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विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

द्वितीयोऽध्यायः । ११११

द्वितीयोऽध्यायः । ११११


गोव्रतं नियतं कार्यं निराहारं निरूदकम् ॥ २७ ॥
सूर्यास्तकालपर्यन्तं यावद्गोमागमौ भवेत्।
इसका आरम्भ करके अन्ततोगत्वा एक मासतक इस शुभ व्रतका अनुष्ठान करना उचित है। स्त्रीको चाहिये कि वह मनमें अत्यन्त प्रसन्न हो चतुर्थी तिथिको प्रातःकाल उठकर नियमपूर्वक गोव्रत आरम्भ करे। प्रातःकालसे सूर्यास्ततक जबतक चरनेको गयी हुई गौएँ गाँवमें लौट न आयें, तबतक अन्न और जल ग्रहण नहीं करना चाहिये ॥ २६—२७ १/२ ॥

आगतां च सवत्सां हि पूजयित्वा यथाविधि ॥ २८ ॥
यवसं पुष्कलं दत्त्वा यवान्नं कुरुते स्वयम्।
जब गौ द्वारपर आ जाय, तब बछड़ेसहित उसकी विधिवत् पूजा करके उसे प्रचुरमात्रामें घास-भूसा देकर स्वयं भी यवान्न ग्रहण करे ॥ २८ १/२ ॥

एवं मासे चतुर्थ्यां सा शुक्लायां व्रतमाचरेत् ॥ २९ ॥
स्त्रीव्रतं कथितं राजन् पुरुषस्य तथैव च।
एवं मासवतं कृत्वा सुपुत्रं लभते ध्रुवम् ॥ ३० ॥
इस प्रकार किसी भी मासके शुक्लपक्षकी चतुर्थीको नारी यह व्रत आरम्भ करे और उसे एक मासतक निभाये। राजन् ! इस तरह यह स्त्री और पुरुषके लिये व्रत बताया गया है। इसका इसी प्रकार एक मासतक आचरण करके मनुष्य निश्चय ही उत्तम पुत्र प्राप्त कर लेता है ॥ २९-३० ॥

इति श्रीपद्मपुराणे हरिवंशमाहात्म्ये श्रवणादिविधिकथनं नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
इस प्रकार श्रीपद्मपुराणके अन्तर्गत हरिवंशमाहात्म्यमें श्रवण आदिकी विधिका वर्णनविषयक पहला अध्याय पूरा हुआ ॥ १ ॥


द्वितीयोऽध्यायः

( १ ) हरिवंशश्रवणकी विधि और फल

वैशम्पायन उवाच
अथ ते सम्प्रवक्ष्यामि नवाहश्रवणे विधिम् ।
सहायैर्बहुभिश्चैव प्रायः साध्यो विधिस्त्वयम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन् ! अब मैं तुम्हें हरिवंशके नवाह-श्रवणकी विधि बताऊँगा। यह विधि प्रायः बहुत-से सहायकोंकी सहायतासे ही सिद्ध होनेवाली है ॥ १ ॥

दैवज्ञं तु समाहूय मुहूर्तं पृच्छद्य यत्नतः।
विवाहे यादृशं वित्तं तादृशं परिकल्प्य च ॥ २ ॥
पहले यत्नपूर्वक ज्योतिषीको बुलाकर मुहूर्त पूछना चाहिये तथा विवाहके लिये जितने धनका प्रबन्ध किया जाता है, उतने धनकी व्यवस्था इसके लिये करनी चाहिये ॥ २ ॥

नभस्यश्चाश्विनोजौं च मार्गशीर्षः शुचिर्नभः ।
एते मासाः कथारम्भे श्रोतॄणां कामसूचकाः ॥ ३ ॥
भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, आषाढ़ और श्रावण—ये छः मास कथा आरम्भ करनेमें श्रोताओंके लिये अभीष्ट सिद्धिके सूचक हैं ॥ ३ ॥

सहायाश्च त एवात्र कर्तव्याः सोद्यमाश्च ये।
देशे देशे तथा सेयं वार्ता प्रोच्या प्रयत्नतः ॥ ४ ॥
भविष्यति कथा चात्र आगन्तव्यं कुटुम्बिभिः ।
इस कार्यमें उन्हीं लोगोंको सहायक बनाना चाहिये, जो उद्योगी हों। फिर प्रयत्न करके देश-देशान्तरों (विभिन्न स्थानों) मे यह संदेश कहला देना चाहिये कि यहाँ कथा होगी, अतः आप सब स्वजनोंको सपरिवार पधारना चाहिये ॥ ४ १/२ ॥

