विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
प्रारंभिक पृष्ठ व विषय-सूची
038
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
श्रीमन्महर्षि वेदव्यासप्रणीत
महाभारत-खिलभाग हरिवंश
( श्रीहरिवंशपुराण )
हिंदी-टीकासहित
टीकाकार—
पण्डित रामनारायणदत्त शास्त्री पाण्डेय 'राम'
PDF Creation and Uploading by:
Hari Parshad Das (HPD)
on 04 September 2014.
प्रकाशक—गोविन्दभवन-कार्यालय, गीताप्रेस, गोरखपुर
| सं० २०२४ से २०४९ तक | ५७,००० |
| सं० २०५२ आठवाँ संस्करण | ५,००० |
| योग | ६२,००० |
मूल्य—एक सौ रुपये
मुद्रक—गीताप्रेस, गोरखपुर—२७३००५
फोन : ३३४७२१
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
महाभारत
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् । देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥
व्यासाय विष्णुरूपाय व्यासरूपाय विष्णवे । नमो वै ब्रह्महृदये वासिष्ठाय नमो नमः ॥
हरिवंश-टीकासहित
श्रीगोपीगणपतिकी वन्दना
विघ्नविनाशनदक्षं लक्ष्यं भक्तेः सुमङ्गलाधारम् ।
वृन्दाविपिनविहारं श्रीगोपीगणपतिं वन्दे ॥
जो विघ्नोंका विनाश करनेमें दक्ष, भक्तिके चरम लक्ष्य और परम मङ्गलके आधार हैं तथा श्रीवृन्दावन जिनकी विहारस्थली है, उन श्रीगोपीगणपति (गोपीवल्लभ श्रीकृष्ण) की मैं वन्दना करता हूँ।
भगवान्से प्रार्थना
नमो भगवते तस्मै वासुदेवाय चक्रिणे ।
नमस्ते गदिने तुभ्यं वासुदेवाय धीमते ॥
ॐ नमो नारायणाय विष्णवे प्रभविष्णवे ।
मम भूयान्मनःशुद्धिः कीर्तनात्तव केशव ॥
जो षड्विध ऐश्वर्यसे सम्पन्न, सर्वव्यापी देवता तथा चक्र धारण करनेवाले हैं, उन भगवान् श्रीहरिको नमस्कार है। जिनके हाथमें कौमोदकी गदा सुशोभित है, उन परम बुद्धिमान् आप वासुदेवको नमस्कार है। जो प्रभावशाली, सर्वत्र व्यापक तथा सच्चिदानन्दस्वरूप हैं, उन नारायणदेवको नमस्कार है। केशव ! आपका कीर्तन करनेसे मेरा अन्तःकरण शुद्ध हो जाय।
श्रीहरिः
प्रथम संस्करणकी भूमिका
हरिवंश वेदार्थप्रकाशक महाभारत ग्रन्थका ही अन्तिम पर्व है। आदिपर्वके अनुक्रमणिकाध्यायमें महाभारतको सौ पर्वोंवाला ग्रन्थ बतलाया गया है। उसके अन्तिम तीन पर्व इस हरिवंश ग्रन्थमें ही सम्मिलित हैं। यह बात अनुक्रमणिकाध्यायमें स्पष्टरूपसे निर्दिष्ट है—
हरिवंशस्ततः पर्व पुराणं खिलसंज्ञितम्। विष्णुपर्व शिशोश्चर्या विष्णोः कंसवधस्तथा ॥
भविष्यं पर्व चाप्युक्तं खिलेष्वेवाद्भुतं महत्। एतत्पर्वशतं पूर्णं व्यासेनोक्तं महात्मना ॥
(महाभा० आदिपर्व, अध्याय २। ८२-८३)
