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सर्वकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 275, कुल 1169 में से

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पृष्ठ 275

विष्णुपर्व ] चतुर्दशोऽध्यायः २५३
.. नाना प्रकारके युद्धके पैंतरे दिखाते हुए वे दोनो सिंहके
समान पराक्रमी वीर ग्वालबालोंके साथ रहकर अपनी इच्छाके
अनुसार सानन्द विचरने लगे ॥ ११ ॥
तयो रमयतोरेव तल्लिप्तुरसुरोत्तमः ।
प्रलम्बोऽभ्यागमत् तत्र छिद्रान्वेषी तयोस्तदा ॥ १२ ॥
गोपालवेषमास्थाय वन्यपुष्पविभूषितः ।
लोभयानः स तौ वीरौ हास्यैः क्रीडनकैस्तथा ॥ १३ ॥
वे दोनों जब इस प्रकार खेलका आनन्द ले रहे थे,
उसी समय उन्हें उठा ले जानेकी इच्छासे असुरोंमें श्रेष्ठ
प्रलम्ब एक गोपबालकका वेष धारण करके वहाँ आया ।
उसने वन्य-पुष्पोंसे अपने-आपको विभूषित कर रखा था। वह उस
समय उनका छिद्र (उन्हें उठा ले जानेका अवसर) ढूँढ़ रहा
था और उन दोनों वीरोंको अपने हँसी-खेलसे लुभा रहा था ॥
सोऽवगाहत निश्शङ्कस्तेषां मध्यममानुषः ।
मानुषं वपुरास्थाय प्रलम्बो दानवोत्तमः ॥ १४ ॥
दानवप्रवर प्रलम्ब मनुष्य न होनेपर भी मनुष्यका शरीर
धारण करके निःशङ्कभावसे उन बालकोंके बीच घुस गया ॥
प्रक्रीडिताश्च ते सर्वे सह तेनामरातिणा ।
गोपालवपुषं गोपा मन्यमानाः स्वबान्धवम् ॥ १५ ॥
वे सब बालक उस देवद्रोहीके साथ खेलने लगे । वह
ग्वाल-बालका वेष धारण करके आया था, इसलिये समस्त
गोप उसे अपना भाई-बन्धु ही मानते थे ॥ १५ ॥
स तु छिद्रान्तरप्रेप्सुः प्रलम्बो गोपतां गतः ।
दृष्टिं प्रणिदधे कृष्णे रौहिणेये च दारुणाम् ॥ १६ ॥
परंतु गोपवेशमें आया हुआ प्रलम्ब उन दोनों वीरोंकी
दुर्बलताका अवसर ढूँढ़ रहा था, इसलिये उसने श्रीकृष्ण
और बलरामपर क्रूरतापूर्ण दृष्टि डाली ॥ १६ ॥
अविषह्यं ततो मत्वा कृष्णमद्भुतविक्रमम् ।
रौहिणेयवधे यत्नमकरोद् दानवोत्तमः ॥ १७ ॥
श्रीकृष्णका पराक्रम अद्भुत था, इसलिये उन्हें अजेय
मानकर उस दानवराजने रोहिणीकुमार बलरामजीको मारनेका
प्रयत्न किया ॥ १७ ॥
हरिणाक्रीडनं नाम बालकीडनकं ततः ।
प्रक्रीडितास्तु ते सर्वे द्वौ द्वौ युगपदुत्पतन् ॥ १८ ॥
तदनन्तर वे सब ग्वाल-बाल हरिणाक्रीडनं नामक
बालोचित खेल खेलने लगे । उसमें दो-दो बालक एक साथ
उछलते हुए कुछ दूर जाते थे ॥ १८ ॥
१. एक निश्चित लक्ष्यके पास एक साथ दो-दो बालक हिरनकी
भाँति उछलते हुए जाते हैं । जो दोनोंमें पहले पहुँच जाता है, वह
