४ ॥

कृष्णेन सहितं विप्रं नारदं धर्मवित्तमम् ।
आसीनं परिपप्रच्छ रुक्मिणी भैष्मिकी नृप ॥ ५ ॥

नरेश्वर ! धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ विप्रवर नारदजी श्रीकृष्णके साथ बैठे थे। उस समय भीष्मककुमारी रुक्मिणीने उनसे पूछा ॥ ५ ॥

तत्र जाम्बवती देवी सत्यभामा च भामिनी ।
गान्धारराजपुत्री च योगयुक्ता नराधिप ॥ ६ ॥
देव्यश्च नृप कृष्णस्य वह्व्योऽन्या वै समागताः ।
कुलशीलगुणोपेता धर्मशीलाः पतिव्रताः ॥ ७ ॥

नरेश्वर ! वहाँ रुक्मिणीके साथ जाम्बवती देवी, भामिनी सत्यभामा, गान्धारराजकुमारी योगयुक्ता शैव्या तथा श्रीकृष्णकी अन्य बहुत-सी कुलवती, सुशीला, गुणवती, धर्मशीला एवं पतिव्रता पत्नियाँ भी आयी हुई थीं ॥ ६-७ ॥

रुक्मिण्युवाच
मुने धर्मभृतां श्रेष्ठ धर्मज्ञानभृतां वर ।
उत्पत्तिं पुण्यकानां त्वं वक्तुमर्हस्यशेषतः ॥ ८ ॥

रुक्मिणीने कहा—धर्मात्माओं और ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ मुने ! आप मुझे पुण्यकोंकी उत्पत्तिका वृत्तान्त पूर्णरूपसे बतानेकी कृपा करें ॥ ८ ॥

विष्णुपर्व ] [ सप्तसप्ततितमोऽध्यायः ] ५२३

विधिं च फलयोंग च दानकालं तथैव च ।
कौतूहलं नस्तत्सिद्धिं वदस्व वदतां वर ॥ ९ ॥

वक्ताओंमें श्रेष्ठ देवर्षे ! उस पुण्यकव्रतकी विधि, फलयोंग और दानकाल क्या है ? उसकी सिद्धि कैसे होती है ? यह सब बताइये । हमें उसके विषयमें सुननेके लिये बड़ी उत्कण्ठा है ॥ ९ ॥

नारद उवाच

शृणु वैदर्भि धर्मज्ञे सपत्नीभिः सहानघे ।
पुण्यकानां विधिः प्रोक्तो यथा देवि पुरोमया ॥ १० ॥

नारदजीने कहा—धर्मको जाननेवाली निष्पाप विदर्भनन्दिनि ! देवि ! पूर्वकालमें उमादेवीने पुण्यकोंकी जैसी विधि बतायी थी, उसे तुम अपनी सौतोंके साथ सुनो ॥ १०॥

चचारोमा व्रतं देवी पुण्यकानां शुचिव्रता ।
व्रतावसानेऽथ तथा सख्यो देवि निमन्त्रिताः ॥ ११ ॥

देवि ! पवित्र व्रत धारण करनेवाली उमादेवीने जब पुण्यकोंका व्रत किया था, उस समय व्रतके अन्तमें उन्होंने अपनी सखियोंको निमन्त्रित किया ॥ ११ ॥

अदित्याद्याः सुताः सर्वा दक्षस्याक्लिष्टकर्मणः ।
पौलोमी च शची देवी ख्याता लोके पतिव्रता ॥ १२ ॥
रोहिणी च महाभागा सोमस्य दयिता सती ।
फाल्गुनी च तथा पूर्वा रेवती च विशाम्पते ॥ १३ ॥
तथा शतभिषा चैव मघा च कुरुनन्दन ।
एताभिर्हि महादेवी पूर्वमाराधिता सती ॥ १४ ॥

प्रजानाथ ! कुरुनन्दन ! अनायास ही सृष्टिसम्बन्धी महान् कर्म करनेवाले प्रजापति दक्षकी अदिति आदि समस्त पुत्रियाँ, लोकविख्यात पतिव्रता पुलोमकुमारी शची देवी, सोमकी प्यारी पत्नी सती साध्वी महाभागा रोहिणी, पूर्वा फाल्गुनी, रेवती, शतभिषा और मघा—ये सब-की-सब निमन्त्रित होकर वहाँ आयी थीं । इन सबने पूर्वकालमें सती महादेवी उमाकी आराधना की थी ॥ १२-१४ ॥

गङ्गा सरस्वती चैव वेणी गोदा च निम्नगा ।
तथा वैतरणी चैव गण्डकी या च भारत ॥ १५ ॥
अन्याश्च सरितो रम्या लोपामुद्रा च भारत ।
सत्यश्चान्या जगद् देव्यो धारयन्ति हिताः शुभाः॥ १६ ॥

भारत ! गङ्गा, सरस्वती, वेणी, गोदावरी, वैतरणी और गण्डकी—ये तथा और भी बहुत सी रमणीय सरिताएँ वहाँ आयी थीं । लोपामुद्रा और अन्य शुभलक्षणा सती देवियाँ, जो अपने धर्मसे इस जगत्‌को धारण करती हैं, वहाँ उपस्थित थीं ॥ १५-१६ ॥

शुभाश्च गिरिनन्दिन्यो वह्निकन्याश्च सुव्रताः ।
स्वाहा वह्निप्रिया देवी सावित्री च यशस्विनी ॥ १७ ॥
ऋद्धिः कुबेरकान्ता च जलेशमहिषी तथा ।
भार्या पितृपतेश्चैव वसुपत्न्यस्तथा च याः ॥ १८ ॥

सुन्दरी गिरिकन्याएँ, उत्तम व्रतका पालन करनेवाली अग्नि-कन्याएँ, अग्निदेवकी प्यारी पत्नी स्वाहा देवी, यशस्विनी सावित्री देवी, कुबेरकान्ता ऋद्धि, जलके स्वामी वरुणकी रानी, यमराजकी भार्या तथा वसुओंकी पत्नियाँ भी वहाँ उपस्थित हुई थीं ॥ १७-१८ ॥

ह्रीः श्रीर्धृतिस्तथा कीर्तिराशा मेधा च सुव्रताः ।
प्रीतिर्मतिश्च ख्यातिश्च संनीतिश्च तपोधनाः ॥ १९ ॥

ह्री, श्री, धृति, कीर्ति, आशा, मेधा, प्रीति, मति, ख्याति और संनीति—ये सब उत्तम व्रतका पालन करनेवाली तपोधना नारियाँ भी वहाँ एकत्र हुई थीं ॥ १९ ॥

देव्यः सत्यस्तथैवान्याः सर्वभूतहिते रताः ।
तासां व्रतावसाने च पूजां चक्रेऽम्बिका तदा ॥ २० ॥

इनके सिवा और भी समस्त भूतोंके हितमें तत्पर रहनेवाली सती देवियाँ उपस्थित थीं । अम्बिकाने व्रतके अन्तमें उन सबका पूजन किया ॥ २० ॥

तिलरत्नमयं दत्त्वा पर्वतं सर्वधान्यवत् ।
वासोभिर्भूषणैर्मुख्यैर्नानारागैः सुमध्यमे ॥ २१ ॥

सुमध्यमे ! तिल और रत्नोंद्वारा निर्मित हुए सम्पूर्ण धान्योंसे युक्त पर्वतका दान करके उमाने अनेक रंगोंके अच्छे-अच्छे वस्त्रों और श्रेष्ठ आभूषणोंसे उनकी पूजा की ॥ २१ ॥

प्रतिगृह्य तु तां पूजां दत्तां देव्या तपोधनाः ।
उपविष्टाः कथाश्चित्राः कुर्वन्त्यो भर्तृदेवताः ॥ २२ ॥

उमादेवीद्वारा दी गयी उस पूजाको ग्रहण करके वे तपोधना एवं पतिव्रता देवियाँ वहाँ बैठकर आपसमें विचित्र कथावार्ता करने लगीं ॥ २२ ॥

पुण्यकार्थे कथास्तासामासन्न देवी शशंस याः ।
विधिं च पुण्यकस्याथ सतीनां भर्तृदेवते ॥ २३ ॥

पतिदेवते ! उन सब देवियोंकी चर्चाका विषय था पुण्यकव्रत—ये उसके विषयमें जिज्ञासा करती थीं । उस समय देवी उमाने उन सतियोंको पुण्यकव्रत और उसकी विधिका उपदेश दिया था ॥ २३ ॥

तासां मतेन साध्वीनां सर्वासां सोमनन्दिनी ।
पर्यपृच्छदुमां देवीं पुण्यकानां विधिं वरा ॥ २४ ॥

वहाँ जुटी हुई उन सभी साध्वी देवियोंके मतसे श्रेष्ठ पतिव्रता सोमनन्दिनी अरुन्धतीने उमादेवीसे पुण्यकोंकी विधि पूछी ॥ २४ ॥

उमा तासां प्रियार्थं तु पुण्यकान्यब्रवीत् तदा ।
समक्षं मम वैदर्भि सर्वभूतहिते रता ॥ २५ ॥

५२४श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

विदर्भराजकुमारी ! समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर रहनेवाली उमादेवीने उन सतियोंका प्रिय करनेके लिये मेरे सामने ही उस समय उन्हें पुण्यकोंका उपदेश दिया ॥ २५ ॥

ममैव चोमया दत्तः स तदा रत्नपर्वतः ।
प्रतिगृह्य मया चैव कृतो ब्राह्मणसाच्छुभे ॥ २६ ॥

शुभे ! उमादेवीने उस दिन मुझे ही उस रत्नमय पर्वतका दान दिया था । वह दान लेकर मैंने ब्राह्मणोंके अधीन कर दिया था ॥ २६ ॥

उमा त्वरुन्धतीं साध्वीमामन्त्र्य यदभाषत ।
शृणु कल्याणि वक्ष्यामि सर्वाभिः सहिता शुभे ॥ २७ ॥

शुभे ! कल्याणी ! उमादेवीने साध्वी अरुन्धतीको सम्बोधित करके जो भाषण दिया था, उसे मैं बता रहा हूँ । तुम इन सभी रानियोंके साथ उसे सुनो ॥ २७ ॥

पुण्यकानां विधिं कृत्स्नं यथावदनुपूर्वशः ।
यथा चैव मया दृष्टस्तत एष विधिः शुभे ॥ २८ ॥

शुभे ! पुण्यकोंकी सम्पूर्ण विधिको जैसा मैंने वर्णन सुना है और जिस रूपमें उसे देखा है, उसी रूपमें मैं क्रमशः इसका यथावत् वर्णन करता हूँ, तुम सुनो ॥ २८ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि पुण्यकविधिकथने सप्तसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें पुण्यकविधिको कथनविषयक सतहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७७ ॥


अष्टसप्ततितमोऽध्यायः

उमाद्वारा सती स्त्रीके महत्त्वका वर्णन करते हुए पुण्यक-व्रतकी विधिका उपदेश

उमोवाच

सर्वज्ञाऽहं यदा भर्तुः प्रसादेन शुचिस्मिते ।
तदा पुरा ममादिष्टो दृष्टः पुण्यविधिः शुभः ॥ १ ॥

उमा बोलीं—पवित्र मुसकानवाली देवि ! मैं अपने पतिदेवकी कृपासे सर्वज्ञ हूँ तो भी पूर्वकालमें पतिदेवने मुझे इसका उपदेश दिया था । तभी मुझे इस शुभ पुण्यक-विधिका साक्षात्कार हुआ ॥ १ ॥

सनातनः पुण्यविधिरिति बुद्ध्यावगम्यताम् ।
महादेवप्रसादेन मया दृष्टस्त्वरुन्धति ॥ २ ॥

अरुन्धती ! तुम्हें अपनी बुद्धिसे इस बातको निश्चित रूपसे समझ लेना चाहिये कि पुण्यक-व्रतकी विधि सनातन है। मुझे महादेवजीकी कृपासे उसका दर्शन (ज्ञान) हुआ है ॥ २ ॥

पुण्यकानि च सर्वाणि चीर्णवत्यस्म्यनिन्दिते ।
अनुज्ञया भगवतो भर्तुः शर्वस्य धीमतः ॥ ३ ॥

अनिन्दिते ! मैंने अपने पति बुद्धिमान् भगवान् शिवकी आज्ञासे समस्त पुण्यकोंका आचरण किया है ॥ ३ ॥

सतीत्वं धर्मचरणं यस्या नित्यमखण्डितम् ।
पुण्यकानां विधिस्तस्याः पुराणैः परिकीर्तितः ॥ ४ ॥

जिस नारीको सतीत्व और धर्माचरणका अखण्डित रूपसे निर्वाह सदा अभीष्ट होता है, उसीके लिये पुरातन महर्षियोंने पुण्यकोंकी विधिका प्रतिपादन किया है ॥ ४ ॥

दानोपवासपुण्यानि सुकृतान्यप्यरुन्धति ।
निष्फलान्यसतीनां हि पुण्यकानि तथा शुभे ॥ ५ ॥

शुभे ! अरुन्धति ! असती नारियोंके द्वारा भलीभाँति किये जानेपर भी दान और उपवासके पुण्य तथा पुण्यक निष्फल हो जाते हैं ॥ ५ ॥

या वञ्चयन्ति भर्तारं योनिदुष्टाश्च याः स्त्रियः ।
योनिदोषात् पुण्यफलं नाश्नन्ति निरयङ्गमाः ॥ ६ ॥

जो स्त्रियाँ अपने पतिको ठगती हैं, उन्हें धोखा देती हैं, जिनकी योनि जारसंगसे दूषित हो गयी है, वे उस योनि-दोषके कारण पुण्यका फल नहीं भोगने पातीं; नरकमें ही गिरती हैं ॥ ६ ॥

साध्व्यो जगद् धारयन्ति सुशीलाः पतिदेवताः ।
अनन्या धर्मनित्याश्च सतीपन्थानमाश्रिताः ॥ ७ ॥

जिनके आचार-विचार शुद्ध हैं, जो पतिको ही आराध्यदेव मानती हैं, उनमें अनन्य भावसे अनुरक्त होती हैं, सदा धर्मके अनुष्ठानमें लगी रहती हैं और सतियोंके पथपर ही चलती हैं, वे साध्वी स्त्रियाँ ही इस जगत्को धारण करती हैं ॥ ७ ॥

अवाग्दुष्टाः शौचयुक्ता धृतिमत्यः शुभव्रताः ।
सततं साधुवादिन्यो धारयन्ति जगत् खलु ॥ ८ ॥

जिनकी वाणी परनिन्दा और असत्य आदि दोषसे दूषित नहीं है, जो बाहर-भीतरसे शुद्ध रहनेवाली हैं, जो धैर्यशालिनी तथा शुभ व्रतका पालन करनेवाली हैं, जो सदा अच्छी ही बातें बोला करती हैं, वे साध्वी स्त्रियाँ इस जगत्को धारण करती हैं ॥ ८ ॥

व्याधितः पतितो वापि दीनो वापि कथञ्चन ।
न त्यक्तव्यः स्त्रिया भर्ता धर्म एष सनातनः ॥ ९ ॥

