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हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 478

( ४४६ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने-
काथको दूधके संग पीवे ॥ १५ ॥ सफेद गोकर्णी, सफेद चिरमठी, सफेद सांठी इनको एक
महीना तक पीवे तो वंध्या स्त्री गर्भको प्राप्त हो जाती है ॥ १६ ॥
अथ पित्तदूषितरजकी चिकित्सा ।
जपाकुसुमसदृशं कुसुम्भरससन्निभम्॥ दाहशोषमूत्रकृच्छ्रयुक्तं
तत् पित्तदूषितम् ॥ १७॥ चन्दनोशीरमञ्जिष्ठापटोलं घनवाल-
कम् ॥ मधुकं यष्टिमधुकं तथा लोहितचन्दनम् ॥ १८ ॥ पद्म-
कं पुनर्नवे द्वे शारिवा जीरकं घनम् ॥ क्षीरेण शर्करायुक्तं पानं
पित्तकृते गदे ॥ १९ ॥ ज्ञात्वा योनिविशुद्धिश्च तत्र दद्यान्म-
हौषधम् ॥ श्वेतार्क मूलं पयसा श्वेता च गिरिकर्णिका ॥ २० ॥
श्वेताद्रिकर्णीमूलञ्च पानं गोक्षीरसंयुतम् ॥ बन्ध्यानां गर्भज-
ननं भवेत्तल्लक्षणान्वितम् ॥ २१ ॥
पुष्पके समान तथा कसुंभाके रंगके समान वर्णवाला रजका रक्त हो, दाह हो, शोष हो,
मूत्रकृच्छ्र हो, वह पित्तदूषित रक्त जानना ॥ १७ ॥ चंदन, खश, मँजीठ, परवल, नागरमोथा,
नेत्रवाला, महुआ, मुलहटी, लाल चन्दन ॥ १८ ॥ पद्माक, दोनों सांठी, अनंतमूल, भद्रमोथा
इनको दूधमें मिला खांड मिला पित्तसे उपजे रोगमें पीना हित है ॥ १९ ॥ पीछे योनिकी
शुद्धिको जानके आगे कही हुई ये महान् औषध देनी चाहिये। सफेद आककी जड़,दूधी, सफेद
गोकर्णी ॥ २ ॥ सफेद गोकर्णीकी जड इनको गौके दूधके संग पीवे और सफेद कटेहलीकी
जड़को दूधके संग पीनेसे वन्ध्या स्त्रीको गर्भ रहता है ॥ २१ ॥
अथ कफदुष्टरजकी चिकित्सा ।
सघनं पिच्छलं चापि जाड्यं स्यान्मूत्ररोधनम् ॥ आलस्य-
तन्द्रा निद्रा च कफदुष्टं रजो विदुः ॥ २२ ॥ त्रिफला गिरि-
कर्णी च तथारग्वधवत्सकौ ॥ पयसा पयसा पानं स्त्रीणां च
गर्भकारणम् ॥ २३ ॥ पलाद्यं चन्दनाद्यं च द्राक्षाद्यं चूर्णमेव
च ॥ दापयेद् गर्भजननं नारीणां भिषगुत्तमः ॥ २४ ॥ खण्ड-
काद्यञ्च चूर्ण च नारीणां भिषगुत्तमः॥पुनर्नवाद्यं देयं वा स्त्रीणां
गर्भप्रदायकम् ॥ २५ ॥
करडा २ झागोंवाला, जडरूप, मूत्रको रोकनेवाला,ऐसा रक्त गिरे और आलस्य हो निद्रा हो