हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
पृष्ठ 508, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ें( ४७६ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने-
विशारदैः ॥ २५ ॥ या वेदना शल्यनिपातजाता तीव्रा शरीरे
प्रतनौति जन्तोः ॥ घृतेन संशान्तिमुपैति तिक्ता कोष्णेन यष्टी-
मधुनान्वितेन ॥ २६ ॥ सर्जार्जुनोदुम्बरमर्कटीनां रोध्रं समङ्गा-
सुरसासमेतम् ॥ जलेन पिष्ट्वा प्रतिलेपनाय शल्योद्धृतौ सौख्य-
मिदं करोति ॥ २७ ॥ शेषा क्रिया च पूर्वोक्ता छिन्ने भिन्ने हिता
तु या ॥ कर्त्तव्यो वालुकास्वेदो घटीस्वेदश्च तत्र च ॥ २८ ॥
छाती, शिर, कनपटी, दोनों कांख, दोनों पैर, कटिस्थान, उदर, मुख इनके आगे नेत्र कानमें
यदि बाण आदि शल्य हो तो शस्त्रोंसेंभी कष्टसाध्य कही है, जो अधिक भीतर नहीं होवे तो औष-
धोंसे निकल जाती है ॥ १४ ॥ शाखा प्रशाखा हाथ पैर अंगुली आदिस्थान मर्मस्थान, इनमें लगी
हुई शल्य नहीं निकलती है और यंत्र शस्त्रोंके प्रकार इनसे बुद्धिमान् पुरुष शल्यको निकासे
॥ १५ ॥ बारह यंत्र हैं और बारह प्रकारके शस्त्र कहे हैं और शल्योद्धारमें चार प्रबंध अर्थात्
बंधन आदिक पट्टी कही है ॥ १६ ॥ गोवामुख, वज्रमुख, संदंश, चक्राकृति, कंकपाद, आनक,
शृंगक, कुंडल, श्रीवत्स, सौवस्तिक, पंचवक्र ॥ १७ ॥ ऐसे ये बारह प्रकारके यंत्र, वैद्यजनोंने
कहे हैं और जुदे २ नामोंवाले बारह प्रकारके शस्त्र कहे हैं॥ १८ ॥ अर्धचंद्रमाके समान, व्रीहिमुख,
कंकपत्र, कुठारिका, करवीरकपत्र, कुशपत्र, शलाकाकारपत्र ॥ १९ ॥ बडिशशस्त्र, गृध्रपाद, शूली,
घनमुद्गर, ऐसे ये जुदे २ शस्त्र शल्योद्धारमें कहे हैं॥२०॥ जो अतिगुप्त शल्य हो वह संदंश अर्थात्
चिमटासरीखे यंत्रसे निकालना चाहिये और भिन्न हुई अस्थिके समान उसकी चिकित्सा करनी
चाहिये॥२१॥गंभीर शस्त्रको जानले उसको कुशपत्रशस्त्रसे फाडना चाहिये, कुंकुमशस्त्रसे निकासे
और ॥२२॥उस शल्यकी चिकित्सा भिन्नहुए अस्थिके समान करे॥२३॥ जहां अत्यंत सोजा हो
गया हो वहां शल्य नहीं दीखता है वहां शल्य सहित और कडा पीड़ावाला ऐसा सोजा जानके
॥ २४ ॥ वहां जैसा योग्य हो वैसाही यंत्र और शस्त्रको बुद्धिमान वैद्य अपनी बुद्धिसे विचारके
प्रयुक्त करे ॥ २५ ॥ जो बाणआ दि शल्यके लगनेसे पीड़ा हुई हो वह मनुष्यके शरीरमें ज्यादा
बढजावे वहां कुटकी, मुलहटी, शहद, इनसे संयुक्त किये हुए, कलुक गरम २ घृतसे सेकनेसे
वह पीड़ा शांत होती है ॥ २६ ॥ और रालका वृक्ष, अर्जुनवृक्ष, गूलर, कौंच, लोध, मँजीठ,
तुलसी, इनको जलमें पीस शल्य निकासी हुई जगहपे लेप करनेसे सुख होता है ॥ २७ ॥
बाकी जो पहले वालुकास्वेद, घटीस्वेद, इत्यादिक क्रिया कही है वे और अस्थिच्छिन्न, भिन्नअस्थि
इनमें जो क्रिया हित कही हैं वे सब करनी चाहिये ॥ २८ ॥
अथ अस्थिभग्नकी चिकित्सा ।
भग्नास्थिश्च नरं दृष्ट्वा तस्य वक्ष्यामि भेषजम् ॥ मणिबन्धे