हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ० ४९ ] भाषाटीकासमेता । ( ४४७ )
तंद्रा हो वह कफसे दूषित हुआ रक्त जानना ॥ २२ ॥ त्रिफला, गोकर्णी, अमलतास, कूडाकी
छाल, दूधी, इनको दूधके संग पीनेसे स्त्रियोंके गर्भस्थिति होती है ॥ २३ ॥ पहले कहा-
हुआ बलआदिक चन्दनादिक और द्राक्षादिक चूर्णके देनेसे हे उत्तमवैद्य ! गर्भस्थिति होती है
॥ २४ ॥ हे उत्तमवैद्य ! खण्डकाद्य चूर्ण अथवा पुनर्नवाद्य चूर्ण देनेसे स्त्रियोंको गर्भस्थिति
होती है ॥ २५ ॥
अथ स्त्रियोंके गर्भार्थ पथ्य ।
अथ पथ्यं प्रवक्ष्यामि स्त्रीणां च शृणु पुत्रक ॥ कञ्चरं सूरणं
चैव तथा चाम्लं च काञ्जिकाम् ॥ २६ ॥ विदाहिकं च तीव्व्रं
च स्त्रीणां दूरे परित्यजेत् ॥ वन्ध्याकर्कटकीमूलं लांगली कटु-
तुम्बिका ॥ २७ ॥ देवदाली द्विबृहती सूर्य्यवल्ली च भी-
रुका ॥ निर्माल्यं माल्यवस्त्रञ्च तथा स्यादृत्तुसङ्गमः ॥ २८ ॥
अन्यस्त्रीस्नातमुदकं स्त्रीणां पथ्यमुपक्रमः ॥ २९ ॥ इत्यात्रे-
यभाषिते हारीतोत्तरे तृतीयस्थाने वन्ध्योपक्रमो नामाष्टच-
त्वांरिशोऽध्यायः ॥ ४८ ॥
और हे पुत्र ! अब स्त्रियोंके वास्ते पथ्य कहते हैं । कचरी, जमीकन्द, चूकाका शाख, कांजी,
॥ २६ ॥ विदाही और तीक्ष्ण ऐसे भोजन स्त्रियोंको दूरसे ही त्याग देने चाहिये और बांझ
ककोड़ीकी जड़, कलहारी, कड़ई तुंबी ॥ २७ ॥ देवदाली, दोनों कटेहली, सूर्य्यमुखी,
शतावरी, ये वस्तु वन्ध्यास्त्रीको पथ्य हैं और जिस स्त्रीके बालक होते हों उसका जूठा भोजन
आदिक और उसका वस्त्र और उसका रजस्वला अवस्थामें स्पर्श ॥ २८ ॥ उसका ऋतुसम-
यमें स्नान किया हुआ जल, ऋतुसमयमें अपने पतिके संग भोग ये पथ्य है ॥ २९ ॥
इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां
तृतीयस्थाने वन्ध्योपक्रमो नामाष्टचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४८ ॥
एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४९.
अथ गर्भोपचारविधि ।
आत्रेय उवाच ॥ प्रथमे मासि यष्टीमधुपरूषकं मधुपुष्पाणि
यथा लाभम् ॥ नवनीतेन पयो मधु मधुरं पाययेच्च ॥ १ ॥