जैसे वेदविहित सोमयाग उपनिषदोंके बिना साङ्ग सम्पन्न नहीं होता, वैसे ही श्रीमहाभारतका पारायण भी हरिवंश-पारायणके बिना पूर्ण नहीं होता। किंतु हरिवंशका पारायण गीता आदिकी तरह स्वतन्त्र भी किया जाता है। इस तरह यह 'पुराणं खिलसंज्ञितम्' आदिपर्व (२। ८२) के आधारपर 'हरिवंश-पुराण' तथा 'हरिवंशपर्व' इन दोनों ही नामोंसे विद्वानोंके बीच विख्यात है।
पुत्र-प्राप्तिकी कामनासे हरिवंश-श्रवणकी परम्परा भारतमें चिरकालसे प्रचलित है। विशेषकर यदि जन्मकुण्डलीमें संतानभाव सूर्यके द्वारा दृष्ट, आविष्ट या बाधित हो तो हरिवंश-श्रवण ही उसका प्रतिकार बतलाया गया है—
* इसके अतिरिक्त निम्नलिखित प्रमाणोंसे भी हरिवंश महाभारतका अङ्ग सिद्ध होता है—
१- हरिवंशपर्वके ३०वें अध्यायमें—'यथा ते कथितं पूर्वं मया राजर्षिसत्तम' इसके द्वारा वैशम्पायनने आदिपर्वस्थ पूर्वोक्त ययातिकी कथाका स्मरण दिलाया है और उसके लिये 'कथितं पूर्वं' पहले कहे जानेकी बात कही है। इससे दोनोंकी एकग्रन्थता स्पष्ट है।
२-इसीके ३२वें अध्यायमें 'त्वं चास्य धाता गर्भस्य सत्यमाह शकुन्तला' कहा गया है। आकाशवाणीने शकुन्तलाके जिस कथनकी बात कही है, वह महाभारतके आदिपर्वमे ही है।
३-भविष्यपर्वके ७३वें अध्यायमें जो भगवान् श्रीकृष्णके कैलास-गमनका कारण पूछा गया है, वह आनुशासनिक पर्वके संक्षिप्त कैलास-गमन वृत्तको लक्ष्य करके ही पूछा गया है। इसी प्रकार और भी कई उदाहरण हैं।
( ४ )
वंशान्तो हरिरुष्णगौ त्रिपुराहाब्जे भूसुते रुद्रियं सौम्ये सम्पुटकांस्यपात्रविधिवज्जीवे च पित्र्यातिथिः।
शुक्रे गोप्रतिपालनं च कथितं मन्दे च मृत्युंजयः कन्यादानभुजङ्गकेतुकपिलाः संतानसौख्यप्रदाः ॥
(बृहत्पाराशरहोराशास्त्र, पूर्वखण्ड १६। १४७)
श्रवणं हरिवंशस्य कर्तव्यं च यथाविधि। जुहुयाच्च दशांशेन दूर्वामाज्यपरिप्लुताम् ॥
(मन्त्रमहार्णव, वृद्धसूर्यार्णव)
यों भी इसके श्रवणकी बहुत महिमा है। जो फल अठारहों पुराणोंके सुननेसे मिलता है, वह अकेले हरिवंशके सुननेसे हो जाता है—
अष्टादशपुराणानां श्रवणाद् यत्फलं लभेत्। तत्फलं समवाप्नोति वैष्णवो नात्र संशयः ॥
(भविष्यपर्व १३५।४)
भगवद्भक्ति तथा कथानककी दृष्टिसे भी इसका बड़ा महत्त्व है। भगवान् श्रीकृष्णसे सम्बद्ध तथा अन्यान्य अगणित कथाएँ इसमें ऐसी हैं, जो अन्यत्र नहीं आयीं।
पारायण-क्रमसे इसके नवाह्नका ही विधान है। उसकी पूरी विधि इस ग्रन्थके अन्तमें दे दी गयी है।* केवल नवाह्न-पारायणके विश्रामस्थल नहीं दिये गये हैं। वह ‘कृत्यसार-समुच्चय’ ग्रन्थके २२५वें पृष्ठपर इस प्रकार बतलाया गया है—