अपना पति रोगी हो, पतित हो अथवा दीन हो, नारीको

विष्णुपूर्व ] अष्टसप्ततितमोऽध्यायः ५२५
किती तरह भी उसका त्याग नहीं करना चाहिते। यह
सनातन धर्म है ॥ ९ ॥
अकार्यकारिणं वापि पतितं वापि निर्गुणम् ।
स्त्री पतिं तारयत्येव तथाऽऽत्मानं शुभानने ॥ १० ॥
शुभानने ! पतिव्रता स्त्री अपना तथा न करनेयोग्य काम
करनेवाले पतित और गुणहीन पनिका भी उद्धार कर ही
देती है ॥ १० ॥
योनिदुष्टस्त्रियो नास्ति प्रायश्चित्तं हतैव सा ।
वाग्दुष्टे विहितं सद्भिः प्रायश्चित्तं पुरातने ॥ ११ ॥
जिस स्त्रीकी योनि दूषित है, उसकी शुद्धिके लिये कोई
प्रायश्चित्त ही नहीं है। वह तो अपने पापके द्वारा मारी ही
गयी। जो केवल वाणीके दोषसे दूषित है, उसकी शुद्धिके
लिये सत्पुरुषोंने वेदमें प्रायश्चित्त बताया है ॥ ११ ॥
भर्तुश्छन्देन कर्तव्यं व्रतकं सर्वदा स्त्रिया ।
उपवासोऽपि वा सत्ये काङ्क्षन्त्या सुकृतां गतिम् ॥ १२॥
सत्यपरायणा अरुन्धती ! जो पुण्यात्माओंको प्राप्त
होनेवाली गतिकी अभिलाषा रखती हो, उस स्त्रीको अपने
पतिकी आज्ञाके अधीन होकर ही सदा व्रतका पालन अथवा
उपवास करना चाहिये ॥ १२ ॥
कल्पान्तरसहस्रेषु न स्त्री सा लभते गतिम् ।
तिर्यग्योनिसहस्रेषु पच्यते योनिविप्लवात् ॥ १३ ॥
योनि दूषित करनेसे नारी पशु-पक्षी आदिकी सहस्रों
योनियोंमें जन्म लेकर कष्ट भोगती है। वह स्त्री सहस्रों कल्पोंमें
भी सद्गति नहीं पाती ॥ १३ ॥
यदि सा नाम मानुष्यं स्त्री लभेदसती सती ।
चण्डालयोनौ दुर्मेधा जायते कुक्कुराशना ॥ १४ ॥
यदि असती होकर रहनेवाली नारी मरनेके बाद कभी
मनुष्य-योनिमें जन्म लेती है तो चाण्डाल-योनिमें ही उसकी
उत्पत्ति होती है और वह खोटी बुद्धिवाली स्त्री कुत्तोंका मांस
खानेवाली चाण्डाली होती है ॥ १४ ॥
भर्ता देवः सदा स्त्रीणां सद्भिर्दृष्टस्तपोधने ।
यस्या हि तुष्यते भर्ता सा सती धर्मचारिणी ॥ १५ ॥
तपोधने ! स्त्रियोंके लिये सदा पति ही देवता है।
सत्पुरुषोंने इस सत्यका साक्षात्कार किया है। जिस स्त्रीपर
उसका पति संतुष्ट रहता है, वह सती एवं धर्मचारिणी है ॥
कौतूहलहतानां तु स्त्रीणां लोको न शोभनः ।
भर्तर्येव मनो यासां सद्भावेन व्यवस्थितम् ॥ १६ ॥
जो कौतूहलवश परपुरुषोंका सङ्ग करके मारी गयी हैं,
उन स्त्रियोंको कभी उत्तम लोककी प्राप्ति नहीं होती। जिनका
मन सद्भावपूर्वक केवल पतिमें ही लगा रहता है, उन्हींको
सती समझना चाहिये ॥ १६ ॥
कर्मणा मनसा वाचा पतिं नातिचरन्ति याः ।
तासां पुण्यफलं सौम्ये पुण्यकैः समुदाहृतम् ॥ १७ ॥
सौम्य स्वभाववाली अरुन्धती ! जो नारियाँ मन, वाणी
और क्रियाद्वारा पतिका उल्लङ्घन नहीं करती हैं, उन्हींको
पुण्यक-व्रतोंद्वारा पुण्यफलकी प्राप्ति बतायी गयी है ॥ १७ ॥
पुण्यकानां विधिं कृत्स्नं स्वर्लोकप्रतिशोभने ।
निबोध सह सर्वाभिर्हृष्टो यस्तपसा मया ॥ १८ ॥
स्वर्गलोककी शोभा बढ़ानेवाली देवि ! मैंने तपस्याद्वारा
जिसका साक्षात्कार किया है, पुण्यकोंकी वह सम्पूर्ण विधि
बतायी जाती है। तुम इन सारी स्त्रियोंके साथ उसे ध्यान
देकर सुनो ॥ १८ ॥
स्नात्वा स्त्री प्रातरुत्थाय पतिं विज्ञापयेत् सती ।
उपवासार्थमथ वा व्रतकार्थे धृतव्रते ॥ १९ ॥
व्रत धारण करनेवाली देवि ! साध्वी स्त्रीको चाहिये कि
वह प्रातःकाल उठकर स्नान करनेके पश्चात् पतिको यह सूचित
करे कि आज मुझे उपवास अथवा व्रत करना है ॥ १९ ॥
श्वशुराभ्यां च चरणौ सततं सत्तमस्य च ।
प्रहायौदुम्बरं पात्रं सकुशं साक्षतं तथा ॥ २० ॥
गोशृङ्गं दक्षिणं सिञ्च्य प्रतिगृह्णीत तज्जलम् ।
ततो भर्तुः सती दद्यात् स्नातस्य प्रयतस्य च ॥ २१ ॥
आत्मनोऽपि निषेक्तव्यं ततःशिरसि तज्जलम् ।
त्रैलोक्यसर्वतीर्थेषु स्नानमेतदुदाहृतम् ॥ २२ ॥
वह सास-ससुर तथा साधु-महात्माके चरणोंमें सदा प्रणाम
करे; फिर कुश और अक्षतसे युक्त ताम्रपात्र लेकर गायके
दाहिने सींगको नहलाकर उस जलको ग्रहण कर ले। इसके
बाद सती स्त्री स्नान करके एकाग्र चित्त हुए पतिके मस्तकपर
उस जलको छिड़के। तदनन्तर अपने मस्तकपर भी उस जलके
छींटे डाले। यह त्रिलोकीके सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नान बताया गया है ॥
उपवासेषु कर्तव्यमेतद्धि व्रतकेषु च।
स्नानमेतद्धि सामान्यं स्त्रीणां पुंसां च भामिनि ॥ २३ ॥
भामिनि ! उपवास और व्रतके अवसरोंपर यह स्नान
अवश्य करना चाहिये। यह स्त्रियों और पुरुषोंके लिये सामान्य
स्नान है ॥ २३ ॥
अरुन्धति मया दृष्टं तपसा हरतेजसा ।
अशल्यविद्धं शयनमासनं च तथाविधम् ॥ २४ ॥
अरुन्धती ! मैंने महादेवजीके तेज और अपनी तपस्यासे
देखा है कि इस व्रतमें नारीके लिये ऐसी शय्या होनी चाहिये,
जो कण्टकविद्ध न हो। आसन भी वैसा ही होना चाहिये ॥
स्वयं प्रक्षालनं चापि पादयोरनुशब्दितम् ।
अश्रुप्रपातो रोषश्च कलहश्च कृतः सति ।
उपवासाद् व्रताद् वापि सद्यो भ्रंशयति स्त्रियः ॥२५॥

५२६श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

उसके लिये अपने पैरोंको स्वयं ही धोनेका विधान है। साध्वी अरुन्धती ! यदि आँसू गिराया गया, रोष और कलह किया गया तो वह स्त्रियोंको तत्काल ही उपवास और व्रतके पुण्यसे भ्रष्ट कर देता है ॥ २५ ॥

शुक्लमेव सदा वासः प्रशस्तं चन्द्रसम्भवे ।
अन्तर्वासोऽपरं चैव उपवासे व्रते तथा ॥ २६ ॥

चन्द्रकुमारी ! उपवास तथा व्रतमें सदा श्वेत वस्त्र धारण करना ही उत्तम माना गया है। साड़ीके भीतर एक दूसरा वस्त्र (पेटीकोट आदि) भी डाल लेना चाहिये ॥ २६ ॥

पादुकार्थं तृणैः कार्यं सर्वदा व्रतके सति ।
उपवासेऽपि च विधिरेष एव प्रवर्तितः ॥ २७ ॥

साध्वी अरुन्धती ! व्रतके अवसरपर उपयोगमें लानेके लिये सदा बेंत आदि तृणोंकी ही पादुका बनवा लेनी चाहिये (चमड़ेकी पादुका नहीं धारण करनी चाहिये)। उपवासमें भी यही विधि चलायी गयी है ॥ २७ ॥

अञ्जनं रोचनं चापि गन्धान् सुमनसस्तथा ।
व्रतके चोपवासे च नित्यमेव विवर्जयेत् ॥ २८ ॥

सती नारीको चाहिये कि वह व्रत तथा उपवासके अवसरपर अञ्जन, गोरोचन, भाँति-भाँतिके गन्ध और फूलोंका सदा ही परित्याग करे ॥ २८ ॥

दन्तकाष्ठं शिरःस्नानमुद्वर्तनमथापि वा ।
विवर्जितं मृदा सर्वं शौचार्थं तु विधीयते ॥ २९ ॥

इस व्रतमें नारीके लिये काठका दातौन करना, सिरके ऊपरसे नहाना अथवा अङ्गोंमें उबटन लगवाना वर्जित है। सब प्रकारकी शुद्धिके लिये मृत्तिकाके ही उपयोगका विधान है॥

बिल्वामृतफलैर्नित्यं श्रीफलैश्च समाचरेत् ।
प्रक्षालनं वै शिरसः सदामृन्मिश्रितैर्जलैः ॥ ३० ॥

बेल, हर्रे या आँवला तथा श्रीफलसे जिसमें मिट्टी न मिली हुई हो, संयुक्त जलके द्वारा सदा ही अपने सिरको धोना चाहिये ॥ ३० ॥

शिरसोऽभ्यञ्जनं सौम्ये नैव तावत् प्रशस्यते ।
न पादयोर्न गात्रस्य स्नेहेनेति स्थितिः स्मृता ॥ ३१ ॥

सौम्ये ! इस व्रतमें सिरका अभ्यङ्ग अर्थात् उबटन या बेसनका चूर्ण लगाकर नहाना नहीं अच्छा माना गया है। पैरों अथवा समूचे शरीरमें भी तेल न मले। यही मर्यादा मानी गयी है ॥ ३१ ॥

गोयानमुष्ट्रयानं च खरयानं च वर्जितम् ।
नग्नस्नानं च सततं व्रते चाप्युपवासके ॥ ३२ ॥

प्रत्येक व्रत और उपवासमें बैल, ऊँट और गधोंसे जुते हुए वाहनका उपयोग वर्जित है। उसमें कभी नग्न स्नान नहीं करना चाहिये ॥ ३२ ॥

नदीजलं प्रस्रवणं प्रशस्तं सोमनन्दिनि ।
शुभे तडागे वाप्यादौ विस्तीर्णे जलजायुते ॥ ३३ ॥
गत्वा स्नानं प्रशस्तं तु सदैव खलु सर्वथा ।

सोमनन्दिनि ! नदी और झरनेका जल उत्तम माना गया है। कमलोंसे मण्डित, सुन्दर एवं विस्तृत पोखरे या बावड़ी आदिमें जाकर स्नान करना सदा ही सब प्रकारसे प्रशस्त है॥

अलाभे त्ववरुद्धा स्त्री घटस्नानं समाचरेत् ॥ ३४ ॥
नवैश्च कुम्भैः स्नातव्यं विधिरेष पुरातनः ।
स्नानं च कार्यं शिरसा तपःफलमवाप्नुयात् ॥ ३५ ॥

जिसके लिये बाहर जानेपर रोक है, वह परदेके भीतर रहनेवाली नववधू नारी तड़ाग आदिमें स्नानका सुयोग न मिलनेपर घड़ोंके जलसे स्नान करे। वह नये घड़ोंके जलसे स्नान करे—यही प्राचीन विधि है। (व्रतके सिवा अन्य अवसरोंपर) सिरके ऊपरसे स्नान करना चाहिये। इससे तपस्याका फल प्राप्त होता है ॥ ३४-३५ ॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि पारिजाताहरणे पुण्यकविधौ अष्टसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७८ ॥

इस प्रकार श्रीमन्महाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें पारिजाताहरणके प्रसङ्गमें पुण्यकविधिविषयक अठहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७८ ॥


एकोनाशीतितमोऽध्यायः

पुण्यक-व्रतसम्बन्धी नियम एवं दानका वर्णन तथा पुत्र आदिके निमित्त किये जानेवाले दूसरे व्रत एवं दानका प्रतिपादन

उमोवाच

विधिनैतेन कृत्स्नेन स्त्री सदा भर्तृदेवता ।
चरेत् संवत्सरं दान्ता षण्मासान् मासमेव च ॥ १ ॥

उमा कहती हैं—देवि ! पतिव्रता स्त्री इस सम्पूर्ण विधिके साथ एक वर्ष या छः मास अथवा एक मासतक सदा इन्द्रिय-संयमपूर्वक व्रतका आचरण करे ॥ १ ॥

विष्णुपर्व ] एकोनाशीतितमोऽध्यायः ५२७
स्त्रियो ह्यावाहयेत् साध्वीरेकादश समाधिना ।
स्वयं चैव विधिर्दृष्टो व्रतकानां मया शुभः ॥ २ ॥
इसमें ग्यारह साध्वी स्त्रियोंको बुलाना चाहिये। मैंने
स्वयं ही समाधिके द्वारा व्रतोंके इस शुभ विधानका साक्षात्कार
किया है ॥ २ ॥
अद्भिर्दद्यात् सतीः सर्वा या मूलव्रतिनी भवेत् ।
तासां तु निष्क्रयो देयः कालदेशानुरूपतः ॥ ३ ॥
मूल व्रतका अनुष्ठान करनेवाली प्रधान स्त्री अपने यहाँ
आमन्त्रित की गयी उन समस्त ग्यारह सतियोंका दान करे
और देश-कालके अनुसार उनका निष्क्रय दे दे* ॥ ३ ॥
ततो मासान्तशुक्लस्य तिथौ च नवमी तथा ।
आराधयित्वा कर्तव्यं व्रतस्यापवर्जनम् ॥ ४ ॥
तदनन्तर मासके अन्तमें शुक्ल-पक्षकी नवमी तिथिको
देवाराधना करके व्रतको समाप्त करना चाहिये ॥ ४ ॥
उपवासमहोरात्रं व्रतकं चापि निश्चितम् ।
आदौ चान्ते च कुर्वीत व्रतस्यापि सिद्धये ॥ ५ ॥
व्रतके उद्देश्यसे उसकी सिद्धिके लिये आदि और अन्तमें
निश्चितरूपसे एक दिन और रातका उपवास करना चाहिये ॥
क्षुरकर्म ततो भर्तुरात्मनश्चैव कारयेत् ।
उत्सादनं च स्नानं च तस्मिन्नहनि संस्मृतम् ॥ ६ ॥
तदनन्तर अपने पतिकी हजामत बनवावे और अपना भी
नखमात्र कटा ले। उसी दिन व्रतान्त स्नान तथा व्रतके
उद्यापन या उत्सर्गका विधान है ॥ ६ ॥
ततो विवाहवत् स्नानं विहितं पुण्यके शुभे ।
मण्डनं चैव विहितं माल्यधारणमेव च ॥ ७ ॥
शुभे ! पुण्यक-व्रतमें भी विवाहके समान ही विधिपूर्वक
स्नान करनेकी आज्ञा है। उसमें शृङ्गार और माला धारण
करनेका विधान है ॥ ७ ॥
कुम्भैस्तु स्नाप्यमानेयं साध्वी मन्त्रमुदीरयेत् ।
भर्तुः पादौ नमस्कृत्य मनसा वाथ वा गिरा ॥ ८ ॥
घड़ोंके जलसे नहलायी जाती हुई व्रतपरायणा साध्वी
स्त्री अपने पतिके दोनों चरणोंको मन अथवा वाणीद्वारा
नमस्कार करके निम्नाङ्कित मन्त्रका उच्चारण करे—॥ ८ ॥

