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हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 509

अ० ५७ ] भाषाटीकासमेता । ( ४७७ )
कूर्परे च जानौ भग्ने कटौ तथा ॥ २९ ॥ पृष्ठवंशे विभग्ने च
साध्यान्येतानि सत्तम् ॥ ग्रीवादेशे चेन्द्रबस्तौ रोहिण्यां कूर्परा-
द्धधः ॥ ३० ॥ स्कन्धकूर्परमध्ये च तथा च त्रिकमध्यतः ॥ उर-
सि चैव क्रोडे च विभग्नं तदसाध्यकम् ॥ ३१ ॥ विभग्नं च नरं
दृष्ट्वा वेणुखण्डेन बन्धयेत् ॥ म्रक्षयेन्नवनीतेनैरण्डपत्रैश्च वेष्टयेत्
॥ ३२ ॥ उष्णाम्भसा सेचयेच्च वस्त्रेण मृदु बन्धयेत् ॥ ३३ ॥
धवार्ज्जुनकदम्बानां वल्कलं काञ्जिकेन तु ॥ पिष्ट्वा हितः प्रले-
पश्च तेन सौख्यं प्रजायते ॥ ३४ ॥ स्वेदयेत्तानि चोष्णेन आ-
वासं कारयेत्पुनः ॥ एवं क्रियासमाप्तौ ततो बन्धं विमोचयेत्
॥ ३५ ॥ एकाहान्तरितेनापि पूर्ववत्तत्प्रबन्धयेत् ॥ यावद्ग्रन्थि
न बध्नाति तावन्न स्नापयेन्नरम् ॥ ३६ ॥
भग्न अस्थिवाले मनुष्यकेवास्ते औषध कहते हैं, पौंहचा कोहनी, गोडे कटी ॥ २९ ॥ पीठका
बांस, ये जो भग्न हो जावें तो साध्य कहे हैं और ग्रीवाके समीप, बस्तिस्थान कोहनी
के नीचेकी जगह ॥ ३० ॥ कांधा, कोहनीके बीचका स्थान, कटि, कलेजा, छाती, इनमें
भग्न हुई अस्थि असाध्य कही है ॥ ३१ ॥ भग्न अस्थि हुए मनुष्यको देखिके बांसकी फाटकोंसे
बांध देवे और नौनीघृतका लेप कर अरंडके पत्तोंसे बांध देवे ॥ ३२ ॥ और गरम जलसे
सेंक करे वस्त्रसे कोमल बांध देवे ॥ ३३ ॥ धव, अर्जुनवृक्ष, कदंब, इनकी छालको कांजीमें
पीस लेप करनेसे सुख होजाता है ॥ ३४ ॥ पीछे गरम २ वस्त्र होजावे तबतक पसीना
दिवावे वस्त्रको वहां बांधा रक्खे ऐसी क्रिया हो लेवे तब बंधनको खोल देवे ॥ ३५ ॥ एकदिन
खुला रक्खे और एकदिन बांधा रक्खे और जबतक टूटे हुए हाड़की जगह ग्रंथि नहीं बंधै
तबतक स्नान नहीं करवावे ॥ ३६ ॥
अथ घृष्ट हाडकी चिकित्सा ।
घृष्टञ्चैव नरं दृष्ट्वा धावनं काञ्जिकेन च ॥ मूत्रेण शीततोयेन
धावनञ्च हितं मतम् ॥ ३७॥ यावद्वै स्रवति रक्तं तावत्तैलेन से-
चयेत् ॥ अल्पानि चौषधान्यत्र कारयेद्विविधानि च ॥ ३८ ॥
घृष्ट अर्थात् किसी वस्तुसे घिसके दब जावे वह घृष्ट हाड़ कहाता है,उसको कांजीसे धोवें
अथवा गोमूत्रसे तथा शीतल जलसे धोवना हित है ॥ ३७ ॥ जबतक रुधिर गिरे तबतक
तेलसे सेकता रहे और वैद्यजनको यहां स्वल्प औषध करनी चाहिये ॥ ३८ ॥