प्रथमे यदुवंशस्य कीर्तनावधि कीर्तयेत्। द्वितीयेऽह्नि पठेद् विद्वान् धेनुकस्य वधावधि ॥
जरासंधवधं यावत् तृतीयेऽह्नि विचक्षणः। पारिजातस्य हरणं चतुर्थेऽह्नि प्रकीर्तयेत् ॥
सैन्यभङ्गः शम्बरस्य पञ्चमेऽह्नि प्रयत्नतः। जनमेजयस्य वंशस्य भविष्यस्य च वर्णनम् ॥
षष्ठेऽह्नि तावद्वक्तव्यं पारायणशुभेच्छुना। सप्तमे दैत्यसैन्यानां विस्तारो यावदेव हि ॥
घण्टाकर्णसमाधिस्तु अष्टमेऽह्नि प्रयत्नतः। नवमेऽह्नि समाप्तिः स्यात् पारायण उदाहृतः ॥
इसके अनुसार प्रतिदिन क्रमशः हरिवंशपर्वके ३५, विष्णुपर्वके १३, ४३, ७३, १०६ एवं भविष्यपर्वके २, ५०, ८० तथा १३५ वें अध्यायपर विश्राम करना चाहिये।
एक दूसरा क्रम इस प्रकार भी बतलाया गया है—
प्रथमे कृष्णजननं द्वितीये धेनुकाद्र्दनम्। तृतीये कुण्डिनपुरे रुक्मिणीहरणं तथा ॥
चतुर्थे षट्पुरवधमार्यास्तोत्रं च पञ्चमे। मधोश्चरित्रं षष्ठे वै सप्तमे पावकस्तुतिः ॥
अष्टमे पौण्ड्रकवधो नवमेऽह्नि समापयेत्। वाचयेदनया रीत्या हरिवंशं यथाक्रमम् ॥
अर्थ स्पष्ट है। इस क्रममें थोड़ा सा अन्तर है। तदनुसार प्रतिदिन हरिवंशपर्वके ३५, विष्णुपर्वके १३, ४३, ८२, १२० तथा भविष्यपर्वके १३, ६२, १०१ तथा १३५वें अध्यायपर विश्राम करना चाहिये।
सुतरां भगवान्की कृपासे महाभारतके साथ हरिवंशका प्रकाशन-कार्य पूरा हुआ। धार्मिक सदाचार-परायण जनताके सुविधार्थ यह उसकी सचित्र, सटीक तथा सजिल्द प्रति अलगसे प्रकाशित की जा रही है। इसके अन्तमें सन्तान-गोपाल-मन्त्रकी अनुष्ठान-विधि, इसके कई प्रकार, संतान-गोपाल-स्तोत्र, यन्त्र तथा विष्णु-शतनाम-स्तोत्र-ये सब सटीक दे दिये गये हैं। आशा है प्रेमी पाठक-पाठिकाएँ इन सबोंसे लाभ उठायेंगे। शिवमिति दिक्।
विनीत जानकीनाथ शर्मा
* 'अनुष्ठान-प्रकाश' के २८६ वें पृष्ठपर भी हरिवंश-श्रवणकी संक्षिप्त विधि दी गयी है।
श्रीहरिः
सटीक महाभारत-खिलभाग हरिवंशकी सम्पूर्ण विषय-सूची
( हरिवंशपर्व )
| अध्याय | विषय | पृष्ठ-संख्या | अध्याय | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|---|---|
| १- | मङ्गलाचरण, शौनक-उग्रश्रवा-संवाद, वृष्णिवंशियोंका विस्तृत चरित्र सुननेके लिये जनमेजयकी प्रार्थना और आदिसृष्टिका वर्णन | १ | १५- | सूर्यवंशका वर्णन | ५३ |
| २- | स्वायम्भुव मनुके वंश और दक्ष प्रजापतिकी उत्पत्तिका वर्णन | ५ | १६- | श्राद्धकल्प-जनमेजयद्वारा पिताका श्राद्ध तथा पितृस्वरूपनिर्णयसम्बन्धी प्रश्न, शान्तनुका अपने श्राद्धमें स्वयं हाथ बढ़ाकर भीष्मसे पिण्ड माँगना | ५५ |