  • इन पंक्तियोंको देखकर यह अनुमान होता है कि पहले
    जिन ग्यारह सती स्त्रियोंका उनके पतियोंकी अनुमतिसे आवाहन
    किया जाता है, उनका व्रतचारिणी स्त्री पुनः उनके पतियोंको ही
    दान कर देती है। देश कालके अनुरूप निष्क्रय देकर पहले उन्हें
    अपनी बनाती है और फिर उनको उनके पतियोंको ही संकल्पपूर्वक
    सौंपकर दानजनित पुण्यकी भागिनी होती है।
    आपो देव्य ऋषीणां हि विश्वधात्र्यो
    दिव्या मदन्त्यो याः शङ्करा धर्मधात्र्यः।
    हिरण्यवर्णाः पावकाः शिवतमेन
    रसेन श्रेयसो मां जुषन्तु ॥९॥
    'जलकी अधिष्ठात्री देवी ऋषियोंकी जननी, सम्पूर्ण
    विश्वकी माता, आकाशसे प्रकट होनेवाली, हर्ष प्रदान करने-
    वाली, कल्याणकारिणी, धर्मके पोषणमें तत्पर, सुवर्णके समान
    वर्णवाली, निर्मल तथा सबको पावन बनानेवाली है। वह
    अपने परम कल्याणमय रसके द्वारा मुझे श्रेयका भागी बनाये'॥
    अपामेष स्मृतो मन्त्रः सर्वत्रान्यत्र मे शृणु ।
    मन्त्राः पुराणविहिताः स्त्रीणां सर्वाङ्गशोभने ॥ १० ॥
    सर्वाङ्गशोभने देवि ! यह जलसम्बन्धी मन्त्र सर्वत्र
    उपयोगमें लाया जाता है। अन्यत्र स्त्रियोंके स्नानके लिये
    पुराणविहित मन्त्र उपलब्ध होते हैं। उन्हें मुझसे सुनो ॥
    शुभाव्यया गुणिनी युक्तधर्मा
    भर्त्रा साकं मम दास्या वरेण ।
    मा कर्मणा मनसा वापि वाचा
    भर्तुर्भवेयं रूपती स्यां वशाङ्गा ॥ ११ ॥
    मैं पतिके लिये कल्याणकारिणी होऊँ। धन आदिसे
    कभी क्षीण न होऊँ। सद्गुणवती होऊँ। सदा पतिके साथ
    धर्ममें संलग्न रहूँ। मैं अपने स्वामीके साथ दासीके समान
    रहकर उनकी छोटी-से-छोटी भी सेवा-टहल स्वयं ही करूँ।
    सदा पतिके अधीन रहूँ और मन, वाणी तथा क्रियाद्वारा
    भी कभी उनसे रुष्ट न होऊँ ॥ ११ ॥
    सपत्नीनामधि नित्यं भवेयं
    सपुत्रा स्यां सुभगा चारुरूपा ।
    सम्पन्नहस्ता गुणवादिनी च
    सर्वात्मना स्यां मा दरिद्रा भवेयम्॥ १२॥
    सपत्नियोंमें मेरा स्थान सदा सबसे ऊपर हो। मैं पुत्रवती,
    सौभाग्यवती और मनोहर रूपवाली होऊँ। मेरा हाथ सदा सम्पन्न
    रहे अर्थात् मैं मुक्तहस्त होकर दान कर सकूँ। मैं सम्पूर्ण
    हृदयसे सदा दूसरोंके गुणोंका ही बखान करूँ और कभी
    दरिद्र न होऊँ ॥ १२ ॥
    पतिश्च मे स्यात् सुमुखो मत्प्रतीक्षो
    नित्यं मदुक्तः स्यान्मन्मतिर्मद्गतिश्च।
    प्रीतिश्च नौ स्याच्चक्रवाकानुरूपा
    मनोविरागो न भवेत् साधुवत् स्यात् ॥ १३॥
    मेरे पति भी सदा प्रसन्नमुख रहकर मेरी प्रतीक्षा करने-
    वाले हों, उनका सदा मुझमें अनुराग बना रहे। उनकी मति
    और गति मेरी ही ओर रहे। हम दोनोंमें चकवा और चकवी-
    के समान प्रेम बना रहे। हमारे मनमें कभी एक दूसरेके प्रति

५२८ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे

विरक्ति न हो और हमारा व्यवहार सदा श्रेष्ठ पुरुषोंके समान हो ॥ १३ ॥

लोकान् साध्वीनामुत्तमानां व्रजेयं याभिः सर्वं धार्यते विश्वरूपम् ।
उभे कुले याः शुभाः पावयन्ति पितुर्भर्तुश्च पतिभक्त्योर्जिताश्च ॥ १४ ॥

जो शुभलक्षणा देवियाँ पतिभक्तिके प्रभावसे शक्तिशालिनी होकर पिता और पति दोनोंके कुलोंको पावन बनाती हैं तथा जो अपने धर्मसे इस सम्पूर्ण विश्वको धारण करती हैं, उन्हीं उत्तम पतिव्रता देवियोंके लोकोंमें मैं जाऊँ ॥ १४ ॥

भूमिर्वायुर्जलमाकाशमग्नि- रन्तःक्षेत्रज्ञः प्रकृतिर्यो महांश्च ।
अहंकारश्च मम साक्ष्ये नियुक्ताः स्मरेयुर्मे निश्चयं च व्रतं च ॥ १५ ॥

पृथ्वी, वायु, जल, आकाश, अग्नि, अन्तर्यामी क्षेत्रज्ञ, प्रकृति, महत्तत्त्व और अहङ्कार—इन सबको मैंने अपना साक्षी बनाया है। ये मेरे इस निश्चय और व्रतको स्मरण रखें ॥

यैरारब्धो देहिनां भौतिकोऽयं विधिः सत्त्वाद्यैर्भूतयुक्तैः सबीजैः ।
सन्त्वेते मे साक्षिणः सर्वसंस्था व्रते चास्मिन् निश्चये चापि नित्यम् ॥ १६ ॥

जिन सत्त्व आदि गुणोंने भूतों और उनके कर्मबीजोंसे युक्त हो देहधारियोंके इस भौतिक शरीरका निर्माण किया है, वे और उनके अभिमानी देवता जो सबमें स्थित हैं, मेरे इस व्रत और निश्चयमें सदा साक्षी बने रहें ॥ १६ ॥

चन्द्रादित्यौ पुण्यसाक्षी यमश्च दिशः सर्वा दश चात्मा च मेऽयम् ।
सन्त्वेते वै साक्षिणः सर्वसंस्था व्रते चास्मिन् निश्चये चापि नित्यम् ॥ १७ ॥

चन्द्रमा, सूर्य, पुण्यके साक्षी यम, सम्पूर्ण दसों दिशाएँ और मेरा यह आत्मा—ये सबमें स्थित रहनेवाले देवता मेरे इस व्रत एवं निश्चयमें सदा साक्षी बने रहें ॥ १७ ॥

मन्त्रैरेतैः पुराणोक्तैः सर्वद्रव्याभिमन्त्रणम् ।
व्रतचर्यात् प्रभृति वै पुराणे समुदाहृतम् ॥ १८ ॥

व्रतके आरम्भसे लेकर प्रतिदिन इन पुराणोक्त मन्त्रोंद्वारा समस्त द्रव्योंको अभिमन्त्रित करना चाहिये। यह पुराणमें कहा गया है ॥ १८ ॥

स्नात्वाथ वाससी दद्याद् भर्तुः कर्त्य स्वयं शुभे ।
अथात्मकर्तितं न स्याच्छुभे विघ्नेन केनचित् ॥ १९ ॥
वासोऽन्यदेव दद्याच्च श्वेतं मुख्यं नवं शुचि ।
स्वकर्तितं च सूत्रं तु वाससा तेन मिश्रयेत् ॥ २० ॥

शुभे ! स्नान करके अपने पतिको स्वयं ही सूत कातकर बनाये हुए दो वस्त्र भेंट करे। यदि किसी विघ्न विशेषके कारण अपने ही काते हुए सूतका वस्त्र न हो तो दूसरा ही वस्त्र दे दे। वह वस्त्र शुद्ध, नवीन, उत्तम और श्वेत वर्णका होना चाहिये। उस वस्त्रके साथ अपना काता हुआ सूत भी मिला दे ॥ १९-२० ॥

ततो द्विजं शुचिं दान्तं ज्ञानविज्ञानकोविदम् ।
भोजयेच्च यथाशक्त्या सह भर्त्रा सुमध्यमे ॥ २१ ॥

सुमध्यमे ! तदनन्तर ज्ञान-विज्ञानकोविद, पवित्र, जितेन्द्रिय ब्राह्मणको अपने पतिके साथ बिठाकर यथाशक्ति भोजन कराये ॥ २१ ॥

ब्राह्मणस्यापि दातव्यं वासोयुग्मं महातपे ।
शय्यासनं गृहं धान्यं दासं दासीं तथैव च ॥ २२ ॥
अलंकारः शक्तिताश्च रत्नपर्वत एव च ।
सर्वधान्यसमुन्मिश्रस्तिलैश्च सविशेषतः ॥ २३ ॥
वासोभिश्च प्रतिच्छन्नो नानावर्णैररुन्धति ।
हस्त्यश्वावचयश्चैव देया गौरेव च ध्रुवम् ॥ २४ ॥

महान् तप करनेवाली देवि ! अरुन्धति ! ब्राह्मणको भी यथासम्भव जोड़ा वस्त्र, शय्या, आसन, गृह, धान्य, दास-दासी, आभूषण, सब प्रकारके धान्यों और विशेषतः तिलोंसे मिश्रित रत्नमय पर्वत, जो नाना रंगके वस्त्रोंसे आच्छादित हो, यथाशक्ति दान करना चाहिये। सम्भव हो तो हाथी-घोड़ोंका समूह दिया जाय अन्यथा एक गौका ही दान कर दिया जाय। यथाशक्ति दान देना आवश्यक है ॥ २२—२४ ॥

लवणप्रतिमां दद्यान्नवनीतस्य चापराम् ।
गुडस्य मधुनश्चैव सुवर्णस्य च शोभनाम् ॥ २५ ॥

नमक, माखन, गुड़, मधु और सुवर्णकी बनी हुई पृथक्-पृथक् उमा-महेश्वरकी सुन्दर प्रतिमाका भी दान करना चाहिये ॥ २५ ॥

तथैव सर्वगन्धानां रसानां पृथगेव च ।
तथा सुमनसां दद्याद् रौप्यस्यौदुम्बरस्य च ॥ २६ ॥
फलानां चैव सर्वेषां वाससामपि नन्दिनि ।
चित्रप्रतिकृतिं चैव काष्ठस्य प्रतिमां तथा ॥ २७ ॥

नन्दिनि ! उसी तरह सब प्रकारके सुगन्धित पदार्थों, रसों, फूलों, चाँदी, सम्पूर्ण फल, वस्त्र, चित्र और काष्ठकी प्रतिमाका भी यथासम्भव दान करना चाहिये ॥ २६-२७ ॥

शिलां प्रतिकृतिं चैव दध्नोऽथ पयसस्तथा ।
सर्पिषा दूर्वया चैव या चान्यामप्यभीप्सति ॥ २८ ॥

प्रस्तर, दूध, दही, घी और दूर्वाकी प्रतिमाको तथा और तरहकी प्रतिमाको भी, जिसे तुम देना चाहो, दे सकती हो ॥ २८ ॥