देशे देशे विरक्ता ये वैष्णवाः कीर्तनोत्सुकाः ॥ ५ ॥
तेष्वेव पत्रं प्रेष्यं च तल्लेखनमितीरितम्।
सतां समाजो भविता नवरात्रं सुदुर्लभः ॥ ६ ॥
भिन्न-भिन्न स्थानोंमें हरिकीर्तनके लिये उत्सुक रहनेवाले जो विरक्त वैष्णव हों, उनके पास अवश्य निमन्त्रण-पत्र भेजना चाहिये। उस पत्रके लेखनकी विधि इस प्रकार बतायी गयी है—‘महानुभावो ! यहाँ नौ दिनोंतक सत्पुरुषोंका समागम—सत्संगका सुअवसर रहेगा, जो सबके लिये परम दुर्लभ है (अतः आपलोग हरिवंश-कथामृतका पान करनेके लिये अवश्य पधारनेकी कृपा करें)' ॥ ५-६ ॥

आगन्तुकानां सर्वेषां वासस्थानानि कल्पयेत् ।
तीर्थे वापि वने वापि गृहे वा श्रवणं स्मृतम् ॥ ७ ॥
जो लोग आवे, उन सबके रहनेके लिये स्थानका यथोचित प्रबन्ध करे। कथाका श्रवण किसी तीर्थमें, वनमें अथवा अपने घरपर भी अच्छा माना गया है ॥ ७ ॥

विशाला वसुधा यत्र कर्तव्यं तत् कथास्थलम्।
शोधनं मार्जनं भूमेर्लेपनं धातुमण्डनम् ॥ ८ ॥
जहाँ लंबा-चौड़ा मैदान हो, वहीं कथा-स्थल बनाना चाहिये। उस भूमिका शोधन, मार्जन और लेपन करके रंग-बिरंगी धातुओंसे वहाँ चौक पूरे ॥ ८ ॥

गृहोपस्करमुद्धृत्य गृहकोणे निवेशयेत् ।
कर्तव्यो मण्डपः प्रोच्चैः कदलीस्तम्भमण्डितः ॥ ९ ॥

१११२ | श्रीहरिवंशमाहात्म्ये


घरकी सारी सामग्री उठाकर एक कोनेमें रख दे और कथाके लिये एक ऊँचा मण्डप तैयार कराये, जो केलेके खम्भोंसे सुशोभत हो ॥ ९ ॥
फलपुष्पदलैर्बिम्बैश्चवितानैन विराजितः ।
चतुर्दिक्षु ध्वजारोपस्तोरणेन विराजितः ॥ १० ॥
उसे सब ओर फल, फूल, पल्लव और चंदोवेसे अलंकृत करे । चारों दिशाओंमें ध्वजारोपण करे । उस मण्डपमें सुन्दर फाटक लगाकर उसकी शोभा बढ़ाये ॥ १० ॥
ऊर्ध्वं सप्तैव लोकाश्च सप्ताधः परिकल्पयेत् ।
तेषु विप्रा विरक्ताश्च स्थापनीयाः प्रबोध्य वै ॥ ११ ॥
उस मण्डपमें कुछ ऊँचाईपर सात विशाल लोकोंकी कल्पना करे और उनमें विरक्त ब्राह्मणोंको बुला-बुलाकर समझा-बुझाकर बैठाये । इसी प्रकार नीचे भी सात लोकोंकी कल्पना करे (और उनमें साधारण जनताको बिठाये) ॥ ११ ॥
पूर्वं तेषामासनानि कर्तव्यानि यथोत्तरम् ।
वक्तुश्चापि तथा दिव्यमासनं परिकल्पयेत् ॥ १२ ॥
पहले उन विरक्त ब्राह्मणोंके लिये उत्तमोत्तम आसनोंका प्रबन्ध करना चाहिये । फिर वक्ता (वाचक) के लिये भी दिव्य आसनकी व्यवस्था करे ॥ १२ ॥
उदङ्मुखो भवेद् वक्ता श्रोता वै प्राङ्मुखस्तथा ।
प्राङ्मुखोऽथ भवेद् वक्ता श्रोता चोदङ्मुखस्तथा ॥
जब वक्ताका मुँह उत्तरकी ओर रहे, तब श्रोताका मुख पूर्वकी ओर होना चाहिये और यदि वक्ताका मुख पूर्वकी ओर हो तब श्रोताको उत्तराभिमुख होकर बैठना चाहिये ॥ १३ ॥
विरक्तो वैष्णवो विप्रो वेदशास्त्रविशारदः ।
दृष्टान्तकुशलो धीरो वक्ता कार्यों दयान्वितः ॥ १४ ॥
जो विरक्त, विष्णुभक्त, वेदशास्त्रविशारद, जातिका ब्राह्मण, भाँति-भाँतिके दृष्टान्त देकर ग्रन्थके भावको हृदयङ्गम करानेमें कुशल, धीर और दयालु हो, ऐसे पुरुषको ही वक्ता बनाना चाहिये ॥ १४ ॥
वेदवेदान्ततत्त्वज्ञैर्गुरुभिर्ब्रह्मवादिभिः ।
नृणां कृतोपदेशानां सद्यः सिद्धिर्हि जायते ॥ १५ ॥
जिन मनुष्योंको वेद-वेदान्तके तत्त्वज्ञ, ब्रह्मवादी गुरुओंसे उपदेश प्राप्त होता है, उन्हें तत्काल सिद्धि सुलभ होती है ॥ १५ ॥
अथान्यजनसामान्यैर्गुरुभिर्नीतिकोविदैः ।
नृणां कृतोपदेशानां सिद्धिर्भवति कीदृशी ॥ १६ ॥
जो गुरु अन्य सामान्य लोगोंके समान ही नीतिकुशल हैं, उनसे जिन मनुष्योंको उपदेश प्राप्त होता है; उनको कैसी सिद्धि मिलेगी ? ॥ १६ ॥