| ३- | दक्ष प्रजापतिद्वारा सृष्टि-विस्तार, नारदजीका दक्षके पुत्रोंको विरक्त कर देना, दक्षकी साठ कन्याओं और उनकी संततिका वर्णन | ९ | १७- | पितृकल्प-भीष्म-मार्कण्डेय-संवाद और मार्कण्डेयजीके साथ सनत्कुमारजीकी बातचीत | ५९ |
| ४- | पृथुका उपाख्यान-राज्यवितरण और दिक्पालोंकी प्रतिष्ठा | १८ | १८- | पितृकल्प-मार्कण्डेय-सनत्कुमार-संवादमें पितरोंके गण, लोक, शक्ति और कन्याओंका वर्णन तथा पितरोंके प्रभावको देखनेके लिये मार्कण्डेयजीको दिव्य दृष्टिकी प्राप्ति | ६१ |
| ५- | पृथुका उपाख्यान—वेनका अत्याचार करके नष्ट होना और पृथुका जन्म तथा चरित्र | २० | १९- | पितृकल्प-भरद्वाजके पुत्रोंकी कथा, योगभ्रष्ट पुरुषोंकी गति, योगसिद्धिके अधिकारी पुरुषोंके लक्षण तथा मार्कण्डेय-सनत्कुमार-संवादकी समाप्ति | ६७ |
| ६- | पृथुका उपाख्यान-पृथ्वीका पृथुकी पुत्री बनकर अनेक प्रकारके दूध देना तथा अनेक पात्रों एवं दुहनेवालोंका वर्णन | २४ | २०- | पितृकल्प-ब्रह्मदत्त और उग्रायुधके वंश तथा पूजनीया चिड़ियाद्वारा शुकनीतिका वर्णन | ६८ |
| ७- | मन्वन्तर, मनु, देवता और ऋषियोंका पृथक्-पृथक् वर्णन | २८ | २१- | पितृकल्प—मार्कण्डेयजी द्वारा श्राद्धकी महिमाका वर्णन, श्राद्धके फलसे कौशिक-पुत्रोंको उत्तम जन्मकी प्राप्ति | ७७ |
| ८- | चारों युगों, मन्वन्तरों और ब्रह्माजीके दिन एवं वर्षका मान | ३३ | २२- | पितृकल्प—शुचिवाक् पक्षीका स्वतन्त्र आदि तीन पक्षियोंको शाप देना, सुमना पक्षीका अनुग्रहपूर्वक उन्हें शापसे मुक्त करना | ८० |
| ९- | वैवस्वत मनु, यम, यमी (यमुना), अश्विनीकुमारों एवं शनैश्चरकी उत्पत्ति | ३६ | २३- | हंसोंका काम्पिल्यनगरमें ब्रह्मदत्त आदिके रूपमें उत्पन्न होना और चार हंसोंका अपने पितासे आज्ञा लेकर मुक्त हो जाना | ८१ |
| १०- | वैवस्वत मनुके वंशजोंका वर्णन और पुरूरवाकी उत्पत्ति | ४० | २४- | विभ्राजका ब्रह्मदत्तका पुत्र बनकर उत्पन्न होना, रानी संमतिका ब्रह्मदत्तसे रूठना, एक ब्राह्मणके कहे हुए श्लोकोंसे ब्रह्मदत्त, पाञ्चाल्य और कण्डरीकको अपने पूर्वजन्मका ज्ञान होना तथा ब्रह्मदत्त आदिका तप करके मुक्त हो जाना | ८३ |
| ११- | धुन्धुमारकी कथा | ४३ | |||
| १२- | धुन्धुमारके वंशका वर्णन और गालवकी उत्पत्ति | ४७ | |||
| १३- | त्रिशङ्कुके चरित्रका वर्णन तथा उनके वंशमें हरिश्चन्द्र आदिका उत्पन्न होना | ४८ | |||
| १४- | सगरकी उत्पत्ति और चरित्र तथा सगर-पुत्रोंके उद्योगसे समुद्रका 'सागर' होना | ५१ |