विष्णुपर्व ] एकोनाशीतितमोऽध्यायः ५२९
कालदेशानुरूपं च देयं विभवतः सति ।
अल्पं वा बहुलं वापि भर्तुश्छन्देन सर्वदा ॥ २९ ॥
पतिव्रते ! अगर घरमें वैभव हो तो स्वामीकी आज्ञाके
अनुसार सदा देश-कालके अनुरूप थोड़ा-बहुत दान अवश्य
देना चाहिये ॥ २९ ॥
तिलपात्रं प्रदातव्यं न देयं ननु शोभने ।
गौस्त्ववश्यं प्रदातव्या कपिला कांस्यमेव च ॥ ३० ॥
शोभने ! तिलसे भरा हुआ पात्र भी देना चाहिये;
परंतु स्वामीकी आज्ञाके बिना कोई वस्तु नहीं देनी चाहिये।
उनकी आज्ञा मिल जानेपर कपिला गौ तथा कांस्यपात्रका
दान अवश्य करना चाहिये ॥ ३० ॥
कृष्णाजिनं च सुभगे सतिलं वाससान्वितम् ।
आदर्शञ्चैव कूर्चञ्च तथाजिनमनिन्दिते ॥ ३१ ॥
एतद् दत्त्वा सर्वकामानाप्नोति वरवर्णिनि ।
पुरोऽधिका पुत्रवती सुभगा रूपभागिनी ॥ ३२ ॥
सृष्टहस्ता धनाढ्या च स्त्री भवत्यमलेक्षणा ।
इच्छया लभते चैव कन्या रूपगुणान्विताः ॥ ३३ ॥
भवन्ति सुभगाश्चार्यास्तथैव च पुरोऽधिकाः ।
पुत्रवत्यो धनाढ्याश्च शीलवत्यश्च नित्यदा ॥ ३४ ॥
सुभगे ! अनिन्दिते ! काला मृगचर्म, तिल, वस्त्र,
दर्पण, कुशासन और मृगचर्मका भी दान करना चाहिये।
वरवर्णिनि ! इन सब वस्तुओंका दान करके नारी सम्पूर्ण
कामनाओंको प्राप्त कर लेती है और नारियोंमें अग्रगण्य,
पुत्रवती, सौभाग्यवती, रूपवती, शुद्ध हाथवाली,
धनाढ्य तथा निर्मल नेत्रवाली होती है। वह
इच्छामात्रसे ऐसी कन्याएँ प्राप्त कर लेती है, जो
रूप-गुणसे सम्पन्न, सुभगा, आश्चर्ययुक्त गुणवाली,
अग्रगण्य, पुत्रवती, धनाढ्य तथा सदा सुशील होती हैं ॥
अरुन्धति कृतं ह्येतन्मयैव प्रथमं यतः ।
उमाव्रतकमित्येव ख्यातमत्र महीतले ॥ ३५ ॥
अरुन्धति ! मैंने ही पहले इस व्रतका आचरण किया है,
इसलिये इस पृथ्वीपर यह उमाव्रतके नामसे विख्यात होगा ॥
एतदेवोत्तमं स्त्रीणां व्रतं तस्मात् समाचरेत् ।
सर्वकामानवाप्नोति दत्त्वैवैतदनिन्दिते ॥ ३६ ॥
स्त्रियोंके लिये यही सबसे उत्तम व्रत है, अतः इसका
आचरण अवश्य करे। अनिन्दिते ! इस व्रतके लिये विहित
यह दान देकर नारी सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेती है ॥
एतद्व्रतकरो ह्येष देवदेवो वृषध्वजः ।
पुराभिषिक्तवान् सौम्ये प्रियार्थं मम सर्वकृत् ॥ ३७ ॥
सौम्ये ! इसी व्रतके पुण्यसे मैंने देवाधिदेव भगवान्
वृषध्वज शिवको खरीद-सा लिया है। उन सर्वस्रष्टा महादेव-
जीने मेरा प्रिय करनेके लिये पूर्वकालमें मुझे पट्टमहिषीके पद-
पर अभिषिक्त किया था ॥ ३७ ॥
व्रतकस्यावसानेऽथ देयं भोज्यं च नित्यदा ।
स्त्रीणां कामाः प्रदेयाश्च सदृशाः कालदेशयोः ॥ ३८ ॥
व्रतके अन्तमें सदा भोज्य-पदार्थोंका दान करना चाहिये।
स्त्रियोंकी अभीष्ट वस्तुओंका भी, जो देश-कालके अनुरूप हों,
दान करना उचित है ॥ ३८ ॥
एकैकस्य प्रदातव्यं व्रतकं वरवर्णिनि ।
छन्दतो ब्राह्मणानां तु देयमन्नं सदक्षिणम् ॥ ३९ ॥
वरवर्णिनि ! व्रतके जो उपकरण द्रव्य हैं, उनका बराबर
विभाग करके प्रत्येक ब्राह्मणको उसे देना चाहिये तथा
ब्राह्मणोंकी इच्छाके अनुसार उन्हें दक्षिणासहित अन्नका दान
करना चाहिये ॥ ३९ ॥
पायसं तत्र दातव्यं व्रतके नान्यदिष्यते ।
नात्र प्राणिवधः कार्यः पुराणे नियता श्रुतिः ॥ ४० ॥
उस व्रतमें खीरका दान करना चाहिये। दूसरा कोई
अन्न अभीष्ट नहीं है। इसमें प्राणियोंकी हिंसा कदापि नहीं
करनी चाहिये। यह पुराणमें निश्चितरूपसे कहा गया श्रुतिका
सिद्धान्त है ॥ ४० ॥
अथ द्वितीयं वक्ष्यामि व्रतं सोमसमुद्भवे ।
महादेवप्रसादेन दृष्टवत्यस्मि यच्छुभे ॥ ४१ ॥
चन्द्रकुमारी ! शुभे ! अब मैं दूसरे व्रतका वर्णन करूँगी,
जिसका महादेवजीकी कृपासे मैंने प्रत्यक्ष अनुभव किया है ॥
सर्वाः पुत्रफला नार्यः सद्भिरेतदुदाहृतम् ।
तस्मादन्विष्यती दद्यात् सपुत्रकरकाञ्छुभे ॥ ४२ ॥
शुभे ! सत्पुरुषोंका कथन है कि सारी स्त्रियाँ पुत्ररूप
फलवाली होती हैं अर्थात् पुत्रको जन्म देनेसे ही उनका नारीत्व
सफल होता है; अतः पुत्रकी इच्छा रखनेवाली स्त्री पुत्रार्थिनी
नारियोंद्वारा देनेयोग्य करकों (कमण्डलुओं) का दान करे ॥
ज्येष्ठाषाढौ शुभौ मासौ पुरोकं विधिमाचरेत् ।
अथवा ज्येष्ठमेवैकमाषाढं वा समाचरेत् ॥ ४३ ॥
पहले जो विधि बतलायी गयी है, उसका पुत्रार्थिनी स्त्री
ज्येष्ठ और आषाढ़ इन दो शुभ मासोंतक पालन करे अथवा
केवल ज्येष्ठ या आषाढ़ एक ही महीनेतक उसका आचरण
करे ॥ ४३ ॥
ततो मासद्वये पूर्णे मासे वा वरवर्णिनि ।
सपुत्रकरकान् दद्यात् फाणितप्रतिपूरितान् ॥ ४४ ॥
वरवर्णिनि ! फिर व्रतके दो मास अथवा एक ही मास
पूर्ण होनेपर पुत्रार्थिनी स्त्रियोंद्वारा देनेयोग्य करकों
(कमण्डलुओं) का दान करे। उन सबमें शीरे अथवा चीनी-
के शरबत भरे होने चाहिये ॥ ४४ ॥

५३० श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
सर्पिषः पयसश्चैव दध्नोऽथ मधुनोऽनघे ।
जलस्य च तथा दद्यात् पूरयित्वा शशिप्रभे ॥ ४५ ॥
चन्द्रमाके समान कान्तिवाली निष्पाप अरुन्धती ! घी,
दूध, दही तथा जलसे भी कमण्डलुओंको भरकर उनका
दान करे ॥ ४५ ॥
एकस्मै ज्ञानवृद्धाय सुव्रताय जितात्मने ।
सपुत्रकरकान् दद्याद् यावन्तो मनसः प्रियाः ॥ ४६ ॥
नारीको चाहिये कि वह उत्तम व्रतका पालन करनेवाले
तथा मनको वशमें रखनेवाले एक ही ज्ञानवृद्ध ब्राह्मणको
पुत्रार्थिनी स्त्रियोंद्वारा देनेयोग्य उतने कमण्डलु प्रदान करे;
जितने उसके मनको अभीष्ट हों ॥ ४६ ॥
इच्छेत स्त्री दुहितरं स्त्रीणां कामकरं ततः ।
किंचिद् द्रव्यं सुताकामात् सुतां प्राप्नोत्यसंशयः ॥ ४७ ॥
जो नारी पुत्री प्राप्त करना चाहती हो, वह पुत्रीकी
कामनासे ब्राह्मणी स्त्रियोंको कोई ऐसा द्रव्य दे, जो उनकी
इच्छा पूर्ण करनेवाला हो, ऐसा करनेसे उसे पुत्रीकी प्राप्ति
होती है। इसमें संशय नहीं है ॥ ४७ ॥
गौर्वाथ काञ्चनं वापि दक्षिणार्थं प्रशस्यते ।
विप्रस्याच्छादनं देयमवश्यं तु शुचिस्मिते ॥ ४८ ॥
दक्षिणाके लिये गौ अथवा सुवर्णको अच्छा बताया जाता
है। पवित्र मुसकानवाली देवि ! इस व्रतमें ब्राह्मणको ओढ़ने-
के लिये वस्त्र अवश्य देना चाहिये ॥ ४८ ॥
यज्ञोपवीतं व्रतके दद्यान्नारी शुचिव्रता ।
सपुत्रकरकाणां तु विधिरुक्तो विपश्चिता ॥ ४९ ॥
पवित्रतापूर्वक व्रतका पालन करनेवाली नारी व्रतमें
यज्ञोपवीतका दान करे। विद्वान् पुरुष इसमें पुत्रार्थिनी
स्त्रियोंके लिये नियत करवोंके दानका विधान बताते हैं ॥
अपत्याख्यानयोगेन ब्राह्मणेभ्यः शुचिव्रता ।
संवत्सरं सुसम्पूर्ण व्रतधर्मानुपालिनी ॥ ५० ॥
करकानपि दद्याच्च पूर्णे संवत्सरे शुभे ।
अनुज्ञया सदा भर्तुः सत्यवादिन्यरुन्धति ॥ ५१ ॥
सुवर्णसूत्रं विप्राय कौमुद्यां दातुमर्हति ।
यज्ञोपवीतं विप्रस्य व्रतं संस्थाप्य कामिकम् ॥ ५२ ॥
यज्ञोपवीतं करकं दक्षिणां च स्वशक्तितः ।
प्रयच्छती सती स्त्रीभ्यः सर्वान् कामान् समश्नुते ॥ ५३ ॥
शुभे ! व्रत-धर्मका निरन्तर पालन करनेवाली पवित्र
व्रतधारिणी स्त्री अपत्याख्यान योगसे अर्थात् पुँल्लिङ्ग संतान
(पुत्र) की कामना होनेपर पुँल्लिङ्ग नक्षत्र (पुष्य, हस्त
और श्रवण) के योगमें और स्त्रीलिङ्ग संतान (पुत्री) की
इच्छा होनेपर (रोहिणी आदि) स्त्रीलिङ्ग नक्षत्रके योगमें
पूरे सालभरतक सदा पतिकी आज्ञासे करकों (करवों) का
दान करे। सत्यवादिनी अरुन्धती ! वर्ष पूर्ण होनेपर कार्तिक-
की पूर्णिमाके दिन ब्राह्मणको सुवर्णसूत्र (यज्ञोपवीत) का
दान करना चाहिये। कामनापूर्वक किये जानेवाले इस व्रतको
समाप्त करके ब्राह्मणको यज्ञोपवीत, कमण्डलु और यथाशक्ति
दक्षिणा देनी चाहिये। जो सती-साध्वी ब्राह्मणी स्त्रियोंको
उनकी रुचिके अनुकूल वस्तुओंका दान करती है, वह सम्पूर्ण
कामनाओंको प्राप्त कर लेती है ॥ ५०-५३ ॥
नवं न भक्षयेत् किंचिन्नारी धान्यमथो फलम् ।
पुष्पाणि नोपयुञ्जीत यावद्देवं समाचरेत् ॥ ५४ ॥
नारी जबतक इस प्रकार व्रतका आचरण करे, तबतक
कोई नया अन्न अथवा फल न खाय और नये फूलोंका भी
उपयोग न करे ॥ ५४ ॥
एकभक्तेन धर्मज्ञे पुण्यकं कर्तुमर्हति ।
ब्राह्मणाय तथा देयं भर्तुश्च तदनन्तरम् ॥ ५५ ॥
धर्मज्ञे ! एक समय भोजन करके पुण्यक-व्रत करना
चाहिये तथा पहले ब्राह्मणको भोजन देना चाहिये, उसके बाद
पतिको ॥ ५५ ॥
एवं संवत्सरं कृत्वा सुभगा रूपशालिनी ।
भवत्यविधवा चैव स्त्री धनस्य तथेश्वरी ॥ ५६ ॥
एक वर्षतक ऐसा करके नारी सौभाग्यवती, रूप-सौन्दर्य-
शालिनी, अविधवा और धनकी स्वामिनी होती है ॥ ५६ ॥
वार्ताकानि न खादेद् या स्त्री पूर्णे परिवत्सरे ।
न सा पुत्रविनाशं हि पश्यतीत्यवगम्यताम् ॥ ५७ ॥
जो स्त्री पूरे एक वर्षतक बैगन नहीं खाती है, वह अपने
पुत्रका विनाश नहीं देखती है, यह निश्चित रूपसे जान लो ॥
शशकं मृगमांसं वा नित्यमेव विवर्जयेत् ।
नाप्नोति मरणं नारी प्राप्नोति पतिदेवताम् ॥ ५८ ॥
स्त्रीको चाहिये कि वह खरगोश, हिरन अथवा अन्य
प्राणियोंका मांस सदाके लिये त्याग दे। ऐसा करनेवाली स्त्री
(अकाल) मृत्यु या अल्पायुको नहीं प्राप्त होती और पातिव्रत्य
धर्मके पालनका फल पाती है ॥ ५८ ॥
अलाबुं वर्जयेन्नारी तथैवोत्पादिकामपि ।
कलम्बीं काञ्चनं नाद्याद् या भर्तुः सुखमिच्छति ॥ ५९ ॥
जो स्त्री पतिका सुख चाहती है, वह लौकी और पोईको
त्याग दे । सागका डंठल और गूलर भी न खाय ॥ ५९ ॥
पूर्णे संवत्सरे दद्यादेकैकं शाकमादृता ।
सदक्षिणं पुत्रवती 'भवत्येका पुरोऽधिका ॥ ६० ॥
इस प्रकार एक वर्ष पूर्ण होनेपर प्रत्येक शाकका दक्षिणा-
सहित आदरपूर्वक दान करे। ऐसा करनेवाली स्त्री एक
(सपत्नीरहित), पुत्रवती तथा अग्रगण्या होती है ॥ ६० ॥

[विष्णुपर्व ] अशीतितमोऽध्यायः ५३१


स्वयं प्रक्षालयाना स्त्री स्वपादावेवमादितः ।
प्रतिष्ठां लभते नित्यमुद्वेगं नाधिगच्छति ॥ ६१ ॥

जो इस प्रकार व्रतमे स्थित हो आरम्भसे ही अपने पैरोंको स्वयं ही धोती है, उसे सदा प्रतिष्ठा प्राप्त होती है और वह कभी उद्वेगमें नहीं पड़ती ॥ ६१ ॥

दिवा या सूर्यपूतेन वर्तयेत् स्त्री पतिव्रता ।
एकं संवत्सरं पूर्णं रात्रावन्नं विवर्जयेत् ॥ ६२ ॥
सा जीवपुत्रा सुभगा भवत्यमरवर्णिनि ।
अधितिष्ठति सर्वांश्च सपत्न्यो नात्र संशयः ॥ ६३ ॥

देवोपम कान्तिवाली देवि ! जो पतिव्रता नारी पूरे एक वर्षतक दिनमें सूर्यसे पवित्र हुए अन्नके द्वारा निर्वाह करती है और रातमें भोजन त्याग देती है, वह चिरंजीवी पुत्रोंसे युक्त और सौभाग्यशालिनी होती है तथा सारी सौतोंपर अधिकार रखती है; इसमें संशय नहीं है ॥ ६२-६३ ॥

पूर्णे संवत्सरे दद्यात् सौवर्णं सूर्यमुत्तमम् ।
ब्राह्मणायाभिरूपाय दरिद्राय यशस्विने ॥ ६४ ॥

एक वर्ष पूर्ण होनेपर वह रूपवान्, दरिद्र और यशस्वी ब्राह्मणको सूर्यकी सुवर्णमयी उत्तम प्रतिमाका दान करे ॥

फलानि वाथ पुष्पाणि भक्ष्याण्यपि च सुव्रता ।
दद्यादनस्तमितके चरितव्रतका तथा ॥ ६५ ॥

अथवा उस व्रतका आचरण करनेवाली वह सुव्रता नारी सूर्यके अस्त होनेसे पूर्व ही फल-फूल और भक्ष्य पदार्थोंका दान करे ॥ ६५ ॥

या तथास्तमिते सूर्ये भुङ्क्ते स्त्री नियता सती ।
चन्द्रनक्षत्रपूतानि भोज्यानि वरवर्णिनि ॥ ६६ ॥
सा दद्यात् काञ्चनं चन्द्रं नक्षत्राणि ग्रहानपि ।
अभिरूपाय विप्राय वासश्च लवणान्वितम् ॥ ६७ ॥

वरवर्णिनि ! जो सती स्त्री पूर्वोक्त रूपसे व्रत लेकर सूर्यास्त होनेपर ही चन्द्रमा और नक्षत्रोंसे पवित्र हुए भोज्य पदार्थोंका आहार करती है, वह वर्ष पूर्ण होनेपर सुयोग्य एवं रूपवान् ब्राह्मणको सुवर्णमय चन्द्र, नक्षत्र और ग्रहोंकी प्रतिमाका दान करे; साथ ही उत्तम लक्षणसे युक्त वस्त्र भी दे ॥

