सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 474, कुल 548 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 474

( ४५२ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने-
सरागविभ्रमकथालापैः संवर्द्धते मनः ॥ शुक्रक्षये शुक्रवृद्धिं
कथयिष्यामि साम्प्रतम् ॥ ७ ॥
आत्रेयजी कहते हैं-नपुंसकपना पांचप्रकारका होता है सो संक्षेपमात्रसे कहते हैं सुनो
॥ १ ॥ मैथुनके रोकनेसे अथवा ज्यादे मैथुन करनेसे अवस्थाकी हार होनेसे मनुष्योंके
वीर्य्यकी हानि हो नपुंसकपना होजाता है ॥ २ ॥ मनुष्योंके तीनप्रकारका नपुंसकपना होता
है मानस, वीर्य्यक्षय, और शुष्क पसीनासे उपजा सहज ॥ ३ ॥ ऐसे होता है जिस पुरुषके
स्त्रियोंके विरागभाव देखिके मनमें ममता हो, स्पर्श करनेमें पसीना आजावे यह मानस
कहाता है सो सुखसाध्य होता है ॥ ४ ॥ और जिसके द्वेषयुक्त स्त्रियोंके संग मैथुन करनेसे
मनकी हानि होजाती है और जिसके शीघ्रही लिंगका भंग होजाय वह वीर्य्यक्षय होनेसे नपुंस-
कपना होता है उसे ध्वजभंग कहते हैं ॥ ५ ॥ और जिसकी सदा समान प्रकृति रहे
अर्थात् कभी चैतन्यता हो ही नहीं वह असाध्यरोग कहाता है। मनके क्षय होनेमें मनको बढावे
और सुन्दर भोली स्त्रीके संग विषय करवावै ॥ ६ ॥ और स्नेहसहित विभ्रमके वचन, स्त्रियोंकी
कथाके आलाप इनसे मनको बढावे और वीर्य्यक्षयके नपुंसकपनेमें वीर्य्यवर्द्धक औषधोंको
कहते हैं ॥ ७ ॥
अथ शुक्रवृद्धिके उपाय ।
विदारिकागोक्षुरमूषकानां धात्रीफलं स्यात्सहसैन्धवानाम् ॥
समानि चैतानि च मागधीनां युक्तं सिताढ्यं पयसा पिबेच्च॥८॥
विषं बृहत्यौ मगधात्रिकण्टास्तथात्मगुप्ता सशतावरी च॥ सश-
करं गोपयसो घृतेन पानं नराणां प्रकरोति बीजम् ॥९॥ यव-
गोधूममाषाणां निस्तुषाणाञ्च चूर्णकम् ॥ दुग्धेनेक्षुरसेनापि
संस्कृत्य तु घृतेन तु ॥१०॥ पाचितं वटकश्रेष्ठं भक्षयेत्प्रातरु-
त्थितः ॥ तस्योपरि पयःपानं पिप्पलीशर्करान्वितम् ॥११॥
यवक्षारविदारीञ्च माषचूर्ण तथा यवान्॥मरिचानां सिताढ्यञ्च
घृतानाञ्च प्रपोलिकाम् ॥१२ ॥ पाचयेद्भक्षयेत्प्रातः पयःपानं
तथोपरि ॥ वीर्य्यञ्च कुरुते पुंसां वनिता रमते भृशम् ॥१३॥
गुडूची शतमूली च स्वयंगुप्ता बला तथा ॥ १४॥ शाल्मली
मुसलीमूलं चूर्णं गोपयसान्वितम् ॥ पानं नराणां श्रेष्ठं तु
बीजमिन्द्रियकारकम् ॥ १५ ॥