क-
( २ )
२५-चन्द्रमाकी उत्पत्ति और राजसूय यज्ञ, देवासुर-संग्राम तथा बुधकी उत्पत्ति ... ८६
२६-महाराज पुरूरवाके चरित्र और वंशका वर्णन, राजा पुरूरवाका त्रेताग्निकी रचना करना और गन्धर्वोंके लोकमें जाना ... ८९
२७-पुरूरवाके द्वितीय पुत्र अमावसुके वंशका वर्णन, विश्वामित्र और परशुरामकी उत्पत्ति ... ९२
२८-राजा रजि और उनके पुत्रोंका चरित्र, इन्द्रका अपने स्थानसे भ्रष्ट होकर पुनः उसपर प्रतिष्ठित होना ... ९६
२९-अनेनाके वंशका वर्णन, धन्वन्तरिका काशिराज धन्वके यहाँ पुत्ररूपमें अवतार, दिवोदासके राज्य-कालमें भगवान् शिवकी आज्ञासे गणेश्वर निकुम्भके द्वारा वाराणसीको जनशून्य बनानेका प्रयत्न, वहाँ शिव और पार्वतीका निवास, दिवोदासका वाराणसीपर अधिकार और अलर्क-की प्रशंसा ... ९९
३०-नहुष एवं ययातिके वंशका वर्णन तथा ययातिका चरित्र ... १०४
३१-पूरुकी वंशपरम्पराका वर्णन ... १०८
३२-पूरुके वंशके अन्तर्गत ऋचेयुकी वंशपरम्परा—अजमीढवंश, पाञ्चाल एवं सोमकवंश, कौरववंश तथा तुर्वसु द्रुह्यु और अनुकी संततिका वर्णन ... १११
३३-यदुवंशका वर्णन, कार्तवीर्यकी उत्पत्ति एवं चरित्र तथा पाँचों ययाति-पुत्रोंके वंश-वर्णनके श्रवणकी महिमा .... ११७
३४-वृष्णिवंशका वर्णन—अक्रूर, वसुदेव, कुन्ती, सात्यकि, उद्धव, चारुदेष्ण, एकलव्य आदिका परिचय ... १२१
३५-श्रीकृष्णका अवतार लेना, श्रीकृष्णके अन्य भाई-बहिनों और कुटुम्बियोंका वर्णन तथा काल-यवनकी उत्पत्ति .... १२४
३६-क्रोष्टाके वंशका वर्णन, पुरोहितके गोत्रसे क्षत्रियों-के गोत्रका बदल जाना ... १२६
३७-बभ्रुवंशका वर्णन ... १२८
३८-मजमानके वंशका वर्णन और स्यमन्तकमणिकी कथा .... १३१
३९-स्यमन्तकमणिके कारण प्रसेन, सत्राजित् और शतधन्वाका मारा जाना, बलदेवजीका दुर्योधनको गदा-विद्या सिखाना, अक्रूरजीका श्रीकृष्णको मणि देना और श्रीकृष्णका पुनः अक्रूरको मणि लौटा देना .... १३५
४०-जनमेजयका भगवान्के वराह, नृसिंह, परशु-राम, श्रीकृष्ण आदि अवतारोंका रहस्य पूछना ... १३८
४१-भगवान् विष्णुके वाराह, नृसिंह, वामन, दत्तात्रेय, परशुराम, श्रीराम, श्रीकृष्ण, व्यास तथा कल्कि-अवतारोंकी संक्षिप्त कथा ... १४५
४२-भगवान् विष्णुके ईश्वरत्वका वर्णन एवं अद्भुत तारकामय संग्रामकी कथा ... १५३
४३-देवताओंके साथ युद्धके लिये उद्यत हुई दैत्य-सेनाका वर्णन .... १५९
४४-आश्चर्यतारकामय संग्राममें देवसेनाकी युद्धके लिये तैयारी ... १६१
४५-देवासुर-संग्राम एवं और्व अग्निकी उत्पत्ति १६५