चन्द्रशीतलगात्री सा भवत्यमरवर्णिनि ।
सुभगा दर्शनीया च पुत्रवत्यपि भाविनी ॥ ६८ ॥

वह नारी चन्द्रमाके समान शीतल गात्रवाली, देवोपम कान्तिसे सुशोभित, सौभाग्यवती, दर्शनीया, पुत्रवती तथा पतिके प्रति अनुरक्त होती है ॥ ६८ ॥

पौर्णमास्यां तु सततं प्राप्ते सोमोदयेऽङ्गना ।
अर्घ्यं दद्यात् सुमनसां साक्षतं सकुशलं तथा ॥ ६९ ॥
यावकं च बलिं दद्याद् दध्ना च सह संयुक्तम् ।
एवं या कुरुते नित्यं सर्वान् कामानवाप्नुयात् ॥ ७० ॥

वह कल्याणमयी स्त्री सदा पूर्णिमाको चन्द्रोदय होनेपर अक्षत और कुशके साथ देवताओंको अर्घ्य प्रदान करे तथा दहीके साथ यावक (पूआ) का नैवेद्य अर्पण करे। जो स्त्री नित्य नियमपूर्वक ऐसा करती है, वह समस्त कामनाओंको प्राप्त कर लेती है ॥ ६९-७० ॥

अदृष्ट्वा या तु नाश्नाति सूर्यं नारी पतिव्रता ।
दुर्दिने वाथवा व्यभ्रे सेष्टान् कामानवाप्नुयात् ॥ ७१ ॥

जो पतिव्रता नारी आकाशमें मेघोंकी घटा छायी हो, अथवा बादलोंसे रहित स्वच्छ आकाश हो, सूर्यका दर्शन किये बिना भोजन नहीं करती है, वह अभीष्ट कामनाओंको प्राप्त कर लेती है ॥ ७१ ॥

काञ्चनं शक्तितो दद्यात् सा विप्राय मनस्विनी ।
सुभगा दर्शनीया च भवत्यमरवर्णिनि ॥ ७२ ॥

वह मनस्विनी सती अपनी शक्तिके अनुसार ब्राह्मणको सुवर्ण दान करे, ऐसा करके वह सौभाग्यवती, दर्शनीया और देवोपम कान्तिसे सुशोभित होती है ॥ ७२ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि पारिजातहरणे व्रतकथने एकोनाशीतितमोऽध्यायः ॥ ७९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें पारिजातहरणके प्रसङ्गमें व्रतकथनविषयक उन्यासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७९ ॥


अशीतितमोऽध्यायः

नाना प्रकारके व्रतोंका विधान

भगवत्युवाच
निर्वर्त्यञ्च शरीरं यैर्व्रतकैः पुण्यकैरपि ।
अरुन्धति प्रवक्ष्यामि सहैताभिर्दरेण तु ॥ १ ॥

भगवती उमा कहती हैं—अरुन्धती ! जिन व्रतों और पुण्योंके द्वारा इस शरीरको परम सुखकी प्राप्तिके योग्य बनाया जा सकता है, उन्हे इन तिथियो और श्रेष्ठ फलके साथ बताती हूँ, सुनों ॥ १ ॥

कृष्णाष्टम्यां या क्षिपति स्याद्वा मूलफलाशिनी ।
ब्राह्मणाग्र्यैकमशनं स्वं दत्त्वा भर्तृदेवता ॥ २ ॥
शुक्लवस्त्रा शुभाचारा गुरुदैवतपूजका ।

५३२श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

एवं संवत्सरं कृत्वा ततो दद्याद् द्विजातये ॥ ३ ॥
गोवालरज्जुसुकृतं चामरं च ध्वजं तथा ।
दक्षिणापूर्णमिष्टान्नं शक्त्या वापि शुचिस्मिते ॥ ४ ॥
ऊर्मिमन्तः खरालाग्राः श्रोणिदेशावलम्बिनः ।
तस्या भवन्ति केशास्तु भक्तिमत्या हि भर्तरि ॥ ५ ॥

पवित्र व्रतका पालन करनेवाली देवि ! जो पतिव्रता नारी कृष्णपक्षकी अष्टमी तिथिको अपना एक समयका भोजन ब्राह्मणको देकर स्वयं उपवासपूर्वक व्यतीत करती है अथवा उस दिन फल-मूल खाकर रहती है, श्वेत वस्त्र धारण करके सदाचारके पालनपूर्वक गुरुजनों तथा देवताओंकी पूजा करती है और इस प्रकार एक वर्षतक इसी नियमका पालन करके वह अन्तमें सुरही गायके बालकी रस्सीसे अच्छी तरह बनाया हुआ चँवर, ध्वज तथा दक्षिणासहित मिष्टान्न यथाशक्ति ब्राह्मणको देती है, उस पतिभक्ता नारीके केश कटि-प्रदेशके नीचे तक लटककर लहराया करते हैं और उनके अग्रभाग घुँघराले हो जाते हैं ॥ २–५ ॥

शिरो निर्वेष्टुकामा तु गोमयेन शिरः सती ।
प्रक्षालयेन्मलं धात्र्या विल्वेन श्रीफलेन च ॥ ६ ॥
गोमूत्रं च सदा प्राश्येच्छिरःस्नानं च मिश्रयेत् ।
कृष्णां चतुर्दशीं त्वेतत् कर्तव्यं वरवर्णिनि ॥ ७ ॥
भवत्यविधवा चैव सुभगा विज्वरा तथा ।
शिरोरोगैर्नच चास्याः शरीरमभितप्यते ॥ ८ ॥

वरवर्णिनि ! जो सिरको सुख पहुँचाना चाहती हो, वह सती-साध्वी स्त्री गोबर, आँवला, कच्चा बेल और श्रीफल (पका बेल)—इन सबको सम मात्रामें मिलाकर उसके द्वारा सिरको धोये । उसकी मैल दूर करे । सदा गोमूत्रका पान करे और सिरके ऊपरसे स्नान करते समय उस जलमें गोमूत्रको भी मिला ले । प्रत्येक कृष्णा चतुर्दशीको इस नियमका पालन करना चाहिये । ऐसा करनेवाली स्त्री विधवा नहीं होती; सौभाग्यवती बनी रहती है । उसे ज्वर आदि रोग नहीं सताते तथा उसके शरीरमें सिर-सम्बन्धी रोगोंसे कष्ट नहीं होता ॥ ६–८ ॥

दर्शनीयं ललाटं या काङ्क्षति स्त्री शुचिस्मिते ।
तिथिं प्रतिपदं नित्यं सा क्षिपेदेकभोजना ॥ ९ ॥
पयसा च तथाश्नीयाद् यावत्संवत्सरो गतः ।
ब्राह्मणाय ततो दद्यात् पटं रूप्यमयं शुभम् ॥ १० ॥
ललाटं रूपसम्पन्नमाप्नोति स्त्री सुमध्यमा ।

पवित्र मुसकानवाली अरुन्धती ! जो स्त्री अपने ललाटको दर्शनीय (शोभासे सम्पन्न) बनाये रखना चाहती है, वह प्रत्येक प्रतिपदा तिथिको एक समय भोजन करके बिताये एवं दूधके साथ भात खाकर रहे । जबतक एक वर्ष पूरा न हो, तबतक ऐसा करती रहे । तदनन्तर ब्राह्मणको सुन्दर सुवर्णमय पट^१ दान करे । ऐसा करनेवाली सुन्दर कटि-प्रदेशवाली स्त्री मनोहर रूप-सौन्दर्यसे युक्त ललाट पाती है ॥ ९-१०½ ॥

सततं स्त्री द्वितीयायां भ्रुवोरिच्छेत् सुरूपताम् ॥ ११ ॥
अनन्तरोपवासेन शाकभक्ताशना सती ।
ततः संवत्सरे पूर्णे ब्राह्मणं स्वस्ति वाचयेत् ॥ १२ ॥
फलैः परिणतैः सौम्यैर्माषाणां दक्षिणान्वितैः ।
लवणेन च भद्रं ते घृतपात्रेण चानघे ॥ १३ ॥

निष्पाप अरुन्धती ! तुम्हारा भला हो, जो भौंहोंका सौन्दर्य चाहती हो, वह सती-साध्वी स्त्री सदा द्वितीया तिथिको एक समय उपवास करके साग-भात खाकर रहे । इस तरह एक वर्ष पूर्ण होनेपर सुन्दर पके हुए फल, एक माशा सुवर्णकी दक्षिणा, नमक और घीसे भरा हुआ पात्र देकर ब्राह्मणसे स्वस्तिवाचन कराये ॥ ११–१३ ॥

आत्मनः शोभनौ कर्णाविच्छन्ती स्त्री सुमध्यमा ।
नक्षत्रे श्रवणे प्राप्ते ध्रुवं भुञ्जीत यावकम् ॥ १४ ॥
ततः संवत्सरे पूर्णे कर्णौ दद्याद्धिरण्मयौ ।
घृते प्रक्षिप्य विप्राय पयसा सहिते शुभे ॥ १५ ॥

जो सुन्दर कटिप्रदेशवाली स्त्री अपने कानोंको सुन्दर एवं शोभासम्पन्न बनाये रखना चाहती हो, वह श्रवण नक्षत्र प्राप्त होनेपर अवश्य यावक (जौके आटेका हलुवा या पूआ) भोजन करे । इस तरह एक वर्ष पूरा होनेपर दो सुवर्णमय कान बनवाकर उन्हें दुग्धमिश्रित घीमें रखकर ब्राह्मणको दान कर दे ॥ १४–१५ ॥

नासामिच्छेल्ललाटान्तामव्यङ्गां व्याधिवर्जिताम् ।
तिलगुल्मं सदा सिञ्चेद् यावत् पुष्येद्धि रक्षितः ॥ १६ ॥
अनन्तरोपवासेन सेकव्यः सलिलैः सदा ।
तस्मादवाप्य पुष्पाणि घृते प्रक्षिप्य दापयेत् ॥ १७ ॥

जो स्त्री यह चाहती हो कि मेरी नासिका ललाटसे संलग्न हो, उसमें किसी तरहकी विकृति न आये और वह सदा रोग-व्याधिसे रहित एवं सुन्दर बनी रहे तो वह सदा तिलके पौधोंको सींचे और तबतक सींचती रहे, जबतक कि उसके द्वारा सुरक्षित हुए उन पौधोंमें फूल तथा फल न लग जायँ । जिस दिनसे सींचना आरम्भ करे, उसके एक दिन पहले उपवास कर ले; फिर, निरन्तर जलसे सींचती रहे । जब उन पौधोंमें फूल लग जायँ तो उनसे फूल ले घीमें डालकर उस घीका दान कर दे ॥ १६–१७ ॥

स्लक्ष्णीभवेयमिति या स्त्री काङ्क्षत्यमृतोद्भवे ।
अनन्तरं वै भुञ्जाना पयसाथ घृतेन वा ॥ १८ ॥


^१. एक आभूषण, जिसे स्त्रियाँ अपने पट्टीकी तरह सिरमें बाँधती हैं।

विष्णुपर्व ] अशीतितमोऽध्यायः ५३३
ततः संवत्सरे पूर्णे पद्मपत्राणि मण्डिता ।
तथैवोत्पलपत्राणि न्यसेत् क्षीरे शुचिस्मिते ॥ १९ ॥
प्लवमानानि विप्राय ततो दद्यात् सती सति ।
कृष्णसारसमानाक्षी तद् दत्त्वा भवति स्म वै ॥ २० ॥
अमृतमय चन्द्रमासे उत्पन्न हुई अरुन्धती ! जो स्त्री यह
चाहती हो कि मेरे नेत्र सुन्दर हों, वह निरन्तर दूध अथवा
घीसे ही भोजन करे। पवित्र मुसकानवाली देवि ! इस तरह
एक वर्ष पूर्ण होनेपर वह वस्त्र और आभूषणोंसे विभूषित हो
कमल और कुमुदके पत्तोंको दूधमें डाले और जब वे उसमें
तैरने लगें, तब वह सती उन पत्तोंसहित उस दूधका ब्राह्मण-
को दान कर दे। पतिव्रते ! वह दान देकर नारी कृष्णसार
मृगके समान नेत्रवाली हो जाती है ॥ १८-२० ॥
इच्छेदोष्ठौ चारुरूपौ या स्त्री धर्मगुणान्विता ।
सा मृन्मयेन तु पिबेदुदकं वत्सरं सती ॥ २१ ॥
अयाचितेन भुञ्जीत नवम्यां धर्मभागिनी ।
ततः संवत्सरे पूर्णे विद्रुमं दातुमर्हति ॥ २२ ॥
जो धर्मरूपी गुणसे युक्त सती-साध्वी स्त्री यह चाहती हो
कि मेरे ओठ बड़े सुन्दर हों, वह एक वर्षतक मिट्टीके
बर्तनसे पानी पीये और धर्मकी भागिनी होकर प्रत्येक नवमी
तिथिको बिना माँगे मिले हुए अन्नका भोजन करे। इस
प्रकार एक वर्ष पूर्ण हो जानेपर उसे मूँगा दान करना
चाहिये ॥ २१-२२ ॥
तेन बिम्बफलाभोष्ठौ स्त्री भवत्येव शोभने ।
सुभगाथ वपुःपुत्रधनाढ्या गोमती तथा ॥ २३ ॥
शोभने ! ऐसा करनेसे उस स्त्रीके ओठ अवश्य ही
बिम्बफलके समान लाल हो जाते हैं तथा वह सौभाग्यवती,
रूपवती, पुत्रवती, धनाढ्य और गौओंसे युक्त होती है॥२३॥
या चारुरूपानिच्छेत दन्तानमरवर्णिनि ।
शुक्लाष्टमीं न साश्नीयाद् भक्तद्वयमनिन्दिता ॥ २४ ॥
अमरवर्णिनि ! जो चाहती हो कि मेरे दाँत बहुत ही
सुन्दर और स्वच्छ हों, वह साध्वी स्त्री शुक्ल पक्षकी अष्टमी
तिथिको दोनों समय भोजन त्याग दे ॥ २४ ॥
ततः संवत्सरे पूर्णे दद्याद् रौप्यमयान् सती ।
दन्तान् प्रक्षिप्य धर्मज्ञे पयस्यतिगुणोदिते ॥ २५ ॥
धर्मज्ञे ! इस तरह एक वर्ष पूर्ण होनेपर वह सती नारी
चाँदीके दाँत बनवाकर उन्हें अत्यन्त उत्तम गुणवाले दूधमें
डाल दे और दाँतोंसहित उस दुग्धका ब्राह्मणको दान कर
दे ॥ २५ ॥
तेन सा जातिपुष्पाभान् दन्तान् प्राप्नोति सा सती ।
सौभाग्यमपि चाप्नोति सपुत्रत्वं तथानघे ॥ २६ ॥
अनघे ! ऐसा करनेसे वह सती-साध्वी स्त्री चमेलीके
फूल-जैसे श्वेत दाँत पाती है और सौभाग्य तथा पुत्र लाभ
करती है ॥ २६ ॥
सर्वमेव मुखं कान्तमिच्छेद् या रुचिरानने ।
सा पूर्णमास्यां स्नात्वा तु प्राप्य चन्द्रोदये शुभे ॥२७॥
यावकं पयसा सिद्धं दत्त्वा विप्राय भामिनी ।
ततः संवत्सरे पूर्णे चन्द्रं रूप्यमयं शुभम् ॥ २८ ॥
पद्मे फुल्ले तु विन्यस्य ब्राह्मणान् स्वस्ति वाचयेत् ।
पूर्णचन्द्रमुखी तेन दानेन स्त्री शुभा भवेत् ॥ २९ ॥
रुचिरानने ! जो स्त्री सम्पूर्ण मुख-मण्डलको ही कमनीय
कान्तिसे युक्त देखना चाहे, वह भामिनी पूर्णिमाको स्नान
करके शुभ चन्द्रोदय होनेपर दूधमें तैयार किये गये यावकका
ब्राह्मणको दान दे। इस तरह एक वर्ष पूर्ण होनेपर सोने या
चाँदीकी चन्द्रमाकी सुन्दर प्रतिमा बनवाकर उसे कमलके
फूलपर रखे और ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराये और उसका
दान कर दे। वह शुभलक्षणा स्त्री उस दानके द्वारा पूर्ण
चन्द्रमाके समान मनोहर मुखवाली हो जाती है ॥२७-२९॥
स्तनाविच्छति या नारी तृणराजफलोपमौ ।
अयाचितं दशम्यां सा नित्यमश्नीत वाग्यता ॥ ३० ॥
संवत्सरे ततः पूर्णे द्वे बिल्वे काञ्चने शुभे ।
सदक्षिणे ब्राह्मणाय प्रयच्छति धृतात्मने ॥ ३१ ॥
सौभाग्यं परमाप्नोति बहुपुत्रांस्तथैव च ।
सदोन्नतौ स्तनौ सा स्त्री बिभर्त्यमरवर्णिनि ॥ ३२ ॥
जो नारी यह चाहती है कि मेरे दोनों स्तन ताड़के फलों-
के समान पीन हों, वह प्रत्येक दशमी तिथिको सदा मौन
रहकर बिना माँगे मिले हुए अन्नका भोजन करे। इस प्रकार
एक वर्ष पूर्ण होनेपर जो सोनेके बने हुए दो सुन्दर बेल
जितात्मा ब्राह्मणको दक्षिणासहित दानमें देती है, वह परम
सौभाग्य एवं बहुत-से पुत्र प्राप्त करती है। देवोपम कान्ति-
वाली देवि ! वह स्त्री सदा ऊँचे स्तन धारण करती है॥३०-३२॥
शातोदरत्वमिच्छन्ती क्षिपेदेकान्तभोजिनी ।
पञ्चम्यां तन्न भोक्तव्यमन्नं तोयेन नित्यदा ॥ ३३ ॥
जो कृशोदरी होना चाहती है (अर्थात् जिसकी यह
इच्छा है कि मेरा पेट उभड़ने या बढ़ने न पाये, भीतरको
दबा रहे), वह एकान्तमें भोजन करे और पञ्चमीको सदा
केवल जलसे अन्न ग्रहण करे ॥ ३३ ॥
ततः संवत्सरे पूर्णे दद्याज्जातिलतां शुभे ।
फुल्लां सदक्षिणां धन्ये ब्राह्मणाय धृतात्मने ॥ ३४ ॥
शुभे ! धन्ये ! इस तरह एक वर्ष पूर्ण होनेपर जितात्मा
ब्राह्मणको खिली हुई चमेलीकी लताका दक्षिणासहित दान
करे ॥ ३४ ॥
हस्ताविच्छति या नारी रूपयुक्तौ सुमध्यमे ।
द्वादशीं सा क्षिपत्वेवं शाकैः सर्वैरनिन्दितैः ॥ ३५ ॥

