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हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 472, कुल 548 में से

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पृष्ठ 472

( ४४० ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने-
तत्र निधापयेत् ॥२९॥ मर्दनं स्यात्कण्ठदेशे तेन ग्रन्थिर्विली-
यते ॥ धान्यनागरजीमूतवचा ह्येताः समांशकाः ॥३०॥ क्वाथ-
स्वेदो घण्टिकाया मुखे गण्डूषधारणम्॥दिवारात्रौ वचाग्रन्थि
मुखे संधारयेद्भिषक् ॥ ३१॥ तेन सौख्यं भवेत्तस्य मुखरोगा-
द्विमुच्यते ॥ ३२ ॥
तर्जनी अंगुलीसे कंठके मध्यमें रक्तकी ग्रंथीको पीडित करे ॥ २८ ॥ जब रक्त
निकल जावे तब विम्लापन कर्म करना हित है । वहां वच, मिर्च, पीपल इनके चूर्णको
बुरकावे ॥ २९ ॥ कंठके मध्यमें मर्दन करे इससे वह ग्रंथि शांत हो जाती है और धन-
नियां, सूंठ, नागरमोथा, वच इन औषधोंको समान भाग ले ॥ ३० ॥ क्वाथ बना पसीना
दिवावे और गड्डुरोगवाले पुरुषके मुखमें इस क्वाथके कुल्ले करवावे ॥ ३१ ॥ दिनराति
मुखमें वचको धारण करावे ऐसे करवानेसे रोगीको सुख उत्पन्न होता है और मुखरोगसे
छुट जाता है ॥ ३२ ॥
अथ गलशुंडिका रोगके लक्षण ।
गले घण्टिकामार्गे च रक्तश्लेष्मविकारजा॥लम्बिका वर्धते नृणां
विज्ञेया गलशुण्डिका ॥३३॥ रुन्धते चास्य मार्गञ्च नेत्रस्रावः
प्रदृश्यते ॥ शिरोऽर्त्तिः श्वासकासश्च ज्वरेणैव प्रपच्यते ॥३४॥
मनुष्योंके गलमें घाटीके मार्गमें रक्तकफके विकारसे उपजी हुई लंबी ग्रंथि हो जाती है
यह गलशुंडिका रोग कहाता है ॥ ३३ ॥ वह रोग मुखके मार्गको रोक लेता है और नेत्रों-
में स्राव होता है, शिरमें पीडा हो, श्वास हो, खांसी हो, ज्वरकी तरह बाधा हो ऐसा यह रोग
होता है ॥ ३४ ॥
अथ गलशुंडिकारोगकी चिकित्सा ।
आशुकारी महाप्राज्ञःशीघ्रं कुर्य्यात्प्रतिक्रियाम्॥शस्त्रेण शुण्डि-
कां छित्त्वा कुर्य्याद्विम्लापनं हितम्॥३५॥मागधी मरिचं पथ्या
वचाधान्ययवानिकाः ॥ क्वाथः सोष्णःस्वेदमायाद्गलशुण्डोप-
शान्तये ॥३६॥ दिवा रात्रौ यवान्याश्च मुखे संधारणं हितम् ॥
मर्दनं कण्ठदेशे तु तेन संपद्यते सुखम् ॥ ३७॥ सिद्धार्थकं वचा
कुष्ठं रजनी पारिभद्रकम् ॥ गृहधूमं सलवणं कण्ठे वा लेपनं हि-