४६-इन्द्रद्वारा चन्द्रमाकी स्तुति, चन्द्रदेव और वरुण-देवके द्वारा दैत्य-सेनाका संहार, मयदानवद्वारा मायाका प्रयोग, पवन और अग्निदेवका दैत्य-सेना-के साथ संग्राम और कालनेमिका रणमें आगमन १७०
४७-कालनेमिका युद्ध और प्रभाव .... १७५
४८-कालनेमि और भगवान् विष्णुका संवाद, श्री-विष्णुद्वारा कालनेमिका वध तथा देवताओंको आश्वासन देकर ब्रह्मलोकको प्रस्थान .... १७९
४९-ब्रह्मलोकमें भगवान् विष्णुका सत्कार ... १८४
५०-नारायणाश्रममें भगवान् विष्णुका शयन और उत्थान तथा पास आये हुए ब्रह्मा आदि देवताओंसे उनके आगमनका प्रयोजन पूछना १८७
५१-ब्रह्माजीका भगवान् विष्णुसे जगत्की वर्तमान अवस्थाका वर्णन करते हुए पृथ्वीका भार उतारनेके लिये मन्त्रणा करनेका अनुरोध ... १९१
( ३ )
| ५२-भगवान् विष्णु तथा सब देवताओंका मेरुपर्वतकी दिव्य सभामें उपस्थित होना और वहाँ पृथ्वीका भगवान्से भार उतारनेके लिये प्रार्थना करना $\dots$ १९४<br>५३-ब्रह्माजीकी आज्ञासे देवताओंका अंशावतरण $\dots$ १९८ | ५४-भगवान् विष्णुके प्रति देवर्षि नारदका वचन— भूलोककी वर्तमान अवस्थाका परिचय देकर भगवान्को अवतार ग्रहण करनेके लिये प्रेरित करना २०३<br>५५-भगवान् विष्णुके द्वारा नारदजीके कथनका उत्तर तथा ब्रह्माजीका भगवान्से उनके अवतार लेने-योग्य स्थान और पिता-माता आदिका परिचय देना २०९ |
( विष्णुपर्व )
| १-मङ्गलाचरण, नारदजीका मथुरामें आकर कंसको आनेवाले भयकी सूचना देना और कंसका अपने सेवकोंके सामने बढ़-बढ़कर बातें बनाना $\dots$ २१३ | १०-वर्षा ऋतुका वर्णन $\dots$ २३९ |
| २-कंसद्वारा देवकीके गर्भके विनाशका प्रयत्न, भगवान् विष्णुका पाताललोकमें स्थित 'षड्गर्भ' नामक दैत्योंके जीवोंका आकर्षण करके उन्हें निद्रा देवीके हाथमें देना और देवकीके गर्भमें क्रमशः स्थापित करनेका आदेश देकर अन्य कर्तव्य बताना तथा कार्यसाधनके अनन्तर बढ़नेवाली उस देवीकी महिमाका उल्लेख $\dots$ २१५ | ११-श्रीकृष्णकी अङ्गच्छटा, भाण्डीर वट, यमुना और कालियदहका वर्णन तथा श्रीकृष्णद्वारा कालियनागके निग्रहका विचार $\dots$ २४२ |
| ३-आर्याकी स्तुति $\dots$ २१९ | १२-श्रीकृष्णद्वारा कालियनागका दमन, उसका समुद्रको प्रस्थान तथा गोपोंको श्रीकृष्णकी महत्ताका अनुभव $\dots$ २४७ |
| ४-कंसद्वारा देवकीके नवजात शिशुओंकी हत्या, योगमायाद्वारा सातवें गर्भका संकर्षण, श्रीकृष्णका प्राकट्य और नन्दभवनमे प्रवेश, कंसद्वारा नन्द-कन्याको मारनेका प्रयत्न और उसका दिव्य रूपमें दर्शन देना, कंसद्वारा क्षमाप्रार्थना और देवकीद्वारा उसे क्षमा-दान $\dots$ २२२ | १३-बलरामद्वारा धेनुकासुरका वध और भयरहित तालवनमें गौओं तथा गोपोंका विचरण $\dots$ २५० |