५३४ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
संवत्सरे ततः प्राप्ते रौक्मे पद्मे ददातु सा । मेरे पैरोंके गुल्फ ( घुट्टियाँ या गट्टे ) और नस-नाड़ियों ढकी
ब्राह्मणायाभिरूपाय तथा पद्मद्वयं शुभम् ॥ ३६ ॥ रहें, वह प्रत्येक षष्ठी तिथिको केवल पानीके साथ भात खाय ॥
सुमध्यमे ! जो नारी अपने दोनों हाथोंको सुन्दर रूपसे अग्निर्वा ब्राह्मणो वापि न स्प्रष्टव्यः पदा सदा ।
युक्त देखना चाहती है, वह द्वादशी तिथिको सब प्रकारके यदा पदा स्पृशेत् तं च वन्देत तपसान्विते ॥ ४४ ॥
अनिन्दित ( उत्तम ) शाकोंद्वारा आहार करके व्यतीत करे। तपस्विनि ! यह व्रत लेनेवाली स्त्रीको सदा ही उचित है
इस तरह एक वर्ष व्यतीत होनेपर वह सुवर्णमय कमलपर कि वह अग्नि अथवा ब्राह्मणका पैरसे स्पर्श न करे। यदि
दो खिले हुए कमलके फूल रखकर उन सबका सुन्दर एवं कभी स्पर्श हो जाय तो उसको प्रणाम करे ॥ ४४ ॥
सुयोग्य ब्राह्मणको दान करे ॥ ३५-३६ ॥ पादेन न च वै पादं प्रक्षालयितुमर्हति ।
श्रोणीं विशालामन्विच्छेत् स्त्री क्षिप्रत्वेव सुव्रते । एतैर्नित्यव्रतैर्युक्ता धर्मज्ञा पतिदेवता ॥ ४५ ॥
त्रयोदशीमेकभक्तमश्नात्वेवमयाचितम् ॥ ३७ ॥ कूर्मौ रूप्यमयौ दद्याद् ब्राह्मणाय पतिव्रते ।
उत्तम व्रतका पालन करनेवाली देवि ! जो नारी विशाल तौ वराय ब्राह्मणाय स्थापयित्वा घृतेऽनघे ॥ ४६ ॥
नितम्ब चाहती हो, वह त्रयोदशी तिथिको केवल एक बार पद्मे चाधोमुखे कृत्वा दद्याद् विप्राय नन्दिनि ।
अयाचित अन्न भोजन करे और इसी तरह प्रत्येक त्रयोदशी- रक्तैर्द्रव्यैर्मिश्रयित्वा काञ्चनेनाभ्यलंकृते ॥ ४७ ॥
को व्यतीत करे ॥ ३७ ॥ उसे पैरसे पैरको नहीं धोना ( रगड़ना ) चाहिये । इन
ततः संवत्सरे पूर्णे लवणं सम्प्रयच्छतु । नित्य व्रतोंसे युक्त हुई धर्मज्ञ पतिव्रता नारी सोने या चाँदीके
प्रजापतिमुखाकारं कृत्वा तत्र वरानने ॥ ३८ ॥ दो कछुए बनवावे । निष्पाप पतिव्रते ! फिर उन दोनों
वरानने ! इस तरह एक वर्ष पूर्ण होनेपर प्रजापति कछुओंको घीमें रखकर श्रेष्ठ ब्राह्मणको दान कर दे ।
ब्रह्माजीके मुखकी-सी आकृतिवाली नमककी राशिका दान नन्दिनि ! इसके सिवा दो कमलोंको उनके मुख नीचेकी
करे ॥ ३८ ॥ ओर करके रखे, उन्हें लाल रंगके गन्धादि द्रव्योंसे संयुक्त
काञ्चनं चैव दातव्यं तदाकारस्य सर्वदा । करके सुवर्णसे अलंकृत करे; तत्पश्चात् उसका ब्राह्मणको दान
अञ्जनेन च धर्मज्ञा शनकैरवचूर्णयेत् ॥ ३९ ॥ कर दे ॥ ४५-४७ ॥
इसी प्रकार प्रजापतिके मुखके आकारका ही सुवर्ण भी सर्वमेव तु या गात्रमिच्छत्यतिमनोहरम् ।
सदा दान करना चाहिये । धर्मज्ञ नारी धीरे-धीरे अञ्जनसे त्रिरात्रं पुष्पकाले सा करोतु पतिदेवता ॥ ४८ ॥
किसी ब्राह्मणीके नेत्रोंमें काजल लगावे ॥ ३९ ॥ जो पतिदेवता नारी अपने सम्पूर्ण शरीरको ही अत्यन्त
रत्नानि चैव पूर्णानि वासो रक्तं च दापयेत् । मनोहर बनाना चाहती हो, वह रजोदर्शनके अवसरपर तीन
तेन श्रोणीमभिमतां स्त्री सौम्ये प्रतिपद्यते ॥ ४० ॥ रात उपवास करे ॥ ४८ ॥
सौम्ये ! पूर्ण रत्न और लाल रंगका वस्त्र भी दे । इससे कौमुद्यामथवाषाढ्यां माघ्यां चाश्वयुजे तथा ।
वह स्त्री अपने मनके अनुकूल नितम्ब पाती है ॥ ४० ॥ मातरं पितरं चैव मन्यतेऽतिथिदैवतम् ॥ ४९ ॥
मधुरां वाचमिच्छन्ती वर्जयेल्लवणं सती । वह कार्तिक, आषाढ़, माघ तथा आश्विनकी पूर्णिमाको
संवत्सरं वा मासं वा प्रयच्छेल्लवणं ततः ॥ ४१ ॥ माता, पिता, अतिथि और देवताका आदर-सत्कार एवं
सदक्षिणं ब्राह्मणाय परं माधुर्यमिच्छती । पूजन करे ॥ ४९ ॥
शुकवाक्यारुच्छतगुणं भवत्यमरवर्णिनि ! ४२ ॥ घृतं च नित्यं विप्रेभ्यो ददातु लवणं तथा ।
मधुर वाणीकी इच्छा रखनेवाली सती नारी एक वर्ष या सम्मार्जनं गृहे चैव करोतु पतिदेवता ॥ ५० ॥
एक मासतक नमक खाना छोड़ दे और वाणीके अतिशय वह पतिव्रता ब्राह्मणोंको प्रतिदिन नमक और घी दान
माधुर्यकी इच्छा रखकर ब्राह्मणको दक्षिणासहित नमक दान करे । नित्य घरमें झाडू लगावे ॥ ५० ॥
करे । अमरवर्णिनि ! ऐसा करनेसे उसकी वाणीकी मिठास उपलेपनं च धर्मज्ञे बलिकर्म च मानिनि ।
तोतेकी वाणीसे सौ गुनी अधिक हो जाती है ॥ ४१-४२ ॥ वाग्दुष्टा चैव मा शुभ्रे भक्तवात्मार्थपण्डिता ॥ ५१ ॥
गूढगुल्फशिरौ पादाविच्छन्त्या सोमनन्दिनि । धर्मज्ञे ! मानिनि ! शुभ्रे ! अपने स्वार्थको समझनेमें
षष्ठ्यां षष्ठ्यां वरारोहे भोक्तव्यं सलिलौदनम् ॥ ४३ ॥ कुशल नारी घरमें लीपने-पोतने तथा देवताओंको बलि
सोमनन्दिनि ! वरारोहे ! जो स्त्री यह चाहती हो कि ( उपहार-सामग्री ) अर्पण करनेका कर्म भी करे। वह कभी
दुर्वचनका प्रयोग न करे ॥ ५१ ॥
पर्यश्नतु च सा कञ्चिदपि शाकं यशस्विनि ।

विष्णुपर्व ] एकाशीतितमोऽध्यायः ५३५

बलिं सृजत्वतथ्यं च परित्यजतु भामिनि ॥ ५२ ॥
यशस्विनि ! वह किसी एक शाकका ही भक्षण करे ।
भामिनि ! वह देवताओंके लिये उपहार दे और असत्य भाषणका त्याग करे ॥ ५२ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि पारिजातहरणे व्रतकविधानोऽशीतितमोऽध्यायः ॥ ८० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें पारिजातहरणके प्रसङ्गमें व्रतोंका विधानविषयक अस्सीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८० ॥


एकाशीतितमोऽध्यायः

उमाके द्वारा व्रतकथनका उपसंहार, श्रीनारदजीका देवियोंद्वारा किये गये व्रतोंका वर्णन करना तथा श्रीकृष्ण-पत्नियोंद्वारा व्रतका अनुष्ठान एवं दान

उमोवाच
बान्धवान् सगुणानिच्छेदेकभक्तेन नित्यदा ।
सप्तमीं सप्तमीं नित्यं क्षपेत् स्त्री पतिदेवता ॥ १ ॥
उमादेवी कहती हैं—जो पतिव्रता स्त्री गुणवान् बान्धवोंकी इच्छा रखती है, वह प्रत्येक सप्तमीको सदा एक समय भोजन करके व्यतीत करे ॥ १ ॥

ततः संवत्सरे पूर्णे वृक्षं दद्याद्धिरण्मयम् ।
सदक्षिणं ब्राह्मणाय शुभबन्धुमती भवेत् ॥ २ ॥
तत्पश्चात् वर्ष पूर्ण होनेपर ब्राह्मणको दक्षिणासहित एक सुवर्णमय वृक्षका दान करे । इससे वह शुभ गुणसम्पन्न बन्धु-बान्धवोंसे युक्त होती है ॥ २ ॥

करञ्जे दीपकं दद्यात् सदा या प्रमदा वरे ।
पूर्णे संवत्सरे दद्यात् सौवर्णं दीपकं ततः ॥ ३ ॥
जो नारी सदा उत्तम करंज (कंजा या करज) वृक्षके नीचे दीप दान करती है, उसे वर्ष पूर्ण होनेपर सुवर्णमय दीपकका दान करना चाहिये ॥ ३ ॥

रुच्या सा स्त्री भवेद् भर्तुरिष्टा पुत्रवती तथा ।
सपत्नीनामधि तथा दीपवज्ज्वलते शुभे ॥ ४ ॥
शुभे ! वह स्त्री अपनी सुन्दर कान्तिसे पतिकी प्राण-वल्लभा बन जाती है और पुत्रवती होती है। वह सपत्नियोंमें सबसे ऊँचा स्थान बना लेती है और दीपककी भाँति प्रकाशित होती रहती है ॥ ४ ॥

या शेषभोजिनी नित्यं नैव च स्यादरुन्तुदा ।
न च स्याद्व्यशना सौम्ये नित्यं च पतिदेवता ॥ ५ ॥
शौचान्विता च सततं न च रूक्षाभिभाषिणी ।
श्वश्रूश्वशुरयोर्नित्यं शुश्रूषाभिरता सती ॥ ६ ॥
किं तस्या व्रतकैः कार्यं किं वा स्यादुपवासकैः ।
या भर्तृदेवता नित्यं सत्यधर्मगुणान्विता ॥ ७ ॥
सौम्ये ! जो स्त्री प्रतिदिन सबके भोजनके पश्चात् शेष अन्नका आहार करती है, किसीके हृदयको चोट नहीं पहुँचाती, बिना खाये नहीं रहती और सदा पातिव्रत्यमें स्थित रहती है; सदा शौचाचारका पालन करती है, कभी रूखी बात नहीं बोलती, प्रतिदिन सास-ससुरकी सेवामें तत्पर रहती है, उस सती स्त्रीको व्रतोंसे क्या करना है ? अथवा उपवासोंसे क्या प्रयोजन है ? जो सदा पतिको ही देवताकी भाँति पूजती है और सत्यधर्म तथा सद्गुणोंसे सम्पन्न है (उसका जीवन सफल है) ॥ ५-७ ॥

विधवा स्त्री तु या हि स्याद् दैवयोगात् सती सति ।
तस्या वक्ष्यामि यो धर्मः पुराणोक्तः सुमध्यमे ॥ ८ ॥
सुन्दर कटिप्रदेशवाली पतिव्रते ! जो सती-साध्वी नारी कभी दैवयोगसे विधवा हो जाय, उसके लिये पुराणोंमें जो धर्म बताया गया है, उसका वर्णन करती हूँ ॥ ८ ॥

पतिं संकल्पयित्वा सा चित्रस्थं वाथ मृन्मयम् ।
तस्य पूजां सदा कुर्यात् सतां धर्ममनुस्मरेत् ॥ ९ ॥
वह पतिके चित्रमें अथवा उसकी मिट्टीकी प्रतिमामें पतिकी भावना करके सदा उसीकी पूजा करे और सत्पुरुषोंके धर्मका निरन्तर स्मरण रखे ॥ ९ ॥

तत एवाभ्यनुज्ञां सा नित्यं याचेत सुव्रता ।
व्रतके चोपवासे च भोजने च विशेषतः ॥ १० ॥
उत्तम व्रतका पालन करनेवाली वह स्त्री प्रतिदिन उसी (चित्रगत या प्रतिमागत) पतिसे व्रत, उपवास और विशेषतः भोजनके लिये आज्ञा माँगे ॥ १० ॥

भर्तृलोकान् व्रजत्येव न चेद् व्युच्चरते पतिम् ।
शाण्डिली सूर्यवद् भाति सततं पतिदेवता ॥ ११ ॥
यदि वह अपने पतिका उल्लङ्घन नहीं करती तो पति-लोकमें ही जाती है और स्वर्गमें पतिव्रता शाण्डिलीकी भाँति सदा सूर्यके समान प्रकाशित होती रहती है ॥ ११ ॥

अद्यप्रभृति सर्वेषां देवानां चैव योषितः ।
द्रक्ष्यन्ति पुण्यकविधिं पौराणो यः सनातनः ॥ १२ ॥

५३६ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे

आजसे समस्त देवताओंकी पत्नियाँ जो पुराणप्रतिपादित सनातन पुण्यकविधि है, उसका दर्शन करेंगी ॥ १२ ॥
मुनिश्च नारदः कृत्स्नं पौराणं ज्ञास्यते विधिम् ।
उपवासस्य धर्मात्मा व्रतकानां तथैव च ॥ १३ ॥
धर्मात्मा नारद मुनि भी व्रत-उपवासकी सम्पूर्ण पौराणिक विधिके ज्ञाता होंगे ॥ १३ ॥
अदितिस्तपसेन्द्राणी त्वं च सोमसुते वरे ।
प्रवर्तने पुण्यकानां व्रतकानां च सर्वदा ॥ १४ ॥
कीर्तनीयाः सतीनां हि भविष्यथ गुणान्विताः ।
श्रेष्ठ सोमकुमारी ! अदिति देवी, इन्द्राणी और तुम भी अपनी तपस्यासे उस विधिको जानोगी । पुण्यों और व्रतोंके प्रवर्तन (आरम्भ) में सदा तुम सद्गुणवती देवियोंका सती नारियोंद्वारा कीर्तन होगा ॥ १४ १/२ ॥
उपवासव्रतविधिं यथावदिह कृत्स्नशः ॥ १५ ॥
प्रादुर्भावेषु सर्वेषु भार्या विष्णोर्महात्मनः ।
ज्ञास्यन्ति पुण्यकविधिं नित्यमेव सनातनम् ॥ १६ ॥
महात्मा विष्णुके सभी अवतारोंमें जो उनकी पत्नियाँ होंगी, वे उपवास-व्रत एवं पुण्यकोंकी सम्पूर्ण सनातन विधिको यहाँ सदा ही यथावत् रूपसे जानेंगी ॥ १५-१६ ॥
सविशेषं च धर्माणां स्त्रीधर्मेषु प्रशस्यते ।
पतिभक्तिरदुष्टत्वमवाग्दुष्टत्वमेव च ॥ १७ ॥
सभी धर्मों अथवा स्त्रीधर्मोंमें पतिभक्ति, दुराचारका अभाव और दुर्वचनका प्रयोग न करना—इन तीनकी विशेष-रूपसे प्रशंसा की जाती है ॥ १७ ॥

नारद उवाच
एवमुक्तास्तु ताः साध्व्यो महादेव्या तपोधनाः ।
जग्मुर्हृष्टा महादेवीं प्रणिपत्य हरप्रियाम् ॥ १८ ॥
नारदजी कहते हैं—देवि ! महादेवी पार्वतीके ऐसा कहनेपर वे साध्वी तपोधना देवियाँ हर्षमें भरकर उन हरप्रिया पार्वतीको प्रणाम करके अपने-अपने स्थानको चली गयीं ॥
अदितिर्व्रतकं चक्रे शृणु यद् धर्मचारिणी ।
उमाव्रतविधिः सर्वः पूर्वोद्दिष्टस्तया कृतः ॥ १९ ॥
धर्मचारिणी अदितिने जो व्रत किया, उसे सुनो—उमाने पहले जो व्रतकी विधि बतायी थी, उस सबका पालन अदिति देवीने किया ॥ १९ ॥
पारिजाते निवध्न्याथ मम दत्तस्तु कश्यपः ।
अदितिव्रतकं नाम तद् दत्तं सत्यभामया ॥ २० ॥
उन्होंने महर्षि कश्यपको पारिजातमें बाँधकर मेरे हाथमें दे दिया । इसीका नाम 'अदितिव्रतक' है । अदितिने जिस तरह व्रतक (व्रतसम्बन्धी दान) दिया था, उसी प्रकार सत्यभामाने भी दिया ॥ २० ॥

तदेव व्रतकं दत्तं सावित्र्या धर्मनित्यया ।
तैरैव युक्तैः संयुक्तमिदं त्वभ्यधिकं कृतम् ॥ २१ ॥
नित्य धर्मपरायणा सावित्रीने भी वही व्रत किया और उसी तरह दान दिया था । उन्हीं समुचित साधनोंसे संयुक्त होनेके कारण यह संध्याकाल अत्यन्त उत्कृष्ट माना गया है ॥
संध्याकाले तु सम्प्राप्ते स्थाने स्थाने तथैव च ।
पूजनं वा नमस्कारो जपेश्च द्विगुणः स्मृतः ॥ २२ ॥
संध्याकाल आनेपर जगह-जगह किया गया पूजन, नमस्कार और जप द्विगुण माना गया है ॥ २२ ॥
सावित्रीव्रतकं कृत्वा तथादित्या व्रतं सती ।
भर्तुः कुलं पितृकुलमात्मानं चैव तारयेत् ॥ २३ ॥
सती नारी सावित्री-व्रत और अदिति व्रतका अनुष्ठान करके पतिकुल, पितृकुल तथा अपने-आपको भी उद्धार कर देती है ॥ २३ ॥
इन्द्राणी व्रतकं चक्रे तदेवौमं यथाविधि ।
रक्तमभ्यधिकं वासो भोजनं चैव सामिषम् ॥ २४ ॥
इन्द्राणीने भी उसी उमाके बताये हुए व्रतका विधि-पूर्वक पालन किया । उनमें अधिक या विशेष बात इतनी ही थी कि उन्होंने लाल रंगका वस्त्र और योग्य पदार्थोंसे युक्त उत्तम भोजन दिया ॥ २४ ॥
चतुर्थे दिवसे वापि पुण्यकार्थे विधिः पुनः ।
अहोरात्रोपवासश्च देयं कुम्भशतं तथा ॥ २५ ॥
चौथे दिन फिर पुण्यकव्रतके लिये दानकी विधि है। एक दिन-रातका उपवास करके सौ घड़ोंका दान करना चाहिये॥
गङ्गाया व्रतकं दत्तं तदेवौमं यशस्करि ।
स्नानमभ्यधिकं त्वात्र प्रत्युषस्यात्मनो जले ॥ २६ ॥
अन्यस्मिन् वा जले माघशुक्लपक्षे हरिप्रिये ।
एतद् गङ्गाव्रतं नाम सर्वकामप्रदं स्मृतम् ॥ २७ ॥
यशका विस्तार करनेवाली हरिप्रिये रुक्मिणी ! गङ्गाजीने भी उसी उमाके बताये हुए व्रतका अनुष्ठान और दान किया। उसमें अधिक बात इतनी ही थी कि वे प्रतिदिन प्रातःकाल माघ शुक्ल पक्षमें अपने ही जलमें अथवा दूसरे जलमें भी स्नान किया करती थीं । यह गङ्गा-व्रत समस्त मनोवाञ्छित कामनाओंको देनेवाला माना गया है ॥ २६-२७ ॥
सप्त सप्त च सप्तार्थ कुलानि हरिवल्लभे ।
स्त्री तारयति धर्मज्ञा गङ्गाव्रतकचारिणी ॥ २८ ॥
हरिवल्लभे ! गङ्गा-व्रतका पालन करनेवाली धर्मज्ञ नारी पितृकुल, मातामहकुल और पतिकुलकी सात-सात पीढ़ियोंका उद्धार कर देती है ॥ २८ ॥
देयं कुम्भसहस्रं तु गङ्गाया व्रतके शुभे ।
तत्क्षणं पारणं चैव तद् व्रतं सार्वकामिकम् ॥ २९ ॥

[विष्णुपर्व ] एकाशीतितमोऽध्यायः ५३७


शुभे ! गङ्गाव्रतमें एक सहस्र घड़ोंका दान करना चाहिये। वह समस्त कामनाओंका पूरक व्रत दुःखसे तारने और मनोरथोंकी पूर्ति करनेवाला है ॥ २९ ॥
यमभार्या चकाराथ व्रतं यामरथं शुभम् ।
हेमन्ते तत् तु कर्तव्यमाकाशे हरिवल्लभे ॥ ३० ॥
हरिवल्लभे ! यमराजकी पत्नीने यामरथ नामक शुभ व्रतका अनुष्ठान किया था। वह व्रत हेमन्त ऋतुमें खुले आकाशके नीचे करना चाहिये ॥ ३० ॥
इमानि चैव वाक्यानि ब्रूयादाकाशमास्थिता ।
स्नात्वा शुचिसमाचारा नमस्कृत्य पतिं शुभे ॥ ३१ ॥
शुभे ! पवित्र आचरणवाली स्त्री स्नानके पश्चात् पतिको नमस्कार करके खुले मैदानमें खड़ी ये निम्नाङ्कित वाक्य कहे—॥
चराम्यहं यामरथं हिमं पृष्ठेन धारये ।
पतिव्रता जीवपुत्रा भवेयं च पुरोऽधिका ॥ ३२ ॥
‘मैं अपनी पीठपर हिम (बर्फ या पाला) का आघात सहती हुई यामरथ व्रतका आचरण कर रही हूँ। मेरी यह कामना है कि मैं पतिव्रता, चिरंजीवी पुत्रोंकी माता और नारियोंमें अग्रगण्या होऊँ ॥ ३२ ॥
सपत्नीरधितिष्ठेयं पश्येयं चैव मा यमम् ।
सभर्तृपुत्रा जीवेयं चिरं च सुखमेव च ॥ ३३ ॥
‘सौतोंपर मेरा प्रभुत्व स्थापित हो, मैं कभी यमका दर्शन न करूँ और अपने पति एवं पुत्रोंके साथ चिरकालतक सुखपूर्वक जीवित रहूँ ॥ ३३ ॥
पतिलोकं च गच्छेयं भवेयं नन्दिनी तथा ।
सुचैला सृष्टहस्ता च स्वजनेष्टा गुणान्विता ॥ ३४ ॥
‘अन्तमें पतिलोकको प्राप्त होऊँ, अपने कुल-परिवारका आनन्द बढ़ानेवाली होऊँ। मेरे वस्त्र स्वच्छ रहें, मेरा हाथ शुद्ध हो, मैं स्वजनोंकी प्यारी एवं सद्गुणवती होऊँ’ ॥ ३४ ॥
एवं कृत्वा ततो विप्रं मधुना स्वस्ति वाचयेत् ।
तिलैरपि तथा कृष्णैः पायसेन तु भोजयेत् ॥ ३५ ॥
इस प्रकार व्रतको पूर्ण करके ब्राह्मणसे स्वस्तिवाचन कराये तथा उसे मधु और काला तिलसे मिश्रित खीर खिलाये ॥
एवं व्रतानि देवीभिः कृतान्यमरवर्णिनि ।
महादेव्या पुरोक्तानि रुद्रपत्नया हरिप्रिये ॥ ३६ ॥
देवोपम कान्तिवाली देवि ! हरिप्रिये ! इस प्रकार रुद्र-पत्नी महादेवी उमाद्वारा पूर्वकालमें बताये गये व्रतोंका अनुष्ठान पहलेकी देवियोंने किया है ॥ ३६ ॥
अहं ब्रवीमि तपसा मदीयेन समन्विताः ।
सर्वा द्रक्ष्यथ गुह्यानि व्रतकानि तथैव च ॥ ३७ ॥
पौराणान्युमया देव्या यानि दृष्टानि वै पुरा ।
कल्याणगुणयुक्तानि पावनानि शुभानि च ॥ ३८ ॥
मैं कहता हूँ, देवियो ! प्राचीन कालमें देवी उमाने जिन कल्याणमय गुणोंसे युक्त, पावन, गुणकारक एवं शुभ पुरातन व्रतोंका साक्षात्कार किया था, उन सबको तुम सब लोग मेरे तपोबलसे सम्पन्न होकर देखोगी ॥ ३७-३८ ॥

वैशम्पायन उवाच
रुक्मिणी व्रतकं चक्रे दृष्ट्वा व्रतकविस्तरम् ।
उमाया वरदानेन दृष्ट्वा दिव्येन चक्षुषा ॥ ३९ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन् ! रुक्मिणीने उमाके वरदानके अनुसार दिव्यदृष्टिसे व्रतोंका विस्तार देखकर स्वयं भी एक ‘व्रत’ का अनुष्ठान किया ॥ ३९ ॥
उमाव्रतकवत् सर्वं वृषदानं तथाधिकम् ।
रत्नमालाप्रदानं च तथान्नं सार्वकामिकम् ॥ ४० ॥
उन्होंने सब कुछ उमाके व्रतके ही समान किया, किंतु वृषभदान, रत्नमाला-दान और सम्पूर्ण कामनाओंका पूरक अन्नदान—उनसे अधिक किया ॥ ४० ॥
तथा जाम्बवती चक्रे पुरोमाव्रतकं तथा ।
ददावभ्यधिकं सा तु रत्नवृक्षं मनोहरम् ॥ ४१ ॥
जाम्बवतीने भी वैसा ही किया, जैसा पहले उमाने किया था; किंतु उन्होंने मनोहर रत्नमय वृक्षका दान उनकी अपेक्षा अधिक किया ॥ ४१ ॥
सत्या ददौ तथैवाथ पुरोमाव्रतकं तथा ।
पीतमभ्यधिकं वासस्तया दत्तमुमात्रते ॥ ४२ ॥
सत्याने भी पूर्वकालमे उमाद्वारा किये गये व्रतकके समान ही दान किया; परंतु उस उमाव्रतमें उन्होंने पीतवस्त्रका दान अधिक किया ॥ ४२ ॥
रोहिण्याथ च फाल्गुन्या मघया च पुरातने ।
व्रतानि खलु दत्तानि बहूनि कुलवर्धन ॥४३ ॥
कुलकी वृद्धि करनेवाले नरेश ! पुरातन कालमें रोहिणी, फाल्गुनी और मघाने भी बहुत-से व्रत-दान किये थे ॥ ४३ ॥
ददौ शतभिषा चैव व्रतकं पुण्यलक्षणम् ।
येन नक्षत्रमुख्यत्वं जगाम कुरुनन्दन ॥ ४४ ॥
कुरुनन्दन ! शतभिषाने भी पुण्यको लक्षित करानेवाले व्रतकका दान किया था, जिससे उसने नक्षत्रोंमे मुख्यता प्राप्त कर ली ॥ ४४ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि पारिजातहरणे उमाव्रतकथनसमाप्तौ
पारिजातहरणकथनसमाप्तौ चैकाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें पारिजातहरणके प्रसंगमें उमा-व्रतकथन-समाप्तिविषयक इक्यासीवाँ* अध्याय पूरा हुआ ॥ ८१ ॥


