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हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 470

( ४३८ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने-
सिन्धुश्च वचाचूर्णेन घर्षयेत् ॥ क्रिमिजदन्तरोगेषु हितमेतत्प्र-
शस्यते ॥ १६ ॥
वच, अजमान, चीता, सेंधानमक, सूंठ, संभालू, इनका कल्क बना गरम २ दंत रोगमें
लेपित करे और मुखमें पांचसौ कुल्ले करे ॥ ९ ॥ सब मुखरोगोंमें यही विधि
करनी श्रेष्ठ है और वच, सेंधानमक, सूंठ, इनको दांतोंकी जडमें घिसे ॥ १० ॥
अजमान, वचको रात्रीमें दांतोंकी जड़में धारण करे और पित्तसे उपजे दंतरोगोंमें
नौनीघृत खांड इनको लगावे ॥ ११ ॥ आंवलाके फलको घिसके लगानेसे दंतरोगोंका
निवारण होता है और कफसे उपजे दंतरोगमें हड्डे, गुड इनको घिस ॥ १२ ॥ त्रिफलाके
क्वाथमें मिला दांतोंके लगानेसे दंतरोग दूर होता है और रियांकी
जड़का काथ बना कुल्ले करे ॥ १३ ॥ तथा खैरका काथ, अजमानका क्वाथ, नींवकी
जड़का क्वाथ इनसे दंतरोगका निवारण होता है ॥ १४ ॥ रक्तसे उपजे दंतरोगमें
नमक, सेंधानमकसे दांतोंको घिसै और ओष्ठपुटमांससे रक्तको निरवावे ॥ १५ ॥
बायविडंग, हिंग, सेंधानमक, वच, इनके चूर्णको दांतोंमें घिसे और क्रिमिज दंतरोगमें
भी यही विधि करनी हित है ॥ १६ ॥
अथ जिह्वारोग लक्षण ।
जिह्वायां पिटिका यस्य जिह्वापाकं विनिर्दिशेत् ॥ वातिके
सरुजा कृष्णा पित्तेन दाहसंयुता॥१७॥श्लेष्मणा सघना श्वेता
सर्वे वै सान्निपातिके ॥ १८ ॥
जिसकी जिह्वापै पिड़िका हों वह जिह्वापाक जानना । वातसे उपजी पिड़िका पीडा-
सहित होती है और काली होती है पित्तसे दाह करके युक्त हों ॥१७॥ कफसे कड़ी हो सफेद
वर्णवाली हो और सन्निपातसे उपजी पिड़िकाओंमें सब लक्षण मिलते हैं ॥ १८ ॥
अथ जिह्वारोगचिकित्सा ।
वचाभयाविडङ्गानि शुण्ठी सौवर्चलं कणा॥ घृतेन युक्तं जिह्वा-
यां घर्षणं वातिके गदे ॥१९ ॥ काञ्जिकेन तु तक्रेण सोष्णग-
ण्डूषधारणम्॥यष्टीकं चन्दनं मुस्ता मागधी मधुसंयुतम्२०॥
लेपनं पैत्तिके दोषे जिह्वास्फोटकवारणम् ॥ दुग्धेन च शीते-
नापि हन्ति गण्डूषधारणम् ॥२१॥ दन्तरोगे तथा जिह्वापाके
तच्च हितं विदुः ॥ रोध्रार्जुनकदम्बानां क्वाथश्चोष्णः सुखावहः॥
Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu