हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३९६ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने-
रोग असाध्य होता है बालक अवस्थामें ही यह पथरी रोग होता है । यह तीन प्रकार से
होता है ॥ ४ ॥ और जवान अवस्थामें मूत्रशर्करा रोग होता है वह साध्य होता है
स्त्री और पुरुषके विपरीत तथा मोहेहोके मैथुन करनेसे जो वीर्य झिरता है और स्त्रीका वीर्य
इकट्ठा होता है ॥ ५ ॥ वह वीर्य तो मूत्रके संग वासमें युक्त होता है और स्त्रीका रुधिर वातके
संग युक्त होजाता है फिर इन दोनोंके गर्भमें संयुक्त होनेसे मूत्रद्वारा रुक जाता है ॥ ६ ॥
वह जो बालक उत्पन्न होवे उसके मूत्ररोध रोग होवे, तीव्र पीड़ा हो यह अंडसंधिमें शर्करासंज्ञक
रोग हो जाता है यह शस्त्रसाध्य होता है ॥ ७ ॥
अथ अश्मरीरोगपर चिकित्सा ।
अतो वक्ष्यामि भैषज्यं शृणु पुत्र महामते ॥ शुण्ठी गोक्षुरकं
चैव वरुणस्य त्वचस्तथा ॥ ८ ॥ क्वाथो गुडयवक्षारयुक्तश्चाश्मरि-
नाशनः ॥ कुशकाशनलं वेणु अग्निमन्थाक्षनृत्तकम् ॥ ९ ॥ श्वदं-
ष्ट्रा मोरटा वापि तथा पाषाणभेदकम् ॥ पलाशत्रिफलाक्वाथो
गुडेन परिमिश्रितः ॥ १० ॥ पाने मूत्राश्मरीं हन्ति शूलब-
स्तौ व्यपोहति ॥ ११ ॥
हे पुत्र, हे महामते ! अब इन्होंकी औषध कहते हैं सुनो सोंठ, गोखरू, वरणाकी छाल
॥ ८ ॥ गुड, जवाखार इनका क्वाथ बना पीनेसे पथरीका नाश होता है ॥ ९ ॥
कुशा, कास, उशीर, बांस, अरणी, बहेड़ा, बेत, गोखरू, मोरबेल, पाषाणभेद ॥ १० ॥
टेसू, त्रिफला, इनका क्वाथ बना गुडमें मिला खानेसे पथरीका नाश होता है और वस्तिशूल
दूर होता है ॥ ११ ॥
अथ एलादि क्वाथ ।
एलाकणावृषत्रिकण्टकरेणुकाचपाषाणभेदमधुकं च फलत्रि-
कञ्च ॥ एरण्डतैलकशिलाजतुशर्कराद्यं क्वाथोऽश्मरीघ्नइति
सोष्णजलस्य पानम् ॥ १२ ॥
इलायची, पीपल, बांसा, दोनों कटेहली, गोखरू, रेणुका, पाषाणभेद, त्रिफला,
अरंडीका तेल, शिलाजीत, खांड इनका क्वाथ बना गरम २ पीनेसे पथरी रोग दूर
होता है ॥ १२ ॥
अथ गोक्षुरकादि चूर्ण ।
गोक्षुरकस्य बीजानां धातुमाक्षिकसंयुतम् ॥
अश्मरीपातनं चूर्ण महिषीदुग्धभक्षितम् ॥ १३ ॥