* कुछ लोग यहाँ हरिवंश ग्रन्थके पूर्वार्ध भागकी समाप्ति मानते हैं और आगेके ग्रन्थको उत्तरार्धके अन्तर्गत बताते हैं ।

५३८ | श्रीमद्भारते खिलभागे | [ हरिवंशे

द्व्यशीतितमोऽध्यायः*

षट्पुरवासी असुरोंका संक्षिप्त परिचय, उन्हें ब्रह्मा और भगवान् शिवका वरदान

जनमेजय उवाच

वैशम्पायन धर्मज्ञ व्यासशिष्य तपोधन।
पारिजातस्य हरणे षट्पुरं परिकीर्तितम्॥ १॥

जनमेजयने कहा—धर्मज्ञ! व्यासशिष्य! तपोधन! वैशम्पायनजी! आपने पारिजातहरणके प्रसंगमें ‘षट्पुर’ की चर्चा की थी॥ १॥

निवासोऽसुरमुख्यानां दारुणानां तपोधन।
तेषां वधं मुनिश्रेष्ठ कीर्तयस्वान्धकस्य च॥ २॥

तपोधन! आपने कहा था कि वह नगर बड़े-बड़े भयंकर असुरोंका स्थान था। मुनिश्रेष्ठ! आप उन षट्पुरनिवासी दैत्यों तथा अन्धकासुरके वधका वर्णन कीजिये॥ २॥

वैशम्पायन उवाच

त्रिपुरे निहते वीर रुद्रेणाक्लिष्टकर्मणा।
तत्र प्रधाना बहवो बभूवुरसुरोत्तमाः॥ ३॥
शराग्निना न दग्धास्ते रुद्रेण त्रिपुरालयाः।
षष्टिः शतसहस्राणि न न्यूनान्यधिकानि च॥ ४॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! वीर! अनायास ही समस्त कर्म करनेवाले रुद्रदेवके द्वारा जब दैत्योंके तीनों पुरोंका विनाश किया गया, उस समय वहाँ बहुत-से प्रधान-प्रधान असुर-शिरोमणि शेष रह गये। वे त्रिपुरनिवासी होनेपर भी रुद्रदेवके बाणोंकी आगसे दग्ध न हो सके। उनकी संख्या लगभग साठ लाख थी॥ ३-४॥

ते ज्ञातिवधसंतप्ताश्चक्रुर्वीराः पुरा तपः।
जम्बूमार्गे सतामिष्टे महर्षिगणसेविते॥ ५॥

उन असुर वीरोंने पूर्वकालमें अपने बन्धु-बान्धवोंके वधसे संतप्त होकर महर्षिगणोंसे सेवित तथा सत्पुरुषोंके प्रिय जम्बूमार्गमें जाकर तपस्या आरम्भ की॥ ५॥

आदित्याभिमुखा वीराः सहस्राणां शतं समाः।
वायुभक्षा नृपश्रेष्ठ स्तुवन्तः पद्मसम्भवम्॥ ६॥

नृपश्रेष्ठ! वे वीर दैत्य सूर्यकी ओर मुँह करके वायुके आहारपर रहकर एक लाख वर्षोंतक कमलयोनि ब्रह्माजीकी स्तुति करते रहे॥ ६॥

तेषामुदुम्बरं राजन् गण एकः समाश्रितः।
वृक्षं तत्रावसन् वीरास्ते कुर्वन्तो महत् तपः॥ ७॥

राजन्! उन दैत्योंमें एक दल ऐसा था, जो गूलरके वृक्षका आश्रय लेकर रहता था। वे वीर दैत्य वहाँ महान् तप करते हुए निवास करते थे॥ ७॥

कपित्थवृक्षमाश्रित्य केचित् तत्रोपिताः पुरा।
सृगालवाटीस्त्वपरे चेरुरुग्रं तथा तपः॥ ८॥

पूर्वकालमें उन दैत्योंमेंसे कुछ लोग कपित्थ (कैथ) वृक्षका आश्रय लेकर वहाँ रहते थे और दूसरे सियारोंकी माँदोंमें रहकर वहाँ उग्र तपस्या करते थे (अथवा सृगालनामक वृक्ष-विशेषकी वाटिकाओंमें रहकर तपस्या करते थे)॥ ८॥

वटमूले तथा चेरुस्तपः कौरवनन्दन।
अधीयन्तो परं ब्रह्म वटं गत्वासुरात्मजाः॥ ९॥

कौरवनन्दन! कुछ असुरकुमार वट-वृक्षकी जड़में रहते और उस वृक्षपर चढ़कर परब्रह्मका चिन्तन करते हुए तपस्या करते थे॥ ९॥

तेषां तुष्टः प्रजाकर्ता नरदेव पितामहः।
वरं दातुं सुरश्रेष्ठः प्राप्तो धर्मभृतां वरः॥ १०॥

नरदेव! कुछ कालके अनन्तर धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ प्रजास्रष्टा देवशिरोमणि पितामह ब्रह्माजी उनपर संतुष्ट हो उन्हें वर देनेके लिये वहाँ आये॥ १०॥

वरं वरयतेत्युक्तास्ते राजन् पद्मयोनिना।
नेषुस्तद्वरदानं तु द्विषन्तस्त्र्यम्बकं विभुम्॥ ११॥

राजन्! कमलयोनि ब्रह्माने उनसे कहा—'वर माँगो'। तब उन्होंने भगवान् त्रिनेत्रधारी रुद्रसे द्वेष रखनेके कारण वरदान लेनेकी इच्छा नहीं की॥ ११॥

इच्छन्तोऽपचितिं गन्तुं ज्ञातीनां कुरुनन्दन।
तानुवाच ततो ब्रह्मा सर्वज्ञः कुरुनन्दन॥ १२॥

कुरुकुलको आनन्द प्रदान करनेवाले कुरुनन्दन! वे रुद्रदेवसे बदला लेकर उनके द्वारा मारे गये अपने भाई-बन्धुओंके ऋणसे उऋण होना चाहते थे। तब सर्वज्ञ ब्रह्माजीने उनसे कहा—॥ १२॥

विश्वस्य जगतः कर्तुः संहर्तुश्च महात्मनः।
कः शक्तोऽपचितिं गन्तुं मास्तु वोऽत्र वृथा श्रमः॥ १३॥

जो सम्पूर्ण जगत्‌के कर्ता और संहर्ता हैं, उन महात्मा भगवान् शङ्करसे बदला लेनेमें कौन समर्थ है? इस विषयमें तुम्हें व्यर्थ श्रम नहीं उठाना चाहिये॥ १३॥

अनादिमध्यनिधनः सोमो देवो महेश्वरः।
तमासूय सुखं स्वर्गे वस्तुमिच्छन्ति येऽसुराः॥ १४॥


* पूनावाली प्रतिकी मान्यताके अनुसार यहाँसे हरिवंशका उत्तरार्ध भाग आरम्भ होता है।

विष्णुपर्व ] द्व्यशीतितमोऽध्यायः ५३९

ते नेषुस्तत्र केचित् तु दुरात्मानो महासुराः।
अथेषुरपरे राजन्नसुरा भव्यभावनाः॥ १५॥
उमासहित महेश्वर देव आदि, मध्य और अन्तसे रहित हैं। उनसे द्रोह रखकर जो असुर स्वर्गमें सुखपूर्वक रहना चाहते थे, उन दुरात्मा महान् असुरोंने तो वर लेनेकी इच्छा नहीं की; परंतु राजन् ! जो दूसरे असुर भव्य भावनासे सम्पन्न (दूरदर्शी) अथवा भगवान् शिवकी महिमाके ज्ञाता थे, उन्होंने वर लेनेकी अभिलाषा व्यक्त की ॥ १४-१५॥
नेषुर्यं सुदुरात्मानस्तानुवाच पितामहः।
वरयध्वं वरं वीरा रुद्रक्रोधमृतेऽसुराः ॥ १६॥
जिन दुरात्माओंने वर लेनेकी इच्छा नहीं की, उनसे पितामह ब्रह्माने फिर कहा—'वीर असुरो ! तुम भगवान् रुद्रपर क्रोध प्रकट करनेके सिवा दूसरा कोई भी वर माँग लो।'॥
ते ऊचुः सर्वदेवानामावध्याः स्याम हे विभो।
पुराणि षट् च नो देव भवन्त्वन्तर्महीतले ॥ १७॥
सर्वकामसमृद्धार्थं षट्पुरं चास्तु नः प्रभो ।
वयं च षट्पुरं गत्वा वसेम च सुखं विभो ॥ १८ ॥
तब उन्होंने कहा—'विभो! हम सब देवताओंके लिये अवध्य हों। देव! पृथ्वीके भीतर हमारे छः पुर हों। प्रभो! हमारे वे छहों पुर सम्पूर्ण मनोवाञ्छित पदार्थोंकी समृद्धिसे सम्पन्न हों । भगवन् ! हम षट्पुरमें जाकर सुखपूर्वक निवास करें ॥ १७-१८ ॥
रुद्रादुग्रं भयं न स्याद् येन नो ज्ञातयो हताः।
निहतं त्रिपुरं दृष्ट्वा भीताः स्म तपसां निधे ॥ १९॥
'तपोनिधे ! जिन्होंने हमारे बन्धु-बान्धवोंको मार डाला है, उन रुद्रदेवसे हमें उग्र भय प्राप्त न हो; क्योंकि त्रिपुरोंका विनाश देखकर हम भयभीत हो गये हैं' ॥ १९ ॥
पितामह उवाच
असुरा भवतावध्या देवानां शङ्करस्य च।
न बाधिष्यथ चेद् विप्रान् सत्पथस्थान् सतां प्रियान् ॥२०॥
पितामह बोले—असुरो ! तुम देवताओं तथा भगवान् शङ्करके लिये अवध्य हो जाओगे। परंतु ऐसा तभी होगा, जब तुम सन्मार्गपर सुस्थिर रहनेवाले सत्पुरुषोंके प्रिय ब्राह्मणों-को बाधा नहीं पहुँचाओगे ॥ २० ॥
विप्रोपघातं मोहाच्चेत् करिष्यथ कथंचन ।
नाशं यास्यथ विप्रा हि जगतः परमा गतिः ॥ २१ ॥
यदि मोहवश किसी तरह ब्राह्मणोंकी हत्या करोगे तो नष्ट हो जाओगे; क्योंकि ब्राह्मण जगत्के परम आश्रय हैं ॥
नारायणाद् विभेतव्यं कुर्वद्भिर्ब्राह्मणाहितम् ।
सर्वभूतेषु भगवान् हितं धत्ते जनार्दनः ॥ २२॥
ब्राह्मणोंका अहित करनेवाले पुरुषोंको भगवान् नारायणसे डरना चाहिये । क्योंकि वे भगवान् जनार्दन समस्त भूतोंके प्रति हित-बुद्धि रखते हैं ॥ २२ ॥
ते गता असुरा राजन् ब्रह्मणाथ विसर्जिताः ।
येऽपि भक्ता महादेवमसुरा धर्मचारिणः ॥ २३ ॥
स्वयं हि दर्शनं तेषां ददौ त्रिपुरनाशनः ।
श्वेतं वृषभमारुह्य सोमः सप्रवरः प्रभुः ।
उवाचेदं च भगवानसुरान् स सतां गतिः ॥ २४ ॥
राजन् ! ऐसा कहकर ब्रह्माजीके विदा देनेपर वे असुर चले गये तथा जो दूसरे असुर धर्मचरणमें तत्पर रहनेवाले और महादेवजीके भक्त थे, उन्हें त्रिपुरविनाशन भगवान् महादेवजीने उमासहित श्वेत वृषभपर आरूढ़ होकर अपने पार्षदोंके साथ आ स्वयं ही दर्शन दिया तथा सत्पुरुषोंके आश्रयभूत उन भगवान् शिवने उन असुरोंसे इस प्रकार कहा—॥ २३-२४ ॥
वैरमुत्सृज्य दम्भं च हिंसां चासुरसत्तमाः।
मामेव चाश्रितास्तस्माद् वरं साधु ददामि वः ॥ २५ ॥
'असुरशिरोमणियो ! तुमने वैर, दम्भ और हिंसाका परित्याग करके जो केवल मेरा ही आश्रय लिया है, इससे मैं तुम्हारे लिये श्रेष्ठ वर प्रदान करता हूँ ॥ २५ ॥
यैर्दीक्षिताः स्थ मुनिभिः सत्क्रियापरमैर्द्विजैः ।
सह तैर्गम्यतां स्वर्गः प्रीतोऽहं वः सुकर्मणा ॥ २६ ॥
'जिन सत्कर्मपरायण ब्रह्मर्षियोंने तुम्हें मेरी भक्तिकी दीक्षा दी है, उनके साथ ही तुम सब लोग स्वर्गलोकमें चले जाओ। मैं तुम्हारे सत्कर्मसे बहुत प्रसन्न हूँ ॥ २६ ॥
इह ये चैव वत्स्यन्ति तापसा ब्रह्मवादिनः ।
अपि कापित्थिका वृक्षे तेषां लोको यथा मम ॥ २७ ॥
'जो ब्रह्मवादी तापस इस कपित्थ वृक्षके पास निवास करेंगे, वे कापित्थिक कहलायेंगे और उन्हें मेरे समान लोक प्राप्त होगा ॥ २७ ॥
इह मासान्तपक्षान्तौ यः करिष्यति मानवः ।
वानप्रस्थेन विधिना पूजयन् मां तपोधनाः ॥ २८ ॥
वर्षाणां स सहस्रं तु तपसां प्राप्स्यते फलम् ।
कृत्वा त्रिरात्रं विधिवल्लप्स्यते चेप्सितां गतिम् ॥ २९ ॥
'तपोधनो ! जो मनुष्य अमावास्या और पूर्णिमाके दिन वानप्रस्थ विधिसे मेरी पूजा करता हुआ यहाँ निवास करेगा, वह सहस्र वर्षतक तपस्या करनेका फल पा लेगा तथा विधि-पूर्वक तीन राततक निवास करनेसे उसको मनोवाञ्छित गतिकी प्राप्ति होगी ॥ २८-२९ ॥
अर्कद्वीपे निवसतौ द्विगुणं तद् भविष्यति ।
न विदेशे च भद्रं वो वरमेतद् ददाम्यहम् ॥ ३० ॥
'अर्कद्वीपमें निवास करनेवालेको उससे दूना फल