अनेकधर्मविभ्रान्ताः स्त्रैणाः पाखण्डवादिनः ।
धर्मशास्त्रकथोद्वारेत्याज्यास्ते यदि पण्डिताः ॥ १७ ॥
जो अनेक मत मतान्तरोंके चक्करमें पड़कर भ्रान्त हो रहे हों, स्त्रीलम्पट हों और पाखण्डकी बातें करते हों, ऐसे लोग यदि पण्डित भी हों तो उन्हें धर्ममय शास्त्र-इतिहास-पुराणकी कथा कहनेके लिये वक्ता न बनावे, उन्हें ऐसे कार्यसे दूर ही रखे ॥ १७ ॥
वक्तुः पार्श्वे सहायार्थमन्यः स्थाप्यस्तथाविधः ।
पण्डितः संशयच्छेत्ता लोकबोधनतत्परः ॥ १८ ॥
वक्ताके पास उसकी सहायताके लिये उसी योग्यताका एक और विद्वान् रखे । वह भी संशय-निवारण करनेमें समर्थ और लोगोंको समझानेमें कुशल होना चाहिये ॥ १८ ॥
वक्त्रा क्षौरं प्रकर्तव्यं दिनादर्वाग् व्रताप्तये ।
वक्तुः श्रोतुश्चन्द्रशुद्धौ दम्पत्योः शुभतारके ॥ १९ ॥
वक्ताको उचित है कि वह कथा आरम्भ होनेसे एक दिन पहले क्षौर करा ले, जिससे व्रतका पूर्णतया निर्वाह हो सके । जब वक्ता और श्रोता दोनोंके चन्द्रबल ठीक हों और सुननेवाले दम्पतिके ग्रह एवं ताराबल भी अनुकूल हों, तब कथा आरम्भ करनी चाहिये ॥ १९ ॥
अरुणोदये विनिर्वर्त्य शौचं स्नानं समाचरेत् ।
नित्यं संक्षेपतः कृत्वा संध्याद्यं प्रयतस्ततः ॥ २० ॥
सुक्षालितपाणिपादः स्वस्तिवाचनपूर्वकम् ।
गोमयोपलिप्तदेशे सर्वतोभद्रकल्पनम् ॥ २१ ॥
स्वीयशक्त्यनुसारेण पूजनं सर्वमाचरेत् ।
कथाविघ्नविनाशाय गणनाथं प्रपूजयेत् ॥ २२ ॥
श्रोता अरुणोदयकालमे—दिन निकलनेसे दो घड़ी पहले शौच आदिसे निवृत्त होकर विधिपूर्वक स्नान करे । प्रतिदिन मनको संयममें रखकर संक्षेपसे संध्या-वन्दन आदि करके हाथ-पैरोंको अच्छी तरह धोकर पहले ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन करावे । फिर गोबरसे लिपे-पुते स्थानपर सर्वतोभद्रमण्डलकी रचना करे और अपने शक्तिके अनुसार सम्पूर्ण पूजन कर्म सम्पन्न करे । कथाके विघ्नोंका निवारण करनेके लिये श्रीगणेशजीकी पूजा करे ॥ २०—२२ ॥
सलक्ष्मीपुत्रसहितं गोपालं स्थापयेत् ततः ।
निर्विघ्नेनैव सिद्ध्यर्थं देवपूजनपूर्वकम् ॥ २३ ॥
तत्पश्चात् लक्ष्मी (रुक्मिणी) तथा (प्रद्युम्न आदि) पुत्रोंसहित गोपालक भगवान् श्रीकृष्णकी स्थापना करे । कथाकी निर्विघ्नतापूर्वक सिद्धिके लिये ही देवपूजनपूर्वक पत्नी और पुत्रसहित भगवान् श्रीकृष्णकी पूजा करे ॥ २३ ॥
संकल्पं कुर्यात्—
इसके बाद निम्नाङ्कितरूपसे संकल्प करना चाहिये—