हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगानस्त्रीबालकं रमः ॥ ३८ ॥ न चाभरणताम्बूलं कोपशोषं
जहाति च ॥ दूरे चैतानि वर्जेत्तु यदीच्छेत्सुखसम्पदः ॥३९॥
लाल चावल, सांठी चावल, अरहर, कुलथी ॥ ३५ ॥ घृत, किंचित् मधुर अन्न इनको
भोजनके वास्ते देवे और खारा, चर्चरा पदार्थ, दिनमें सोना विशेष करके वर्ज देवे ॥ ३६ ॥
स्त्रीका दर्शन, मैथुन, ज्यादे भोजन करना, मार्गमें चलना, भाजना, मूत्रका रोकना ॥ ३७ ॥
वस्त्रसे वायु करना, रक्तवस्त्र पहिरना वैद्यजन इस रोगमें वर्ज देवे । एकांतमें, घरके मध्यमें, गाना, स्त्री
बालक इनके संग प्यार करना ॥ ३८ ॥ आभूषण पहिरना, पान चबाना, क्रोध करना इनको
इस रोगमें दूरसे ही त्याग देवे तब सुख होता है ॥ ३९ ॥
पीतप्रमेहपर हरिद्रादिक्वाथ ।
हरिद्राद्वितयं शुण्ठी विडङ्गानि हरीतकी ॥ कफप्रमेहे विहितः
क्वाथोऽयं मधुना सह ॥ ४० ॥ नीलोत्पलमुशीरञ्च पथ्यामल-
कमुस्तकम् ॥ पिबेत्पीतप्रमेहार्त्तः क्वाथं मधुविमिश्रितम् ॥४१॥
दोनों हल्दी, सोंठ, वायविडंग, हरडै इनका क्वाथ शहदके संग पीना कफप्रमेहमें श्रेष्ठ कहा
है ॥ ४० ॥ नीलाकमल, खश, हरडै, आंवला, नागरमोथा इनका क्वाथ शहदके संग पीनेसे
पीतप्रमेहका नाश होता है ॥ ४१ ॥
अथ पित्तप्रमेहपर कमलादिक्वाथ ।
कमलञ्च तथा रोध्रमुशीरमर्जुनान्वितम् ॥
पित्तप्रमेहे विहितः क्वाथोऽयं मधुना सह ॥ ४२ ॥
कमल, लोध, खश, अर्जुनवृक्ष इनका क्वाथ शहदके संग पीना पित्तप्रमेहमें हित
कहा है ॥ ४२ ॥
अथ आमलक्यादिचूर्ण ।
आमलकस्य स्वरसं मधुना च विमिश्रितम् ॥
हरीतक्याश्च चूर्णं वा सर्वमेहनिवारणम् ॥ ४३ ॥
आंवलोंके रसमें शहद मिला अथवा हरडैके चूर्णमें शहद मिला खानेसे सब प्रकारके प्रमेह
रोगोंका नाश होता है ॥ ४३ ॥
अथ खदिरादि चूर्ण ।
खदिरं शर्करा दारु हरिद्रा मुस्तमेव च ॥
चूर्णितं तु पिबेत्सर्वप्रमेहगदशान्तये ॥ ४४ ॥