| ५-वसुदेवजीका नन्दको व्रजमें लौटनेकी सम्मति देना और नन्दजीका गोव्रजकी शोभा निहारते हुए वहाँ पधारना $\dots$ २२६ | १४-बलरामद्वारा प्रलम्बासुरका वध $\dots$ २५२ |
| ६-शकट-भञ्जन और पूतना-वध $\dots$ २२९ | १५-इन्द्रोत्सवके विषयमें श्रीकृष्णकी जिज्ञासा तथा एक वृद्ध गोपके द्वारा उसकी आवश्यकताका प्रतिपादन $\dots$ २५६ |
| ७-श्रीकृष्ण और बलरामका व्रजमे घुटनोंके बल चलना तथा श्रीकृष्णका उलूखलमें बँधकर यमलार्जुन-भङ्गकी लीला करना $\dots$ २३१ | १६-श्रीकृष्णके द्वारा गिरियज्ञ एवं गोपूजनका प्रस्ताव करते हुए शरद् ऋतुका वर्णन $\dots$ २५७ |
| ८-श्रीकृष्ण-बलरामकी बालचर्या, श्रीकृष्णके द्वारा व्रजको अन्यत्र ले जानेकी चेष्टा और अपने शरीरसे भेड़ियोंको उत्पन्न करके उनका समूचे व्रजको डराना $\dots$ २३४ | १७-गोपोंद्वारा श्रीकृष्णकी बातको स्वीकार करके गिरियज्ञका अनुष्ठान तथा भगवान्का दिव्य रूप धारण करके उनकी पूजा ग्रहण करनेके पश्चात् उन्हें वर देना $\dots$ २६१ |
| ९-भेड़ियोंके उत्पातसे व्रजवासियोंका उस स्थानको छोड़कर श्रीवृन्दावनमे जाना $\dots$ २३७ | १८-इन्द्रका संवर्तक मेघोंद्वारा वर्षा कराकर गौओं और गोपोंको कष्टमें डालना, श्रीकृष्णद्वारा गोवर्धनधारण तथा उसके नीचे गौओं और गोपोंसहित व्रजवासियोंका जाना $\dots$ २६३ |
| १९-देवराज इन्द्रका आगमन, श्रीकृष्णका गोविन्द-पदपर अभिषेक तथा इन्द्रका श्रीकृष्णको भावी कार्य बताकर अर्जुनकी देख-भालके लिये कहना और श्रीकृष्णका उसे स्वीकार करना $\dots$ २६८ | |
| २०-श्रीकृष्णका अलौकिक चरित्र देखकर आशङ्कित हुए गोपोंका उनसे प्रश्न और श्रीकृष्णद्वारा उत्तर तथा उनकी रासलीलाका संक्षेपसे वर्णन २७५ |
( ४ )
२१-अरिष्टासुरका वध .... ... २७७
२२-कंसकी आशङ्का, उसका रात्रिके समय यदुवंशियोंको बुलाकर भरी सभामें श्रीकृष्ण और विष्णुके प्रभावको बताना, वसुदेवपर कठोर आक्षेप करना तथा अक्रूरको श्रीकृष्ण आदिको बुला लानेके लिये ब्रजमें जानेकी आज्ञा देना ... २७९
२३-अन्धकका कंसको मुँहतोड़ उत्तर ... २८६
२४-केशीके अत्याचार और श्रीकृष्णद्वारा उसका वध .... .... २८९
२५-अक्रूरका ब्रजमें आकर भगवान् श्रीकृष्णको देखना और उनके विषयमें अनेक प्रकारकी बातें सोचना २९४
२६-अक्रूरका गोपोंके लिये कंसका आदेश सुनाना और वसुदेव-देवकीकी दयनीय दशा बताकर श्रीकृष्ण-बलरामको मथुरा चलनेके लिये प्रेरित करना, मार्गमें अक्रूरको यमुनाजीके जलमें आश्चर्यमय नागलोक एवं भगवान् अनन्त तथा उनकी गोदमें श्रीकृष्णका दर्शन .... २९७
