हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ० ३१ ] भाषाटीकासमेता । ( ३९५ )
और पित्तसे उपजे मूत्ररोधमें नमक, कांजीका पीना हित कहा है और पाडलवृक्ष,
टेंटूवृक्ष, नींव, गोखरू ॥ १६ ॥ इलायची, दालचीनी, तेजपात, त्रिफलाका काथ
बना गुड़के संग मिला पीनेसे मूत्ररोध दूर होता है ॥ १७ ॥ अनारदानाकी कांजी
पीना मूत्ररोगवाले पुरुषोंको हित है और त्रिफला, ईख, मिश्रीका काथ बना गुड़, सेंधा-
नमकके संग पीनेसे ॥ १८ ॥ या हरड़ैं गुड़ इनके खानेसे मूत्ररोधका
निवारण होता है अथवा इंद्रियोंको मलना अथवा स्त्रीके संग मूत्र आनेके समय विषय करना
श्रेष्ठ है ॥ १९ ॥ और स्त्रीके मूत्र बंध होवे तो उसकी योनि मर्दन करे तो शीघ्र ही सुख
उत्पन्न होता है ॥ २० ॥
इति वेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां
तृतीयस्थाने मूत्ररोधचिकित्सा नाम विंशोऽध्यायः ॥ ३० ॥
एकत्रिशोऽध्यायः ३१.
अथ अश्मरी अर्थात् पथरी रोगकी चिकित्सा ।
आत्रेय उवाच ॥ पितृमातृकदोषेण अथवा मूत्ररोधनात् ॥ अप-
थ्यसेवनाचारैर्जायते चाश्मरीगदः ॥ १ ॥ मूत्राविष्टौ च पितरौ
सुरतं कुरुतो यदि ॥ मूत्रेण सहितं युक्तं च्यवते गर्भसम्भवम् ॥
॥२॥ पश्च यस्य सदेहस्य स च तत्र प्रजायते॥मूत्रं मूत्रस्य संस्था-
ने करोति बन्धनं त्रिषु ॥ ३ ॥ सोऽप्यसाध्यो मूत्रगदश्चाल्पाङ्ग-
वति मानुषे ॥ तारुण्ये चापि साध्यश्च जायते मूत्रशर्करा ॥४॥
विपरीतेन चोत्ताने स्त्रिया च पुरुषेण वा ॥ शुक्रञ्च प्रबलेत्तस्य
स्त्री शुक्रं विचिनोति च ॥५॥ पुनश्च मेहने वासो वातेन शो-
णितं च तत् ॥ द्वयं दत्तं प्रपद्येत मूत्रद्वारं प्ररुध्यति ॥ ६ ॥ तेन
मूत्रप्ररोधश्च जायते तीव्रवेदना ॥ अण्डसन्धिस्यिता याति
शर्करा शस्त्रसाध्यका ॥ ७ ॥
आत्रेयजी कहते हैं-माता पिताके दोषसे अथवा मूत्रके रोकनेसे पथ्य वस्तुओंके सेवन
नहीं करनेसे पथरीरोग होजाता है ॥१॥ मूत्रके वेगसे युक्त हुए माता पिता जब मैथुन करते हैं
तब गर्भको उत्पन्न करनेवाला वीर्य मूत्र सहित झिरता है ॥ २ ॥ फिर उस गर्भके शरीरमें वह
मूत्र उसीस्थानमें प्राप्त होजाता है वह मूत्र मूत्रके स्थानमें बंधाकर देताहै ॥ ३ ॥ यह पथरी-