विजयी होता है । हारा हुआ बालक जीते हुएको अपनी पीठपर
चढ़ाकर मुख्य स्थानतक ले आता है, यही हरिणाक्रीडन है ।
कृष्णः श्रीदामसहितः पुप्लुवे गोपसूनुना ।
संकर्षणस्तु प्लुतवान् प्रलम्बेन सहानघ ॥ १९ ॥
गोपालास्त्वपरे द्वन्द्वं गोपालैरपरैः सह ।
प्रद्रुता लङ्घयन्तो वै तेऽन्योन्यं लघुविक्रमाः ॥ २० ॥
निष्पाप जनमेजय ! श्रीदामाके साथ श्रीकृष्ण और
ग्वालबालके वेषमे आये हुए प्रलम्बके साथ संकर्षण कूद-कूद-
कर चलने लगे। इसी तरह दूसरे ग्वालबाल अन्य ग्वालबालोंके
साथ दो-दोकी जोड़ी बनाकर एक-दूसरेकों लाँघ जानेका
प्रयत्न करते हुए शीघ्र गतिसे उछलते हुए चलने लगे ॥
श्रीदाममजयत् कृष्णः प्रलम्बं रोहिणीसुतः ।
गोपालैः कृष्णपक्षीयैर्गोपालास्त्वपरे जिताः ॥ २१ ॥
उस खेलमें श्रीकृष्णने श्रीदामाको, रोहिणीनन्दन
बलरामने प्रलम्बको तथा अन्यान्य कृष्णपक्षीय गोपोंने दूसरे
पक्षके गोपोंको पराजित कर दिया ॥ २१ ॥
ते वाहयन्तस्त्वन्योन्यं संहर्षात् सहसा द्रुताः ।
भाण्डीरस्कन्धमुद्दिश्य मर्यादां पुनरागमन् ॥ २२ ॥
जो-जो बालक हारे थे, वे अपने साथके विजयी बालकों-
को पीठपर ढोते हुए हर्षके साथ सहसा दौड़े और भाण्डीर वृक्षके
तनेतक पहुँचनेकी नियत सीमापर पहुँचकर फिर लौट आये ॥
संकर्षणं तु स्कन्धेन शीघ्रमुत्क्षिप्य दानवः ।
द्रुतं जगाम विमुखः सचन्द्र इव तोयदः ॥ २३ ॥
परंतु दानव प्रलम्ब बलरामजीको शीघ्र ही अपने कंधे-
पर चढ़ाकर वहाँसे विमुख हो तीव्र गतिसे आकाशकी ओर
चल दिया । उस समय वह ऊपरी भागमें चन्द्रमाको धारण
किये काले मेघके समान जान पड़ता था ॥ २३ ॥
स भारमसहंस्तस्य रौहिणेयस्य धीमतः ।
ववृधे सुमहाकायः शक्राक्रान्त इवाम्बुदः ॥ २४ ॥
बुद्धिमान् रोहिणीनन्दन बलरामके भारको सहन न कर
सकनेके कारण वह दानव बढ़ने लगा । बढ़ते-बढ़ते वह
विशालकाय हो इन्द्रका वाहन बने हुए मेघके समान प्रतीत
होने लगा ॥ २४ ॥
स भाण्डीरवटप्रख्यं दग्धाञ्जनगिरिप्रभम् ।
स्वं वपुर्दर्शयामास प्रलम्बो दानवोत्तमः ॥ २५ ॥
दानवराज प्रलम्बने वहाँ अपने शरीरको भाण्डीरवट तथा
जले हुए कजलगिरिके समान दिखाया ॥ २५ ॥
पञ्चस्तबकयुक्तेन मुकुटेनार्कवर्चसा ।
दीप्यमानाननो दैत्यः सूर्याक्रान्त इवाम्बुदः ॥ २६ ॥
उस दैत्यका मुख पाँच पुष्पगुच्छोंसे युक्त सूर्य-तुल्य
तेजस्वी मुकुटसे देदीप्यमान था । उस मुकुटको धारण करके
वह सूर्यसे आक्रान्त हुए काले मेघके समान जान पड़ता था ॥