२७-श्रीकृष्ण और बलरामका मथुरामें प्रवेश, उनके द्वारा रजकका वध, मालीको वरदान, कुब्जापर कृपा और कंसके धनुषका भञ्जन .... ३०१
२८-कंसकी चिन्ता, उसका रंगशालाको देखना और उसे सुसज्जित करनेका आदेश देना, चाणूर एवं मुष्टिकको तथा कुवलयापीडके महावतको श्रीकृष्ण-बलरामके वधके लिये आज्ञा देना, महावतसे द्रुमिलके द्वारा अपनी उत्पत्तिकी कथा कहना—उसकी माताका सुयामुन पर्वतपर द्रुमिलके साथ समागम तथा उन दोनोंका परस्पर वरदान एवं शाप ३०६
२९-नागरिकोंसे भरी रङ्गशालामें मञ्चों तथा प्रेक्षागृहोंकी शोभा, कंस तथा मल्लोंका आगमन, श्रीकृष्ण और बलरामका रङ्गद्वारपर पदार्पण, कुवलयापीड, महावत तथा हाथीके पादरक्षकोंका वध और दोनों बन्धुओंका रङ्गस्थलमें प्रवेश ... ३१४
३०-रङ्गशालामें मल्लयुद्धके विषयमें श्रीकृष्णके विचार, श्रीकृष्ण और बलदेवके द्वारा चाणूर और मुष्टिक आदिका वध, कंसका संहार तथा पिता-माताके चरणोंमें प्रणाम करके दोनों भाइयोंका उनके घरमें जाना .... ... ३१७
३१-कंसकी स्त्रियों और माताका विलाप ... ३२३
३२-श्रीकृष्णका कंसवधके लिये पश्चात्तापपूर्वक उसके औचित्यका समर्थन, उग्रसेनका श्रीकृष्णको सर्वस्व-समर्पणके पश्चात् कंसका अन्त्येष्टि-संस्कार करनेके लिये अनुरोध, श्रीकृष्णका उन्हें समझा-बुझाकर राज्यपर अभिषिक्त करना और समस्त यादवोंके साथ जाकर कंस आदिका अन्त्येष्टि-संस्कार कराना ... ... ३२८
३३-बलराम और श्रीकृष्णका गुरु सान्दीपनिके यहाँ जाकर विद्या पढ़ना और गुरुदक्षिणामें उनके मरे हुए पुत्रको उन्हें देकर मथुरापुरीको लौट आना ... .... ३३२
३४-जरासंघका अपनी विशाल सेनाके द्वारा आकर मथुरापुरीपर घेरा डालना .... ३३५
३५-जरासंघकी सेनाका वर्णन, उसकी चारों दिशाओंसे मथुरापुरीपर आक्रमणकी योजना, यादवोंके साथ जरासंघकी सेनाका युद्ध, श्रीकृष्ण और बलरामके पराक्रमसे उसकी सेनाका पलायन, जरासंघद्वारा अपने सैनिकोंको प्रोत्साहन तथा उभय पक्षके वीरोंमें घमासान युद्ध ... ३३६
३६-वृष्णिवंशियों तथा जरासंघके सैनिकोंका युद्ध, बलराम और जरासंघका गदायुद्ध तथा जरासंघका पराजित होकर पलायन करना .... ३४३
३७-जरासंघके पुनः आक्रमणसे शङ्कित यादवोंकी सभामें विकद्रुका भाषण—राजा हर्यश्वका चरित्र तथा उनसे यदु एवं यादवोंकी उत्पत्तिका वर्णन .... ... ३४६
३८-विकद्रुद्वारा यदुकी संततिका वर्णन तथा मथुरापुरीको जरासंघका आक्रमण सहनेके अयोग्य बताना ... ... ३५१